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Saturday, September 20, 2014

आर्य-वैदिक साहित्य में आदिवासियों के पूर्वजों का राक्षस, असुर, दानव, दैत्य आदि के रूप में उल्लेख

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

रामायण में असुर की उत्पत्ति का उल्लेख :-

सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्याभिविश्रुता:।
अप्रतिग्रहणात्तस्या दैतेयाश्‍चासुरा: स्मृता:॥

उक्त श्‍लोक के अनुसार सुरा का अर्थ ‘मादक द्रव्य-शराब’ है। चूंकि आर्य लोग मादक तत्व सुरा का प्रारम्भ से पान (सेवन) करते थे। इस कारण आर्यों के कथित देव (देवता) सुर कहलाये और सुरा का पान नहीं करने वाले मूल-भारतवासी असुर (जिन्हें आर्यों द्वारा अदेव कहा गया) कहलाये। जबकि इसके उलट यदि आर्यों द्वारा रचित वेदों में उल्लिखित सन्दर्भों पर दृष्टि डालें तो ज्ञात होता है कि आर्यों के आगमन से पूर्व तक यहॉं के मूल निवासियों द्वारा ‘असुर’ शब्द को विशिष्ठ सम्मान सूचक अर्थ में विशेषण के रूप में उपयोग किया जाता था। क्योंकि संस्कृत में असुर को संधि विच्छेद करके ‘असु+र’ दो हिस्सों में विभाजित किया है और ‘असु’ का अर्थ ‘प्राण’ तथा ‘र’ का अर्थ ‘वाला’-‘प्राणवाला’ दर्शाया गया है।

एक अन्य स्थान पर असुनीति का अर्थ प्राणनीति बताया गया है। ॠग्वेद (10.59.56) में भी इसकी पुष्टि की गयी है। इस प्रकार प्रारम्भिक काल में ‘असुर’ का भावार्थ ‘प्राणवान’ और ‘शक्तिशाली’ के रूप में दर्शाया गया है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि अनार्यों में असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति को इतना अधिक सम्मान व महत्व प्राप्त था कि उससे प्रभावित होकर शुरू-शुरू में आर्यों द्वारा रचित वेदों में (ॠगवेद में) आर्य-वरुण तथा आर्यों के अन्य कथित देवों के लिये भी ‘असुर’ शब्द का विशेषण के रूप में उपयोग किये जाने का उल्लेख मिलता है। ॠग्वेद के अनुसार असुर विशेषण से सम्मानित व्यक्ति के बारे में यह माना जाता जात था कि वह रहस्यमयी गुणों से युक्त व्यक्ति है।

महाभारत सहित अन्य प्रचलित कथाओं में भी असुरों के विशिष्ट गुणों पर प्रकाश डालते हुए उन्हें मानवों में श्रेृष्ठ कोटि के विद्याधरों में शामिल किया गया है।

मगर कालान्तर में आर्यों और अनार्यों के मध्य चले संघर्ष में आर्यों की लगातार हार होती गयी और अनार्य जीतते गये। आर्य लगातार अनार्यों के समक्ष अपमानित और पराजित होते गये। इस कुण्ठा के चलते आर्य-सुरों अर्थात सुरा का पान करने वाले आर्यों के दुश्मन के रूप में सुरों के दुश्मनों को ‘असुर’ कहकर सम्बोधित किया गया। आर्यों के कथित देवताओं को ‘सुर’ लिखा गया है और उनकी हॉं में हॉं नहीं मिलाने वाले या उनके दुश्मनों को ‘असुर’ कहा गया। इस प्रकार यहॉं पर आर्यों ने असुर का दूसरा अर्थ यह दिया कि जो सुर (देवता) नहीं है, या जो सुरा (शराब) का सेवन नहीं करता है-वो असुर है।

लेकिन इसके बाद में ब्राह्मणों द्वारा रचित कथित संस्कृत धर्म ग्रंथों में असुर, दैत्य एवं दानव को समानार्थी के रूप में उपयोग किया गया है। जबकि ऐसा उल्लेख मिलता है कि प्रारम्भ में ‘दैत्य’ और ‘दानव’ असुर जाति के दो विभाग थे। क्योंकि असुर जाति के दिति के पुत्र ‘दैत्य’ और दनु के पुत्र ‘दानव’ कहलाये। जो आगे चलकर दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव, शुक्रशिष्य, दितिसुत, दूर्वदेव, सुरद्विट्, देवरिपु, देवारि आदि नामों से जाने गये।

जहॉं तक राक्षस शब्द की उत्पत्ति का सवाल है तो आचार्य चुतरसेन द्वारा लिखित महानतम ऐतिहासिक औपन्यासिक कृति ‘वयं रक्षाम:’ और उसके खण्ड दो में प्रस्तुत किये गये साक्ष्यों पर गौर करें तो आर्यों के आक्रमणों से अपने कबीलों की सुरक्षा के लिये भारत के मूल निवासियों द्वारा हर एक कबीले में बलिष्ठ यौद्धाओं को वहॉं के निवासियों को ‘रक्षकों’ के रूप में नियुक्ति किया गया। ‘रक्षक समूह’ को ‘रक्षक दल’ कहा गया और रक्षकों पर निर्भर अनार्यों की संस्कृति को ‘रक्ष संस्कृति’ का नाम दिया गया। यही रक्ष संस्कृति कालान्तर में आर्यों द्वारा ‘रक्ष संस्कृति’ से ‘राक्षस प्रजाति’ बना दी गयी।

निष्कर्ष : इस प्रकार स्पष्ट है कि आर्यों के आगमन से पूर्व यहॉं के मूल निवासी अनार्यों का भारत के जनपदों (राज्यों) (नीचे टिप्पणी भी पढें) पर सम्पूर्ण स्वामित्व और अधिपत्य था। जिन्होंने व्यापारी बनकर आये और यहीं पर बस गये आर्यों को अनेकों बार युद्धभूमि में धूल चटायी। जिन्हें अपने दुश्मन मानने वाले आर्यों ने बाद में घृणासूचक रूप में दैत्य, दानव, असुर, राक्षस आदि नामों से अपने कथित धर्म ग्रंथों उल्लेखित किया है। जबकि असुर भारत के मूल निवासी थे और वर्तमान में उन्हीं मूलनिवासियों के वंशजों को आदिवासी कहा जाता है।

टिप्पणी : अनार्य जनपदों में मछली के भौगोलिक आकार का एक मतस्य नामक जनपद भी था, जिसके ध्वज में मतस्य अर्थात् मछली अंकित होती थी-मीणा उसी जनपद के वंशज हैं। चालाक आर्यों द्वारा मीणाओं को विष्णू के मतस्य अवतार का वंशज घोषित करके आर्यों में शामिल करने का षड़यंत्र रचा गया और पिछले चार दशकों में जगह-जगह मीन भगवान के मन्दिरों की स्थापना करवा दी। जिससे कि मीणाओं का आदिवासी दर्जा समाप्त करवाया जा सके।
स्रोत : ‘हिन्दू धर्मकोश’, वयं रक्षाम: और अन्य सन्दर्भ।
लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’ प्रमुख-हक रक्षक दल
(‘हक रक्षक दल’-अनार्यों के हक की आवाज)

Sunday, August 10, 2014

विश्‍व आदिवासी दिवस-मनुवादी-आर्य शुभचिन्तक नहीं, शोषक हैं

विश्‍व आदिवासी दिवस-मनुवादी-आर्य शुभचिन्तक नहीं, शोषक हैं

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

‘‘9 अगस्त, 2014 को पूरे विश्‍व में विश्‍व आदिवासी दिवस मनाया गया। यदि इस अवसर पर कोई मौन रहा तो वो थी हिन्दुओं की तथाकथत संरक्षक विचारधारा की पोषक भारतीय जनता पार्टी की भारत सरकार, जिसकी ओर से इस असर पर एक शब्द भी आदिवासियों के उत्थान के लिये या आदिवासियों के बदतर हालातों के बारे में नहीं कहा गया। बल्कि भाजपा अपने राष्ट्रीय आयोजन के माफर्र्त देश को गुमराह करने में मशगूल दिखी। इससे एक बार फिर से यह बात सच साबित हो गयी कि हिन्दूवादी ताकतें, जिन पर आर्यों और मनुवादियों का शिकंजा कसा हुआ है, वे आदिवासियों को आदिवासी तक मानने को ही तैयार नहीं हैं। बल्कि इसके ठीक विपरीत मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें आर्यों को ही इस देश के मूल निवासी सिद्ध करने में लगी हुई हैं और भारत के असली मालिक और यहॉं के मूल निवासी आदिवासियों को वनवासी कहकर नष्ट करने का सुनियोजित षड़यंत्र चलाया जा रहा है।’’


विश्‍व में विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर यह सारांश भारत के विभिन्न राज्यों के आदिवासियों के आक्रोश और विचारों का देखने को मिला है। जो विभिन्न माध्यमों से 09 अगस्त, 2014 को आयोजनों, सभाओं और संदेशों के मार्फ़त विश्‍व आदिवासी दिवस को प्रकट हुआ है।


इसके अलावा अन्तरजाल पर मोबाइल के मार्फत तकनीक का अब आदिवासी भी उपयोग करना सीख रहा है, जहॉं पर मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें पूरी तरह से हावी हैं और वो देश और समाज को बरगाले में पीछे नहीं हैं। ये अहसास अब अनार्यों को भी हो रहा है। इस बात का जवाब भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न-भिन्न कारणों से फैले राजस्थान और मध्य प्रदेश के आदिवासियों ने विश्‍व आदिवासी दिवस पर देने का प्रयास किया है। इस दौरान आदिवासियों की ओर से विश्‍व आदिवासी दिवस तो हजारों स्थानों पर चर्चा, बैठक, रैली, सभा, गोष्ठी आदि के जरिये बढचढकर मनाया तो गया ही, इसके साथ-साथ जागरूक आदिवासियों की और से जो सन्देश आपस में प्रसारित किये गये, वे इस देश और इस देश के मूल निवासी आदिवासियों तथा अनार्यों के आने वाले कल के बारे में बहुत कुछ बयां करते हैं। यहॉं ऐसे ही कुछ संदेशों का सारांश और भावार्थ प्रस्तुत हैं :-


1. ‘‘पे बेक टू सोसायटी-एक सामाजिक जिम्मेदारी है।’’ : यह एक विचारधारा है, जिसके अनुसार हम जिस समाज के कर्जदार हैं, उसके प्रति हमारी कुछ नैतिक जिम्मेदारी है। जिसका निर्वाह करना समाज के प्रत्येक व्यक्ति का अनिवार्य कर्त्तव्य है। यह विचारधारा किसी संगठन की मोहताज नहीं है। हम में से कोई भी किसी भी संगठन से जुड़ा हो पर हमारा प्रथम कर्त्तव्य है कि भारत के असली मालिक और यहॉं के मूल निवासी आदिवासी जो आर्यों की नजर में अनार्य हैं, वे सब मिलकर आपास में एक दूसरे की मदद और सहयोग करें। जिसकी शुरुआत हम इस ग्रुप से जुड़े लोगों का सहयोग करके कर सकते हैं। पे बेक टू सोसायटी ग्रुप में अगर किसी भी सदस्य को परेशानी हो या समाज के किसी भी सदस्य की परेशानी का पता चले तो सभी उसका तत्काल सहयोग करें। सहयोग की ये भावना ही हम सभी को एक सूत्र में जोड़ेगी और हमारे आदिवासी प्रेम को प्रमाणित करेगी। सभी आदिवासी चाहे वो किसी भी जाति के हो या किसी भी राज्य में रहते हों, हम सभी  एक दूसरे के सहयोग की कसम खाते हैं। सभी भाइयों से अनुरोध है की वो सभी अपनी-अपनी जगह विश्‍व आदिवासी दिवस को "पे बेक टू सोसायटी-एक सामाजिक जिम्मेदारी" के नाम से अपने मित्र सगे सम्बन्धी और मिलने वाले सभी लोगों के साथ हर्षोल्लास के साथ अपने घरों पर दीप जलाकर मनायें और उसकी फोटो एक दूसरे को भेजें तथा आदिवासी समाज के विकास और एकता पर चर्चा करें। आज का दिन हम सभी के आने वाले भविष्य के लिए ऐतिहासिक दिन होने वाला है। हम सभी का आपसी सहयोग और कड़ा परिश्रम आदिवासी समाज तथा देश की एकता के लिए मिसाल बने। जय अदिवासी एकता।

2. आदिवासी युवा शक्ति का आह्वान : ‘‘वक्त आने दे बता देंगे, तुझे ऐ आसमां...हम अभी से क्या बताएँ, क्या हमारे दिल में है।’’ विश्‍व आदिवासी दिवस के मौके पर आर्यों के वंशज शोषकों को ज्ञात हो जाना चाहिये कि भारत का मूल निवासी अब जाग गया है। अब हम गॉंव-गॉंव ढाणी-ढाणी घूम-घूम कर लोगों को इस बात को बतायेंगे कि मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें हिन्दुत्व के नाम पर आदिवासियों को और अनार्यों को किस प्रकार से आर्यों की गुलाम बनाये रखने के लिये काम कर रही हैं? हम प्रतिज्ञा करते हैं कि इस देश में मनुवाद अधिक दिन तक चलने वाला नहीं है। इस देश को आर्यों के चंगुल और मनुवाद की मानसिक गुलामी से मुक्त करवाना ही होगा। इस आह्वान को जमीनी स्तर पर प्रमाणित करने वाले आयोजन जैसे सभा, रैली आदि भी देशभर में देखने को मिले।  

3. जयस संगठन का आह्वान : सभी साथियों को विश्‍व आदिवासी दिवस की बहुत सारी शुभकामनावों के साथ आज 9 अगस्त को जयस घोषणा करता है की जो भी आदिवासिओं के जल, जंगल, जमीन और आदिवासियों आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ आदिवासियों की संस्कृति के साथ खिलावाड़ करेगा जयस (मध्य प्रदेश से संचालित संगठन) उनके खिलाफ खुली लड़ाई लड़ेगा और आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावो में उन सभी राजनैतिक पार्टियों का खुला विरोध करेगा। जिनकी नीतियां आदिवासियों के हितों के खिलाफ बनाई जा रही हैं। जिनकी नीतिओं में आदिवासी बच्चों को भूख और कुपोषण से मरने को मजबूर किया जा रहा है। आज जयस घोषणा करता है कि देश के उन सभी आदिवासी जनप्रतिनिधियों का भी खुल्लम खुल्ला विरोध करेगा जो विधायक और सांसद बनने के बाद पूरे पांच साल तक आदिवासी मुद्दों पर चुप रहकर  अपनी अपनी राजनैतिक पार्टियों की गुलामी करते हैं। जयस देश के सभी आदिवासी युवाओं से अनुरोध करता है कि आप किसी भी राजनैतिक पार्टी का समर्थन करने की बजाय आदिवासी समुदाय के उन पढे-लिखे आदिवासी युवाओं को चुनकर विधानसभा और लोकसभा में भेजें जो आदिवासिओं के संवैधानिक अधिकारों के जानकार होने के साथ साथ संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ने वाले हों। दोस्तों यही बदलाव की सच्ची शुरुआत है और इसके लिए हम आप सभी को मिलकर लड़ना है, तभी हम यह लड़ाई जीत पाएंगे।



4. आरक्षण भीख नही है : जब सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू की रिपोर्ट से भी ये साबित हो चुका है कि भारत के असली उतराधिकारी आठ फीसदी आदिवासी ही हैं तो फिर आरक्षण पर सवाल उठाने वाले षड़यंत्रकारी मनुवादी लोगों को खुद की गिरवान में झांकना चाहिये कि वो कितने बड़े गुनेहगारों के वंशज है। जिन्होंने देश के मूल निवासियों को इन बदतर हालातों में पहुंचा दिया है। इस बात को एक उदाहरण के जरिये समझ सकते हैं कि-कोई आपके पास आपके मकान में किराये से रहने के लिए आता है और आप उसे मकान किराया पर दे देते है, लेकिन वो आपके मकान पर कब्जा कर लेता है, आप मकान खाली कराने को प्रयास करते हैं तो किरायेदार मकान मालिक को उसके ही मकान के 10 कमरों में से एक कमरा रहने को दे
देता है। मकान मालिक इतना प्रताड़ित आतंकित किया जाता है कि सब कुछ भूलकर उस एक कमरे में जीवन बिताने को मजबूर हो जाता है, लेकिन मकान पर जबरन काबिज आपराधिक प्रवृत्ति के लोग, मकान के मालिक को उस एक कमरे में से भी बेदखल करके बाहर निकालने के षड़यंत्र लगातार रचते रहते हैं। क्या यह न्याय है??????? आज इस देश में हमारे साथ यही नहीं हो रहा है? जिस देश की आदिवासियों का शतप्रतिशत हक था, उस हक को साढे सात फीसदी पर सीमित कर दिया गया और अब उसको भी छीने जाने के नये-नये कुचक्र चले जा रहे हैं। इस उदाहरण से कोई भी समझ सकता है कि सम्पूर्ण मकान अर्थात् पूरा भारत देश हमारा है, जिसमें आर्य लोग आकर ऐसे घुसे कि पूरे देश पर ही कब्जा कर लिया और हमारे सभी हकों छीनकर उन पर काबिज हो हो गये। एक कमरा अर्थात् जो संवैधानिक आरक्षण हमें डॉ. अम्बेड़कर के साथ गॉंधी द्वारा किये गए के धोखे के बाद दिया गया, अब उस आरक्षण को भी हटाने की मुहिम अन्य मूल आरक्षित वर्गों के साथ-साथ आदिवासियों के विरुद्ध भी तेजी से चलाई जा रही है। यह कितनी मनमानी और कितनी अन्याय पूर्ण बात है, इसे कोई भी इंसाफ पसन्द व्यक्ति आसनी से समझकर महसूस कर सकता है। इस प्रकार मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें आदिवासियों को उनके बचे कुचे हकों से भी वंचित करने जा रही हैं। हमें इसका साहसपूर्वक सामना करना होगा। अन्यथा मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें हमें कुचल देंगी, हमें नेस्तनाबूद कर देंगी। क्योंकि संविधान द्वारा बनाये गये सभी निकायों पर इनका एक छत्र कब्जा है। इसे हटाने के लिये सभी अनार्य जिनकी आबादी 90 फीसदी से अधिक है को एकजुट और संगठित होना होगा।



5. जयपुर में संयुक्त जनजाति संस्थान की सभा : इस अवसर पर अनुसूचित जनजाति संयुक्त संस्थान जयपर की सभा में आदिवासियों के साथ किये जा रहे भेदभाव के प्रति आक्रोश व्यक्त करने के साथ-साथ, संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव व यूनिसेफ के महानिदेशक के संदेशों को बैठक में पढकर सुनाया गया। इन संदेशों में आदिवासियों के हितों के लिए दिए गए सुझावोंं के क्रियान्वयन के लिए वृहद रूप रेखा तैयार की गई। जिसमें मुख्य रूप से यह संकल्प लिया गया कि राज्य के सभी आदिवासी एकजुट होकर अपने हितों की रक्षा के लिये आवश्यक कदम उठायेंगे। सरकार द्वारा फिर भी उदासीनता बरती गयी तो संस्थान को आन्दोलनात्मक कदम उठाने को मजबूर होना पड़ेगा।


6. निराशा भी दिखी : मोबाइलों पर देखने को मिला कि दोस्तों नेट, मोबाइल, फेसबुक और व्हाट्सअप पर कई सन्देश डालने के बाद भी सभी आदिवासी युवा उनके प्रचार-प्रसार करने में आगे नहीं आ रहा है। विश्‍व आदिवासी दिवस के मौके पर फालतू बातें डिस्कस करने की बजाय अपने संवैधानिक अधिकारों के बारे में चर्चा करें। ताकि आदिवासी समुदाय के पढेे लिखे लोगों में अपने संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूकता आये। लेकिन जयादातर पढेे लिखे आदिवासी युवा फालतू बातें करने में और भेड़ चाल चलने में आगे रहते हैं, जबकि अपने आदिवासी समुदाय की बात करने में उनको शर्म आती है जो कि आदिवासी समुदाय के अस्तित्व के लिए ठीक नहीं है। ऐसे लोगों को आदिवासियों की मूल जागरूक धारा के साथ जोड़ने के सन्देश भी जारी किये गए। 

7. दीप, सभा और हर्षोल्लास के साथ मनाया गया आदिवासी दिवस : राजस्थान और मध्य प्रदेश सहित देश के तकरीबन सभी आदिवासी बहुल राज्यों में और जहां-जहां भी आदिवासी वर्ग के लोग किसी भी वजह से निवास करते हैं, उन सभी ने विश्‍व आदिवासी दिवस को व्यक्तिगत रूप से अपने-अपने घरों में दीप जलाकर और बैठक व सभाओं में आपसी चर्चा करके हर्षोल्लास के साथ मनाया। पढेलिखे आदिवासियों ने वाटसेप, मेल और फेसबुक के जरिये भी विश्‍व आदिवासी दिवस की शुभकामनाएँ एक-दूसरे को ज्ञापित की। जिसे प्रस्तुत फोटोग्राफ से बखूबी समझा जा सकता है। यह अपने आप में आदिवासियों में तकनीक के इस्तेमाल के जरिये एक बड़ा बदलाव देखा जा सकता है।


8. हम हिन्दू नहीं, हम आदिवासी हैं, धार्मिक कोड की मांग : विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासियों के अनेक समूहों की ओर से इस बात को भी ताकत से उठाया गया कि आदिवासी हिन्दू नहीं है, बल्कि मनुवादी-आर्यों द्वारा उसे जबरन हिन्दू बनाये रखने के अनैतिक प्रयास और षड़यंत्र किये जाते रहते हैं। आदिवासियों को अलग से आदिवासी धर्म के रूप में धार्मिंक कोड प्रदान किये जाने की आवाज भी उठायी गयी। जिसका देश के अनेक राज्यों के आदिवासियों की ओर से पुरजोर समर्थन किया गया।


9. आदिवासियों में सभी सरकारों के प्रति आक्रोश : सारे देश के आदिवासियों में इस बात को लेकर गहरा आक्रोश और गुस्सा देखा गया कि भारत की केन्द्र सरकार सहित तकरीबन सभी राज्य सरकारों ने विश्‍व आदिवासी दिवस का सरकारी स्तर पर आयोजन नहीं किया और इस दिन की कोई परवाह नहीं की और सभी सरकारों की ओर से इस प्रकार से आदिवासियों को सरेआम अपमानित करने का प्रयास किया गया। जो आदिवासियों के बीच गहरी चिन्ता का विषय बन गया है। आदिवासियों की परवाह करने के बजाय सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अपने राष्ट्रीय जलसे के आयोजन में मशगूल रही। भाजपा सहित प्रधानमंत्री या किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री ने विश्व आदिवासी दिवस के दिन आदिवासियों के हिट में कोई कदम नहीं उठाया।  इससे आदिवासियों को इस बात का अहसास हो गया की उनकी औकात राजनैतिक दलों की नजर में वोट बैंक के आलावा कुछ भी नहीं है। आदिवासियों ने इस मौके पर तय किया है कि हमें हमारे सच्चे नेतृत्व तथा समर्पित को आगे लाना होगा और आदिवासियों की राजनैतिक ताकत को दलितों तथा अन्य कमजोर अनार्य जातियों के साथ मिलकर दिखाना होगा। 

 10. मनुवादी-आर्य शुभचिन्तक नहीं, शोषक और दुश्मन हैं : विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर आदिवासियों के सभी समूहों में यह एक बात समान रूप से सामने आयी है कि आदिवासी जो इस देश का असली मालिक है, उसे इस अब बात का अहसास होने लगा है कि मनुवादी-आर्यों द्वारा शासित हिन्दूवादी ताकतें उनकी मित्र या शुभचिन्तक नहीं, बल्कि उनकी असली दुश्मन और शोषक हैं। जिनका आम आदिवासियों और अनार्यों के पर्दाफाश किया जाना समय की मांग है। जिसके लिये सभी उम्र के आदिवासी समूहों को जागरूक किये जाने की सख्त जरूरत है। इसके लिये पे-बैक टू सोसायटी ग्रुप की ओर से सभी अनार्यों जातियों और वर्गों के सहयोग से एक मुहिम चलाने के लिये अलग-अलग ग्रुप तैयार किये जाने की बात भी कही गयी है। यदि आदिवासी इस मुहिम को चलाने में सफल हो पाते हैं तो आने वाले कुछ ही वर्षों में इस देश के मनुवाद के धार्मिक शिकंजे में कैद आदिवासी और अनार्यों की तकदीर में क्रान्तिकारी बदलाव की शुरूआत हो सकती है। 

11. आदिवासियों को तकनीक का उपयोग समझ में आया : विश्‍व आदिवासी दिवस के अवसर पर, देशभर में सबसे बड़ी और उल्लेखनीय बात यह देखने में आयी कि तकनीक के जरिये आदिवासियों द्वारा विचार विनिमय किये जाने की शुरूआत हो गयी है, जो आने वाले भविष्य में आदिवासियों के सभी समूहों को एक दूसरे के करीब लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मुहिम सिद्ध हो सकती है।-09875066111

Monday, May 2, 2011

परशुराम की जयन्ति मनाने का उद्देश्य?



डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

जो लोग अहिंसा, भ्रातृत्व, मानवता, समानता और इंसाफ की व्यवस्था में आस्था एवं विश्‍वास रखते हों, उनसे भारतीय इतिहास के सबसे क्रूर (सम्भवत:) और सामूहिक नर संहार करने वाले जघन्य अपराधी परशुराम की जयन्ति मनाना तो दूर, उसका नाम तक नहीं लेना चाहेंगे, लेकिन इस देश में ऐसे क्रूर अपराधी भी जयन्ति मनाई जाती है| जिस व्यक्ति (उसे व्यक्ति कहना भी इंसान जाति का अपमान है) ने एक बार नहीं, बल्कि अनेकों बार क्षत्रियों का सम्पूर्ण पृथ्वी से सामूहिक संहार किया हो, ऐसा व्यक्ति एक अच्छे व्यक्ति के रूप में तो दूर एक इंसान के रूप में भी याद किये जाने योग्य नहीं है| बल्कि ऐसे व्यक्ति को तो जिस प्रकार से रावण का पुतला जलाया जाता है, उसी प्रकार से क्षत्रियों को और मानवता के समर्थक तथा हिंसा का विरोध करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को परशुराम के पुतले जलाये जाने चाहिये| जिससे आज के समय के उन लोगों को को सबक मिल सके, जो मानव हत्या करना अपराध नहीं मानते हैं| आम लोगों के बीच सन्देश जा सके कि इतिहास हत्यारों को कभी माफ नहीं करता है|

केवल इतना ही नहीं, बल्कि परशुराम नामक क्रूर हत्यारा जातिवाद का भी कट्टर समर्थक था| वह ब्राह्मण के अलावा अन्य किसी भी जाति के लोगों को तब तक शस्त्रविद्या दान नहीं करता था, जब तक कि वह स्वयं शिक्षा पाने वाले को शिक्षा देने के लिये सहमत नहीं हों| अर्थात् शस्त्र विद्या सिखाने में परशुराम व्यक्ति की योग्यता या क्षमता नहीं, बल्कि जाति और अपनी इच्छा को ही प्राथमिक मानते थे| इसी कारण महाभारत के प्रमुख पात्र ‘‘कर्ण’’ को परशुराम से शस्त्र विद्या सीखने के लिये विवश होकर ‘‘ब्राह्मण’’ का रूप धारण करना पड़ा था और जैसे ही एक घटना के कारण परशुराम को ज्ञात हुआ कि जिस कर्ण को वे शिक्षा दे रहे हैं, वह ‘‘ब्राह्मण’’ नहीं, बल्कि ‘‘सूतपुत्र’’ है तो परशुराम ने निम्न जातियों के प्रति कटुता, घृणा, निर्दयता और हृदयहीनता का परिचय देते हुए ‘कर्ण को शाप दे दिया’ कि ‘‘कर्ण को जब भी परशुराम से सीखी शस्त्र विद्या की सर्वाधिक जरूरत पड़ेगी, तो वह परशुराम से सीखी शस्त्र विद्या को भूल जायेगा|’’ अनेक विद्वानों का मानना है कि परशुराम के इसी क्रूर और मनमाने शाप के कारण कर्ण, अर्जुन से अधिक दक्ष और योग्य यौद्धा होते हुए भी महाभारत के युद्ध में मारा गया|

परशुराम ने अपने जीवन में चाहे कितनी भी भक्ति और शक्ति अर्जित की हो, लेकिन उक्त दो धटनाएँ मात्र ही इस बात को प्रमाणित करने के लिये पर्याप्त हैं कि परशुराम नर के रूप में पिशाच था| जिसे याद करने की नहीं, बल्कि उसे हर कदम पर तिरस्कृत करने की जरूरत है, जिससे दुबारा कोई परशुराम बनने की हिम्मत नहीं कर सके| इसके विपरीत हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी ब्राह्मणों द्वारा परशुराम की जयन्ति ही नहीं, बल्कि जयन्ति सप्ताह समारोह पूर्वक मनाये जा रहे हैं, जो अक्षय तृतीया तक चलते हैं|

निश्‍चय ही यह इस बात का द्योतक है कि परशुराम की जयन्ति मनाने वाले ब्राह्मणों की दृष्टि में परशुराम एक महामानव था और उसके कार्य भी महान थे| जिनका आज की पीढी को अनुकण करना चाहिये| महान पुरुषों की जयन्तियों पर, महान लोगों के कार्यों से शिक्षा लेने का सन्देश दिया जाता है| परशुराम भक्तों की नजर में परशुराम महान नहीं, साक्षात राम हैं, ऐसा उनके द्वारा रचित ग्रन्थों में अनेकों स्थानों पर लिखा गया है, जिसके कार्यों, आचरण और आदर्शों को आज की पीढी को अपनाने के इरादे से ही परशुराम जयन्ति धूमधाम से मनाये जाने के कार्यक्रम देशभर में आयोजित किये जा रहे हैं|

अहिंसा का सन्देश देने वाले महावीर और गॉंधी के आजाद भारत में इससे अधिक अमानवीय, शर्मनाक, अपमानजनक, गैर-कानूनी और असंवैधानिक बात कुछ भी नहीं हो सकती| यदि अनेकों बार असंख्य क्षत्रियों का सामूहिक नरसंहार करने वाला हत्यारा परशुराम पूज्यनीय है तो फिर एक निहत्थे और वृद्ध मोहनदास कर्मचन्द गॉंधी की हत्या करने वाला नाथूराम गौडसे क्यों घृणित माना जावे? सम्भवत: इसी मानसिकता के समर्थक अनेक लोग नाथूराम गौडसे को भी शहीद मानते हैं और गुपचुप ही सही, लेकिन गौडसे की भी जयन्ति और बलिदान दिवस मनाने का अवसर नहीं चूकते हैं|

यह सब उस मूल आर्य संस्कृति की क्रूरता का ही असली रंग है, जो अपने छोटे से छोटे कर्मों को तो सर्वोत्तम, उल्लेखनीय और अनुकरणीय मानती है और दूसरों के सद्प्रयासों को भी हमेशा-हमेशा को समाप्त कर देना चाहती है| तभी तो ‘‘आर्यों के भगवान मनु’’ का मनुस्मृति के अध्याय एक में निम्न मनमानी व्यवस्था लिखने और उसे लागू करने का साहस हुआ-

मनुस्मृति के अध्याय एक श्‍लोक (95 व 96)

ब्राह्मण के मुख से देवता और पितर अपना हिस्सा (हव्य) खाते हैं|

इस श्‍लोक में मनु ने ब्राह्मणों के लिये जन्म-जन्मान्तर के लिये इस बात की स्थायी व्यवस्था कर दी है कि यदि ब्राह्मणों (भू-देवों अर्थात् पृथ्वी के साक्षात देवता) को शुद्ध घी, दूध, मलाई आदि से बने उत्तम पकवान खिलाओगे तो सभी पकवान सभी देवताओं और सभी पितरों (पूर्वजों) के पेट में पहुँच जायेगें| इसका अर्थ तो यही हुआ कि ब्राह्मण का पेट लैटर-बॉक्स है, जिसमें पकवान डालो और देवताओं तथा पूर्वजों को तृप्त कर दो|

श्‍लोक (97)-
संसार के सभी पांच माहभूतों और संसार में पाये जाने वाले सभी प्राणियों में ब्राह्मण ही सर्वश्रेृष्ठ है|

श्‍लोक (99)-
धर्म की पूर्ति के लिये जन्म लेने वाले प्राणी को ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है और केवल ब्राह्मण का जन्म ही धर्म की पूर्ति के लिये हुआ है| अत: मोक्ष की प्राप्ति पर ब्राह्मण का ही जन्मसिद्ध एकाधिकार है|

श्‍लोक (100 व 101)-
चूंकि ब्राह्मण धर्म की पूर्ति के लिये ब्रह्मा के मुख से पैदा हुआ है| अत: इस पृथ्वी पर जो कुछ भी धन, धान्य और खजाना (राजा का कोश) है, उस सब पर केवल ब्राह्मणों का ही (जन्मसिद्ध) अधिकार है| जबकि दूसरे सभी व्यक्ति केवल ब्राह्मण की दया पर निर्भर हैं| ब्राह्मण की इच्छा (अनुमति) से ही अन्य लोग अन्न, वस्त्र आदि प्राप्त कर सकते हैं|

श्‍लोक (102)-
चूँकि ब्राह्मण साक्षात देवता है| अत: ब्राह्मण का सभी धन, धान्य और खजाने पर पूर्ण अधिकार है| इस प्रकार वह किसी का दिया हुआ नहीं, बल्कि सबकुछ अपना ही खाता और भोगता है, जबकि दूसरे लोग ब्राह्मण की आज्ञा से ही अन्न, वस्त्र आदि वस्तुओं को ग्रहण कर सकते हैं|

मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्‍लोक 318 में तो ब्राह्मणों की श्रेृष्ठता सिद्ध करने के लिये यहॉं तक लिख दिया है कि-

मनुस्मृति के अध्याय 9 के श्‍लोक 318 में
 
‘‘ब्राह्मण चाहे कितने ही त्याज्य और निन्दनीय
कुकर्म करता हो, कुकर्मों में लीन ही क्यों न रहता हो,
लेकिन फिर भी ब्राह्मण पूज्यनीय ही है, क्योंकि वह
ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण
परमदेव अर्थात् सर्वोत्तम देवता है|’’
‘‘ब्राह्मण चाहे कितने ही त्याज्य और निन्दनीय कुकर्म करता हो, कुकर्मों में लीन ही क्यों न रहता हो, लेकिन फिर भी ब्राह्मण पूज्यनीय ही है, क्योंकि वह ब्राह्मण कुल में जन्म लेने के कारण परमदेव अर्थात् सर्वोत्तम देवता है|’’

इसके बाद कुछ भी कहने को शेष नहीं रह जाता है, लेकिन फिर भी ब्राह्मणों की मनमानी व्यवस्था की कभी न समाप्त होने वाली इस महागाथा को अल्पविराम देने से पूर्व यह जरूर लिखना चाहूँगा कि परशुराम की जयन्ति मनाने वाले ब्राह्मणों और मनु को भगवान मानने वाले ब्राह्मणों की दृष्टि में उनका हर कदम पर साथ देने वाली ‘‘मातृशक्ति’’ अर्थात् स्त्री का कितना सम्मान है?
‘‘स्त्रियों के साथ मैत्री नहीं हो सकती|
इनके दिल लक्कड़बग्घों से भी क्रूर होते हैं|’’
देखें-ॠगवेद मंत्र (10/95/15)

1. ‘‘स्त्री मन को शिक्षित नहीं किया जा सकता| उसकी बुद्धि तुच्छ होती है|’’ देखें-ॠगवेद मंत्र (8/33/17)

2. ‘‘स्त्रियों के साथ मैत्री नहीं हो सकती| इनके दिल लक्कड़बग्घों से भी क्रूर होते हैं|’’ देखें-ॠगवेद मंत्र (10/95/15)

3. ‘‘कृपणं ह दुहिता’’ अर्थात्-‘‘पुत्री कष्टप्रदा, दुखदायिनी होती है|’’ देखें-ब्राह्मण ग्रंथ, ऐतरेय ब्राह्मण मंत्र (7/3/1)

4. ‘‘पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का स्वभाव ही है| अत: बुद्धिमामनों को स्त्रियों से बचना चाहिये|’’ देखें-मनुस्मृति, अध्याय-2 (श्‍लोक-217)

5. ‘‘शास्त्र की यह मर्यादा है कि स्त्रियो के संस्कार वेदमन्त्रों से नहीं करने चाहिये, क्योंकि स्त्रियॉं मूर्ख और अशुभ होती हैं| (एक स्थान पर लिखा है कि क्योंकि निरेन्द्रिय व अमन्त्रा होने के कारण स्त्रियों की स्थिति ही असत्य रूप होती है)’’ देखें-मनुस्मृति, अध्याय-9 (श्‍लोक-18)

6. ‘‘विधवा स्त्री को दुबारा विवाह नहीं करना चाहिये, क्योंकि ऐसा करने से धर्म का नाश होता है|’’ देखें-मनुस्मृति, अध्याय-9 (श्‍लोक-64)

‘‘स्त्रियॉं कौनसा दुष्कर्म नहीं कर सकती|’’
देखें-चाणक्यनीतिदर्पण, अध्याय-10 (श्‍लोक-4)

7. ‘‘स्त्रियॉं कौनसा दुष्कर्म नहीं कर सकती|’’ देखें-चाणक्यनीतिदर्पण, अध्याय-10 (श्‍लोक-4)

और भी बहुत कुछ है, जो इस देश के 98 फीसदी लोगों को मूर्ख बनाकर, उनपर हजारों सालों से शासन करने वाले दो फीसदी, उन लोगों की असलीयत सामने लायेगा, जो मूल आर्य संस्कृति को फिर से इस देश पर लागू करने का षड़यंत्र रचते रहते हैं और इस षड़यंत्र में अनेक अनार्यों को भी शामिल कर लिया है| सावधान!

Sunday, May 1, 2011

‘भारत स्वाभिमान’ का कड़वा सच!

‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान
और मूल आर्यों की क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना
यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और मूल आर्यों की क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का अभियान मात्र है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ होना तय है| लेकिन फिर भी इन षड़यन्त्रकारियों के षड्यंतों के शिकार बहुसंख्यक भारतीयों को हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि इन षड़यन्त्रकारियों के पास अपार धन, गुण्डातन्त्र और बौद्धिक बल की ताकत है, जिसे आने वाले लोकसभा चुनावों में झोंक देने के लिये इन्होंने कमर कस ली है| यदि इस देश की 98 फीसदी आबादी आपने स्वाभिमान को जिन्दा रखना चाहती है, तो मूल आर्यों की क्रूरतम नीतियों की मानसिकता से ग्रस्त लोगों का अभी से उपचार करना शुरू कर दें| लोक सभा के चुनाव तक केवल मानसिकता शेष रहेगी!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’



बाबा रामदेव ने योग के नाम पर इस देश के लोगों के दिलों में स्थान बनाया| लोगों के स्वास्थ्य के लिये बाबा ने बहुत बड़ा काम किया| लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया| कुछ समय बाद "राजीव दीक्षित" नाम के एक विद्वान व्यक्ति को साथ में लेकर अपने मंच से और आस्था चैनल के माध्यम से तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर घर-घर में जानकारी दी गयी कि देश के राजनेता न मात्र भ्रष्ट हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्था को देश में लागू किया जा रहा है कि जिसके चलते देश को लूटकर विदेशी कम्पनियॉं भारत के धन को विदेशों में ले जा रही हैं|


जब श्री दीक्षित जी बाबा रामदेव के मंच से आँकड़ों सहित यह जानकारी देते तो लोगों का तालियों के रूप में अपार समर्थन मिलता था| लेकिन ये क्या जो बाबा रामदेव लाखों लोगों के हृदय रोग का सफलतापूर्वक उपचार करने का दावा करते रहते हैं, उन्हीं का अनुयाई, उन्हीं का एक मजबूत साथी पचास साल की आयु पूर्ण करने से पहले ही हृदयाघात के चलते असमय काल के गाल में समा गया| जिसका दाह संस्कार करने में साथ जाने वालों का आरोप है कि मृतक को हृदयाघात नहीं हुआ, बल्कि उसे कथित रूप से जहर दिया गया था, क्योंकि उसका शव नीला पड़ गया था!


कौन था यह इंसान? जो बाबा रामदेव का इतना करीबी होते हुए भी हृदयाघात का शिकार हो गया और जिसका शव नीला पड़ जाने पर भी, जिसका पोस्टमार्टम तक नहीं करवाया गया?

हिन्दू सन्तों का आरोप है कि
राजीव दीक्षित की मौत नहीं हुई,
बल्कि उसकी हत्या करवाई गयी|
जिसमें बाबा रामदेव सहित, उनके
कुछ बेहद करीबी लोगों पर सन्देह है!
वो दुर्भाग्यशाली व्यक्ति राजीव दीक्षित ही था| जो बाबा के अभियान के लिये रातदिन एक करके तथ्य और आँकड़े जुटा कर बाबा के लिये राजनैतिक भूमि तैयार कर रहा था, जिसे कथित रूप से इस बात का इनाम मिला कि वह बाबा के मंच से बाबा से अधिक पापूलर (लोकप्रिय) होता जा रहा था| बाबा से ज्यादा लोग राजीव दीक्षित को सुनना पसन्द करने लगे थे| राजीव दीक्षित के चले जाने के बाद अनेक कथित हिन्दू सन्तों का आरोप है कि राजीव दीक्षित की मौत नहीं हुई, बल्कि उसकी हत्या करवाई गयी| जिसमें बाबा रामदेव सहित, उनके कुछ बेहद करीबी लोगों पर सन्देह है!

इस प्रकार बाबा रामदेव का आन्दोलन योग से, स्वदेशी और राजीव दीक्षित के अवसान के रास्ते चलता हुआ ‘‘भारत स्वाभिमान’’ की यात्रा पर निकल पड़ा है|


देशभर में अनेकों लोगों द्वारा बाबा पर बार-बार आरोप लगाये जाते रहे हैं कि उनका असली या छुपा हुआ ऐजेण्डा हिन्दुत्वादी ताकतों और संघ सहित भाजपा को लाभ पहुँचाना है, लेकिन बाबा की ओर से इन बातों का बार-बार खण्डन किया जाता रहा है| यद्यपि सूचना अधिकार कानून के जरिये यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि देश के लोगों से राष्ट्र के उत्थान के नाम पर लिए गए चंदे में से बाबा के ट्रस्ट से भारतीय जनता पार्टी को चुनावी खर्चे के लिये लाखों रुपये तो चैक से ही दिये गये| बिना चैक नगद कितने दिये गये होंगे, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है! इस प्रकार बाबा का असली ‘‘संघी’’ चेहरा जनता के सामने आने लगा है|

‘‘भारत स्वाभिमान’’ के समर्थकों की ओर से जनता को बेशक बेवकूफ बनाया जाता हो कि बाबा का संघ या भाजपा या नरेन्द्र मोदी के मकसदों को पूरा करने से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन कथित राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के प्रखर समर्थक लेखक श्री सुरेश चिपलूनकर जी, जो अनेक मंचों पर संघ, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, संस्कृति, रामदेव और भारत स्वाभिमान के बारे में अधिकारपूर्वक लम्बे समय से लिखते रहे हैं| जिनके बारे में कहा जाता है कि वे तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही अपनी बात कहना पसन्द करते हैं| यही नहीं, इनके लिखे का आर एस एस, विश्व हिन्दू परिषद् और भाजपा से जुड़े हुए तथा कथित राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति के समर्थक लेखक, विचारक तथा टिप्पणीकार आँख बंद करके समर्थन भी करते रहे हैं| ऐसे विद्वान समझे जाने वाले संघ, नरेन्द्र मोदी, भाजपा और बाबा रामदेव के पक्के समर्थक लेखक श्री सुरेश चिपलूनकर रामदेव Vs अण्णा = “भगवा” Vs “गाँधीटोपी सेकुलरिज़्म”?? (भाग-2) शीर्षक से लिखे गए और प्रवक्ता डोट कॉम पर 27 अप्रेल, 2011 को प्रकाशित अपने एक लेख में साफ शब्दों में लिखते हैं कि-


देश में कांग्रेस के खिलाफ़ जोरदार माहौल
तैयार हो रहा था, जिसका नेतृत्व एक
भगवा वस्त्रधारी (बाबा रामेदव) कर रहा,
आगे चलकर इस अभियान में
नरेन्द्र मोदी और संघ का भी
जुड़ना अवश्यंभावी
‘‘......बाबा रामदेव देश भर में घूम-घूमकर कांग्रेस, सोनिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ माहौल तैयार कर रहे थे, सभाएं ले रहे थे, भारत स्वाभिमान नामक संगठन बनाकर, मजबूती से राजनैतिक अखाड़े में संविधान के तहत चुनाव लड़ने के लिये कमर कस रहे थे, मीडिया लगातार 2जी और कलमाडी की खबरें दिखा रहा था, देश में कांग्रेस के खिलाफ़ जोरदार माहौल तैयार हो रहा था, जिसका नेतृत्व एक भगवा वस्त्रधारी (बाबा रामेदव) कर रहा था, आगे चलकर इस अभियान में नरेन्द्र मोदी और संघ का भी जुड़ना अवश्यंभावी था| और अब पिछले 15-20 दिनों में माहौल ने कैसी पलटी खाई है नेतृत्व और मीडिया कवरेज अचानक एक गॉंधी टोपीधारी व्यक्ति (अन्ना हजारे) के पास चला गया है, उसे घेरे हुए जो टोली (भूषण, हेगड़े, केजड़ीवाल आदि) काम कर रही है, वह धुर हिन्दुत्व विरोधी एवं नरेन्द्र मोदी से घृणा करने वालों से भरी हुई है....’’

इसी लेख में अपनी मनसा को जाहिर करते हुए उक्त लेखक लिखते हैं कि-

गोविन्दाचार्य 
सुब्रह्मण्यम स्वामी
‘‘...........मुख्य बात तो यह है कि जनता को क्या चाहिये- 1) एक फ़र्जी और कठपुतली टाइप का जन-लोकपाल देश के अधिक हित में है, जिसके लिये अण्णा मण्डली काम कर रही है अथवा 2) कांग्रेस जैसी पार्टी को कम से कम 10-15 साल के लिये सत्ता से बेदखल कर देना, जिसके लिये नरेन्द्र मोदी, रामदेव, सुब्रह्मण्यम स्वामी, गोविन्दाचार्य जैसे लोग काम कर रहे हैं? कम से कम मैं तो दूसरा विकल्प चुनना ही पसन्द करूंगा....’’

इसी लेख के अंत में निष्कर्ष के रूप में अपने इरादों को जाहिर करते हुए उक्त लेखक श्री सुरेश चिपलूणकर जी लिखते हैं कि-

भारत पर शासन करने के लिए गठजोड़
भारत पर शासन करने के लिए गठजोड़
‘‘....हम जैसे अनसिविलाइज़्ड आम आदमी की सोसायटी का भी एक लक्ष्य है, देश में सनातन धर्म की विजय पताका पुनः फ़हराना, सेकुलर कीट-पतंगों एवं भारतीय संस्कृति के विरोधियों को परास्त करना रामदेव बाबा-नरेन्द्र मोदी सरीखे लोगों को उच्चतम स्तर पर ले जाना, और इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, कांग्रेस जैसी पार्टी को नेस्तनाबूद करना|’’

श्री सुरेश चिपलूनकर जी द्वारा लिखे गए उपरोक्त विवरण से इस देश के लोगों को बाबा रामदेव के असल मकसद को समझने में किसी प्रकार का शक-सुबहा नहीं होना चाहिए|

‘‘भारत स्वाभिमान’’ के नाम पर बाबा रामदेव इस देश में गुजरात में धर्म विशेष के लोगों के सामूहिक नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिन्दुत्व के नाम पर मनुस्मृति को लागू करवाना चाहते हैं|

मुठ्ठीभर आर्यों की मौलिक संस्कृति के अन्धभक्त दो प्रतिशत लोगों के आपराधिक षड़यन्त्रों को सनातन धर्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के नाम पर 98 फीसदी लोगों पर थोपना चाहते हैं|

जबकि इनकी सनातन धर्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की परिभाषा वही है जो मनुस्मृति आदि ब्राह्मण ग्रंथों में लिखी गयी है| जिसके चलते आर्य संस्कृति मानव जाति के सिरमौर और स्वयं को भू-देव (इस पृथ्वी के साक्षात देवता) कहलाने वाले ब्राह्मण, अपनी पत्नी, बेटी और पत्नी तक को समानता और स्वतंत्रता का हक़ देना धर्म और संस्कृति के खिलाफ करार देते रहे हैं|

‘‘नियोग बलात्कार का लाईसेंस"
जिसके चलते विधवा विवाह को भी निन्दनीय करार देकर, अमानवीय और आपराधिक ‘‘सतिप्रथा’’ का खुला समर्थन करते रहे हैं और किन्हीं कारणों से ‘‘सति’’ नहीं हो सकने वाली स्त्रियों को सम्पूर्ण जीवन विधवा के रूप में गुजारते हुए ‘‘नियोग’’ नामक धार्मिक ढाल के रूप में अपनाये जाने वाले बलात्कार के लाईसेंस के जरिये ‘‘नियोग’’ के लिये सर्वोत्कृष्ट प्रथम पात्र ‘‘ब्राह्मणों’’ को आजीवन असंख्य विधवा स्त्रियों के साथ ‘‘नियोग’’ के बहाने बलात्कार करते रहने को भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म के अनुकूल और पवित्र मानते रहे हैं|

वेदव्यास को  विचित्रवीर्य की
दो पत्नियों के साथ ‘‘नियोग’’
के बहाने गर्भाधान (बलात्कार)
करने के लिये बुलाया गया|
जिसका अकाट्य प्रमाण है, महा भारत काल के सबसे कुरूप पुरुष और नाजायज माता-पिता की औलाद (जिसके माता-पिता, विवाहित पति-पत्नी नहीं, बल्कि आपस में कथित रूप से पिता-पुत्री थे) वेदव्यास को केवल ब्राह्मण ॠषी पाराशर का पुत्र होने के कारण विचित्रवीर्य की दो पत्नियों के साथ ‘‘नियोग’’ के बहाने गर्भाधान (बलात्कार) करने के लिये बुलाया गया| परिणामस्वरूप तथाथित एवं आर्यधर्म नीति के अनुसार ‘‘नियोग’’ हेतु सर्वोत्कृष्ट प्रथम पात्र ‘‘ब्राह्मण’’ वेदव्यास द्वारा किये गये संभोग (जो हकीकत में बलात्कार था) और उनके कथित उत्तम वीर्य से नपुंसक पाण्डू और अन्धे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ|


इन सब बातों से यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और आर्यों की मूल क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का एक मात्र अभियान है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या साध्वी राजनेत्री उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ हो जायेगा|
क्रूर और अमानवीय आर्य संस्कृति

ऐसी क्रूर और अमानवीय आर्य संस्कृति के संवाहकों की स्त्री, दमित, दलित, आदिवासी और पिछड़ों के बारे में क्या सोच है, इसे सारा संसार जानता है! ये लोग स्त्री, दमित, दलित, आदिवासी और पिछड़ों को तो इंसान तक मानने को तैयार नहीं हैं!

लेकिन मुसलमानों से या ईसाईयों से हिन्दुओं को लड़ाने की जब-जब बात आती है तो इन्हें सबसे बलवान हिन्दू केवल और केवल दलित, आदिवासी और पिछड़ों में ही नज़र आते हैं! आखिर क्यों यह भी हर दलित, आदिवासी और पिछड़े हिन्दू के लिये विचारणीय है| यदि फिर भी समझ में नहीं आता है तो गुजरात में जाकर देखें| गुजरात में मुसलामनों के नरसंहार के आरोपियों में जितने हिन्दुओं पर मुकदमे चलाये जा रहे हैं या जितनों को सजा हुई है, उनकी हकीकत जानी जा सकती है| यहॉं तक कि मरने वाले हिन्दुओं में भी अधिकतर दलित, आदिवासी और पिछड़े ही थे|



उपरोक्त लेख में चाहे-अनचाहे प्रकट जानकारी से यह तो साफ़ हो ही गया है कि ‘‘भारत स्वाभिमान’’ के नाम से बाबा रामदेव के मार्फ़त नरेन्द्र मोदी, संघ और अनार्यों तथा गैर-हिन्दुओं के विरुद्ध षड़यंत्र रचने में माहिर लोगों द्वारा अध्यात्मवाद, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर चलाया जा रहा नाटकीय अभियान ‘‘भारत स्वाभिमान’’ हिन्दूअनार्यों को हिन्दुत्व की एकता और अस्मिता की रक्षा के मोहपाश में फंसाकर, हिन्दुअनार्यों और गैर हिन्दुओं को फिर से मूल आर्यों की क्रूरता के शिकंजे में फंसाने हेतु संचालित किया जा रहा है|

क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की जयन्ति
जिससे इस देश के हर अनार्य को ही नहीं, बल्कि आर्य स्त्रियों, आर्य आम गरीब और पिछड़े लोगों (गरीब, तंगहाली, शोषण, अत्याचार, भेदभाव, मिलावट, कालाबाजारी आदि के शिकार ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रियों) को सजग तथा सतर्क रहने की बेहद जरूरत है| क्योंकि भारत स्वाभिमान के नाम पर जिस मानसिकता के लोगों द्वारा यह नाटकीय अभियान मुखौटे लगाकर चलाया जा रहा है, उनकी मानसिकता इतिहास में कैसी रही है? इसे जानने के लिये इतना सा जान लेना पर्याप्त होगा कि मूल आर्यों के अपने रक्षक के रूप में साथ आये, आर्य मूल के क्षत्रियों तक को इन्होंने नहीं छोड़ा और जिन आर्यों के द्वारा भारत भूमि को एक बार नहीं, बल्कि अनेकों बार क्षत्रिय विहीन कर दिया गया हो और क्षत्रियों के क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की पूजा करने में गौरव का अनुभव करते हों, क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की जयन्ति मनाते हों और क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की जयन्ति को सरकार के मार्फत सार्वजनिक अवकाश घोषित करने के लिये लगातार प्रयास कर रहे हों, उन पर भी यदि कोई व्यक्ति विश्वास करता है तो उसको बचाने वाला इस संसार में कोई नहीं है?



लेकिन सुखद अनुभव करने वाली बात यह है कि इस देश के अनार्यों को ही नहीं, बल्कि आर्य स्त्रियों और आर्य आम लोगों (ब्राह्मण-बनिया को भी) तथा अनार्य क्षत्रियों को अब क्रूर मूल आर्य मानसिकता से ग्रस्त, घृणित-अमानवीय लोगों के मुखौटों के पीछे छिपी असली और षड़यन्त्रकारी आपराधिक चेहरे दिखने लगे हैं और अब बहुत कुछ समझ में भी आने लगा है|

जिसके चलते यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और मूल आर्यों की क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का अभियान मात्र है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ होना तय है| लेकिन फिर भी इन षड़यन्त्रकारियों के षड्यंतों के शिकार बहुसंख्यक भारतीयों को हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि इन षड़यन्त्रकारियों के पास अपार धन, गुण्डातन्त्र और बौद्धिक बल की ताकत है, जिसे आने वाले लोकसभा चुनावों में झोंक देने के लिये इन्होंने कमर कस ली है| यदि इस देश की 98 फीसदी आबादी आपने स्वाभिमान को जिन्दा रखना चाहती है, तो मूल आर्यों की क्रूरतम नीतियों की मानसिकता से ग्रस्त लोगों का अभी से उपचार करना शुरू कर दें| लोक सभा के चुनाव तक केवल मानसिकता शेष रहेगी!

Saturday, April 23, 2011

सिविल सोसायटी नायकों के चेहरों पर कितने मुखौटे लगे हैं?


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

आजकल ऐसे नवोदित और परिष्कृत कहलाने वाले लेखकों को अन्ना हजारे प्रकरण के बहाने कांग्रेस को पानी पी पीकर कोसने का एक नया अवसर मिल गया है! ऐसे में यदि ये मान भी लिया जाये कि भ्रष्टाचार सहित इस देश की सारी समस्याओं की असली कारक केवल कांग्रेस ही है, तो फिर देश के लोगों को लगे हाथ कांग्रेस का विकल्प (और सभी समस्याओं का समाधान) भी ऐसे लेखकों को अवगत कराना चाहिए| जिससे देश के दलित, पिछड़े, आदिवासी, अनपढ़, कम पढ़े आम लोगों को देश पर शासन कर सकने वाला अगला विकल्प तो ज्ञात हो जाता और जिनका विकल्प पेश किया जाना है, उनके बारे में भी देश के लोगों को पता चल जाता कि-



कौन हैं वे-
दूध के धुले,
न्यायप्रिय और
इंसाफ पसंद लोग जो-
इस भ्रष्ट,
उत्पीड़क,
भेदभावपूर्ण,
शोषक,
उत्पीड़क,
मानव मानव में विभेद करने वाली और
दस फीसदी आर्यों द्वारा,
आर्यों ही के इशारों पर,
केवल आर्यों एवं उनके चमचों के हित में और
नब्बे फीसदी अनार्यों के विरुध्द संचालित व्यवस्था को
बदलकर, नब्बे फीसदी अनार्यों के हित में सरकार संचालित करने का
विश्वास दिला सकते हैं?

क्योंकि अपने ही रक्षकों (अर्थात आर्य क्षत्रियों) के क्रूर हत्यारे (परसराम) के वंशजों (आर्यों) से या उनके मोहपाश में गिरफ्त या उनके प्रभाव में दिग्भ्रमित अनार्यों से तो अब आगे आशा करना, अपने आप को ही धोखा देना होगा! बेशक ये लोग कितने ही चोला क्यों न बदल लें! वैसे भी आजादी के बाद से सत्ता के लिए कितने चोले बदले गए हैं?

गांधीवाद, समाजवाद, साम्यवाद, सामाजिक न्याय, राष्ट्रवाद, दलित उत्थान, गरीबी मिटाओ, मस्जिद गिराओ-मंदिर बनाओ और राम राज्य लाओ आदि के नाम पर कुर्सी संभालने वालों का असली और नंगा चरित्र देश की जनता को पता चल चुका है!

कोई इण्डिया को चमकाता है तो कोई भारत का उदय करता है, लेकिन सब के सब भारत की नहीं, केवल इण्डिया (कार्पोरेट, अफसरशाही, उद्योगपतियों आदि पांच सितारा संस्कृति के संवाहकों) की ही चिंता करते नज़र आते हैं!

और तो और कुछ लोगों को सिविल सोसायटी भी इन्हीं का एक नया रूप नज़र आने लगी है?

जो लोग विदेशों से धन लेकर और विदेशी सम्मान लेकर देश के सम्मान के लिए आंसू बहाते हैं, उनके बारे में देश के लोगों को जानना होगा कि इनके आंसू कहीं फ़िल्मी नायकों की भांति ग्लिसरीन के आंसू तो नहीं? साथ ही सिविल सोसायटी के इन नायकों के चेहरों पर कितने मुखौटे लगे हैं ये भी अन्ना हजारे प्रकरण के बाद जानना अब जरूरी हो गया है!