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Tuesday, July 19, 2011

विभागीय जाँच रूपी अभेद्य सुरक्षा कवच को भेदना होगा!

इन दिनों देशभर में लोकपाल कानून को बनाये जाने और लोकपाल के दायरे में ऊपर से नीचे तक के  सभी स्तर के लोक सेवकों को लाने की बात पर लगातार चर्चा एवं बहस हो रही है| सरकार निचले स्तर के लोक सेवकों को लोकपाल की जॉंच के दायरे से मुक्त रखना चाहती है, जबकि सिविल सोसायटी के प्रतिनिधि सभी लोक सेवकों को लोकपाल के दायरे में लाना चाहते हैं| ऐसे में लोक सेवकों को वर्तमान में दण्डित करने की व्यवस्था के बारे में भी विचार करने की जरूरत है| इस बात को आम लोगों को समझने की जरूरत है कि लोक सेवकों को अपराध करने पर सजा क्यों नहीं मिलती है|

लोक सेवकों को सजा नहीं मिलना और लोक अर्थात् आम लोगों को लगातार उत्पीड़ित होते रहना दो विरोधी और असंवैधानिक बातें हैं| नौकर मजे कर रहे हैं और नौकरों की मालिक आम जनता अत्याचार झेलने को विवश है| आम व्यक्ति से भूलवश जरा सी भी चूक हो जाये तो कानून के कथित रखवाले ऐसे व्यक्ति को हवालात एवं जेल के सींखचों में बन्द कर देते हैं| जबकि आम जनता की रक्षा करने के लिये तैनात और आम जनता के नौकर अर्थात् लोक सेवक यदि कानून की रक्षा करने के बजाय, स्वयं ही कानून का मखौल उड़ाते पकडे़ जायें तो भी उनके साथ कानूनी कठोरता बरतना तो दूर किसी भी प्रकार की दण्डिक कार्यवाही नहीं की जाती! आखिर क्यों? क्या केवल इसलिये कि लोक सेवक आम जनता नहीं है या लोक सेवक बनने के बाद वे भारत के नागरिक नहीं रह जाते हैं? अन्यथा क्या कारण हो सकता है कि भारत के संविधान के भाग-3, अनुच्छेद 14 में इस बात की सुस्पष्ट व्यवस्था के होते हुए कि कानून के समक्ष सभी लोगों को समान समझा जायेगा और सभी को कानून का समान संरक्षण भी प्राप्त होगा, भारत का दाण्डिक कानून लोक सेवकों के प्रति चुप्पी साध लेता है?

पिछले दिनों राजस्थान के कुछ आईएएस अफसरों ने सरकारी खजाने से अपने आवास की बिजली का बिल जमा करके सरकारी खजाने का न मात्र दुरुपयोग किया बल्कि सरकारी धन जो उनके पास अमनत के रूप में संरक्षित था उस अमानत की खयानत करके भारतीय दण्ड संहिता की धारा 409 के तहत वर्णित आपराधिक न्यासभंग का अपराध किया, लेकिन उनको गिरफ्तार करके जेल में डालना तो दूर अभी तक किसी के भी विरुद्ध एफआईआर तक दर्ज करवाने की जानकारी समाने नहीं आयी है| और ऐसे गम्भीर मामले में भी जॉंच की जा रही है, कह कर इस मामले को दबाया जा रहा है| हम देख सकते हैं कि जब कभी लोक सेवक घोर लापरवाही करते हुए और भ्रष्टाचार या नाइंसाफी करते हुए पाये जावें तो उनके विरुद्ध आम व्यक्ति की भांति कठोर कानूनी कार्यवाही होने के बजाय, विभागीय जॉंच की आड़ में दिखावे के लिये स्थानान्तरण या ज्यादा से ज्यादा निलम्बन की कार्यवाही ही की जाती है| यह सब जानते-समझते हुए भी आम जनता तथा जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि चुपचाप यह तमाशा देखते रहते हैं| जबकि कानून के अनुसार लोक सेवकों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही के साथ-साथ भारतीय आपराधिक कानूनों के तहत दौहरी दण्डात्मक कार्यवाही किये जाने की व्यवस्था है|

इस प्रकार की घटनाओं में पहली नजर में ही आईएएस अफसर उनके घरेलु बिजली उपभोग के बिलों का सरकारी खजाने से भुगतान करवाने में सहयोग करने वाल या चुप रहने वाले उनके साथी या उनके अधीनस्थ भी बराबर के अपराधी हैं| जिन्हें वर्तमान में जेल में ही होना चाहिये, लेकिन सभी मजे से सरकारी नौकरी कर रहे हैं| ऐसे में विचारणीय मसला यह है कि जब आईएएस अफसर ने कलेक्टर के पद पर रहेतु अपने दायित्वों के प्रति न मात्र लापरवाही बरती है, बल्कि घोर अपराध किया है तो एसे अपराधियों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता एवं भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के तहत तत्काल सख्त कानूनी कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है? नीचे से ऊपर तक सभी लोक सेवकों के मामलों में ऐसी ही नीति लगातार जारी है| जिससे अपराधी लोक सेवकों के होंसले बुलन्द हैं!

इन हालातों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी सेवा में आने से कोई भी व्यक्ति महामानव बन जाता है? जिसे कानून का मखौल उड़ाने का और अपराध करने का ‘विभागीय जॉंच’ रूपी अभेद्य सुरक्षा कवच मिला हुआ है| जिसकी आड़ में वह कितना ही गम्भीर और बड़ा अपराध करके भी सजा से बच निकलता है| जरूरी है, इस असंवैधानिक और मनमानी व्यवस्था को जितना जल्दी सम्भव हो समाप्त किया जावे| इस स्थिति को सरकारी सेवा में मेवा लूटने वालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता| क्योंकि सभी चोर-चोर मौसेरे भाई होते हैं, जो हमेशा अन्दर ही अन्दर एक-दूसरे को बचाने में जुटे रहते हैं| आम जनता को ही इस दिशा में कदम उठाने होंगे| इस दिशा में कदम उठाना मुश्किल जरूर है, लेकिन असम्भव नहीं है| क्योंकि विभागीय जॉंच कानून में भी इस बात की व्यवस्था है कि लोक सेवकों के विरुद्ध विभागीय कार्यवाही के साथ-साथ आपराधिक मुकदमे दायर कर आम व्यक्ति की तरह लोक सेवकों के विरुद्ध भी कानूनी कार्यवाही की जावे| जिसे व्यवहार में ताक पर उठा कर रख दिया गया लगता है| अब समय आ गया है, जबकि इस प्रावधान को भी आम लोगों को ही क्रियान्वित कराना होगा| अभी तक पुलिस एवं प्रशासन कानून का डण्डा हाथ में लिये अपने पद एवं वर्दी का खौफ दिखाकर हम लोगों को डराता रहा है, लेकिन अब समय आ गया है, जबकि हम आम लोग कानून की ताकत अपने हाथ में लें और विभागीय जॉंच की आड़ में बच निकलने वालों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमे दर्ज करावें| जिससे कि उन्हें भी आम जनता की भांति कारावास की तन्हा जिन्दगी का अनुभव प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हो सके और जिससे आगे से लोक सेवक, आम व्यक्ति को उत्पीड़ित करने तथा कानून का मखौल उड़ाने से पूर्व दस बार सोचने को विवश हों|

लेखक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित और अठारह राज्यों में प्रसारित हिन्दी पाक्षिक) तथा राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)

Sunday, February 20, 2011

एक साथ काम करना सफलता है!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

श्री संजय राणा जी ने क्रान्तिकारी देशभक्त हिन्दुस्तान के नाम से इसी ब्लॉग पर प्रकाशित मेरे आलेख "आपने पुलिस के लिये क्या किया" पर निम्न टिप्पणी दी है।

"बहुत ही सही कहा है आपने पर कुछ पुलिस वाले होते ही ऐसे हैं जैसे ही खाकी में आते हैं उनका रूप ही बदल जाता है अभी कल की ही बात है हम अपनी बोलेरो गाड़ी से बरोटीवाला हिमाचल से करनाल हरयाना के लिए जा रहे थे तो जैसे ही हमारी गाड़ी अम्बाला क्रोस करके निकली तो पुलिस के एक नाके ने हमें हाथ दिया हमने गाड़ी सईड की और इतने में एक कोंस्टेबल आया और ड्राईवर को कहने लगा की गाड़ी के कागज़ दिखा तो ड्राईवर ने सारे सम्बंधित कागजात दिखाए फिर उसने लाईन्सेंस माँगा उसने वो भी दिखा दिया, इतने में वो कहने लगा नीचे उतर और साहब के पास आजा, वो ड्राईवर भी उतर गया और साथ ही साथ दूसरी तरफ से में भी उसके साथ उनके बड़े साहब के पास पहुंचा वो कड़क आवाज में पूछा कितने आदमी बैठे हैं गाड़ी में ड्राईवर ने कहा साहब आठ और एक में यानी कुल नौ , साहब कहने लगा कितने पास हैं गाड़ी में उसने कहा इतने ही पास हैं साहब जितने बिठाये हैं कहने लगा बेवकूफ बनाता है मेरा उसने कहा साहब इसमें बेवकूफ की कोण सी बात है कहने लगा तुने सीट बेल्ट क्यूँ नि लगा रखी थी उसने कहा साहब लगा राखी थी पर जब आपके पास आना था तो वो तो खोल के ही आना पडेगा पर वो कहाँ माने कहा मन्ने बेवकूफ ब्न्नावे तू बीस साल हो गए नोकरी कर्वे से, ये तो चालान हे तेरा हमने रक्वेस्ट भी की की साहब क्यूँ जान बूझ के कर रहे हो पर वो नि मन और उसने सीट बेल्ट का चालान कर ही दिया और कहा सिर्फ सौ रुपे का चालान करा मेने तेरे लिए इन्ना करूँ की दस दिना के अंदर अंदर अपनी आर सी अम्बाला पुलिस लाईन ते ले जावें आईके बस जा अब क्या मुंह देखे खड़े खड़े से...
बस इतना तानाशाह सारा मूड ही खराब हो गया तो फिर आप ही बताओ की कैसे हैं ये वर्दी वाले हमारे सेवक..."
उक्त टिप्पणी के प्रतिउत्तर में, मैंने श्री संजय जी को निम्न जानकारी प्रस्तुत की है:-

आदरणीय श्री संजय राणा जी,
नमस्कार।

आशा है कि आप कुशल होंगे।

आपने बास-वोइस पर टिप्पणी की एवं बास-वोइस पर प्रकाशित अनेक आलेखों को अपने ब्लॉग पर भी प्रकाशित किया हुआ है। केवल इतना ही नहीं, बल्कि आपने अपने ब्लॉग पर भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) की सदस्यता के लियेhttp://baasindia.blogspot.com का लिंक भी दिया हुआ है। यह सब आपके एक अच्छे व्यक्ति होने की प्रीतीति कराने के संकेत हैं। इस सबके लिये बास के 17 राज्यों में सेवारत 4610 आजीवन सदस्यों की ओर से मैं आपका आभार ज्ञापित करता हूँ। आपकी ओर से कुछ सवाल भी उठाये गये हैं। इन सबके बारे में कुछ बातें आपके समक्ष रखना जरूरी समझता हूँ। यदि एक भी बात अनुचित लगे तो कृपया अवगत कराने का कष्ट करें :-

यह बात सही है और हम सभी जानते भी हैं कि देशभर में भ्रष्टाचार हर जगह पर व्याप्त है। जिसके शिकार सभी आम लोग हो रहे हैं। मैं ऐसा मानता हूँ कि अब समय बहुत तेजी से बदल रहा है। केवल इतने से ही काम नहीं चल सकता कि हम सही हैं और कानून का पालन करते हैं, इस कारण हमें कोई परेशान नहीं करें। आप रोड पर चलते समय इस बात का अनेकों बार अहसास कर सकते हैं। जब आप यातायात नियमों का पालन करते हुए वाहन चलाते हैं या पैदल चलते हैं। फिर भी दुर्घटना हो जाती है या होते-होते बचती है। कहने का मतलब यह है कि आपको सडक पर चलना है तो न मात्र स्वयं यातायात के नियमों का पालन करना है, बल्कि दूसरों द्वारा नियमों का पालन नहीं करने से भी अपने आपको बचाना होगा। क्या करोगे जिन्दा रहने के लिये जरूरी है।

इसी प्रकार से हमें भ्रष्ट व्यवस्था में रहते हुए यदि स्वयं को भ्रष्टाचार से बचाना है तो न मात्र स्वयं सही रहना होगा, बल्कि इसके साथ-साथ हमें अपने बचाव एवं संरक्षण के सरकार से इतर भी कुछ उपाय करने होंगे। जब बर्षात हो रही होती है या होने की सम्भावना होती है तो हम घर से छतरी या रैनकोट साथ में लेकर निकलते हैं। यद्यपि इसके बावजूद भी अनेक बार हम बर्षात में न मात्र भीग जाते हैं, बल्कि बीमार भी हो जाते हैं। क्योंकि तूफानी बर्षात छतरी को भी उडा ले जाती है। बर्षात के साथ ओले गिरने पर छतरी या रैनकोट बचाव नहीं कर सकते हैं। इसके बावजदू भी हम बर्षात से बचाव के लिये घर से छतरी और रैनकोट साथ में लेकर अवश्य निकलते हैं।

हम सबको ज्ञात है कि रोड पर कहीं न कहीं यातायात पुलिस अवश्य मिलेगी। हमें यह भी ज्ञात है और यदि ज्ञात नहीं है तो ज्ञात होना चाहिये कि यातायात पुलिस में पोस्टिंग करवाने के लिये बडे अफसरों को अग्रिम घूस तो देनी ही होती है। इसके अलावा जब तक यातायात पुलिस में रहना है, वाहनों के चालान का टार्गेट पूरा करने के साथ-साथ प्रतिमाह निर्धारित रकम भी साहब लोगों को पहुँचानी होती है। जो लोग आपकी तरह से हर प्रकार के नियम का पालन करके चलते हैं, उन्हें चालान कटवाना होता है और केवल जुर्माना भरना होता है, जिससे यातायात पुलिस का टार्गेट पूरा होता है। लेकिन जो लोग कानून का पालन नहीं करते हैं, उनसे हवालात में बन्द करने की धमकी के सहारे रिश्वत भी वसूली जाती है। इस सबका का यातायात पुलिस के सिपाही से लेकर यातायात मन्त्री तक सबको पता है। फिर भी कोई कुछ नहीं कर रहा है।

ऐसे में आपको और हम सबको अर्थात् सडक पर चलने वालों को ही अपने बचाव के लिये कुछ करना होगा। ऐसा करना किसी कानून के कारण तो जरूरी नहीं है, लेकिन रोड पर चलने की परिस्थितिजन्य बाध्यता अवश्य है। जिससे बचाव के उपाय कोई और नहीं, बल्कि स्वयं हमें ही करने होंगे। हम सभी जानते हैं कि जब भी हमारे मोहल्ले में मलेरिया फैलता है तो हम मलेरिया रोधी छिडकाव नहीं करने के लिये, जिम्मेदार लोगों के भरोसे नहीं बैठे रहते हैं, बल्कि मलेरिया फैलाने वाले मच्छरों ये बचाव के उपाय खुद ही करते हैं और अपने आपको बीमार होने से बचाने का हर सम्भव प्रयास करते हैं, बेशक बचाव करते-करते हम अनेक बार बीमार भी हो जाते हैं, क्योंकि सब कुछ हमारे नियन्त्रण में तो नहीं होता है।

इसी प्रकार से जनता की सेवा करने के नाम पर वेतन उठाने वाले और कानून का पालन कराने के लिये तैनात लोक सेवकों अर्थात् सरकारी कर्मचारियों एवं अफसरों के कानूनी कहर से बचने के लिये देश के आम व्यक्ति को अपने स्तर पर कुछ वैकल्पिक उपाय करने होते हैं।

आम लोगों के पास अपनी एकता के अलावा और क्या है? लेकिन एकता में बहुत ताकत होती है और ताकत से लोग डरते हैं। बेशक ताकत कानूनी हो या गैर-कानूनी! ताकत के सामने कौन टिक सकता है और संगठित ताकत तो देश की सरकार तक को बदल सकती है। इसलिय हमने 1993 में "भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" की स्थापना की थी और कानून का कवच धारण करके आम लोगों का खून पीने वालों के कहर से अपने आपको बचाने, जरूरतमन्दों की मदद करने एवं सार्वजनिक हित के मामलों में हस्तक्षेप करने के लिये सजग लोगों का एक मंच तैयार किया। जिसके सहारे हम इस कुव्यवस्था के खिलाफ संघर्षरत हैं। बेशक इसके बावजूद भी हमारे कार्यकर्ताओं को भी अनेक बार अप्रिय स्थितियों का सामना करना पडता है, लेकिन जैसा कि मैंने ऊपर लिखा है कि तूफान में छतरी उड जाने के कारण छतरी को दोष नहीं दिया जा सकता और न हीं छतरी रखना छोडा जा सकता है। तूफान की ताकत से कहीं अधिक मजबूत छतरी का निर्माण करने एवं छतरी का उपयोग करना सीखना जरूरी है।

मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि बास के "प्रोटेक्शन अम्ब्रेला" को अपनाने वालों के सम्मान एवं अधिकारों की रक्षा होती है। बशर्ते कि ऐसे लोग स्वयं ठीक हों और अपने आचरण से अपने आदर्शों को प्रमाणित कर सकें। मेरा ऐसा मानना है कि मैं वहीं बातें लोगों से कहूँ, जिनपर सबसे पहले मैं स्वयं अमल कर सकूँ। जिन बातों को मैं अपने जीवन में धारण नहीं कर सकता, उन्हें दूसरे कैसे अपनायेंगे? संजय जी क्षमा कीजियेगा आप जब तक बास के सदस्य नहीं हैं, आपके ब्लॉग के पाठकों को आप"http://baasindia.blogspot.com" का लिंक देकर भी बास की सदस्यता के लिये ईमानदारी से प्रेरित नहीं कर सकते हैं।

हमारे अनेक सदस्यों को आपकी ही भांति यातायात पुलिस से दो-चार होना पडता है, लेकिन जैसे ही यातायात पुलिस को पता चलता है कि वाहन मालिक या चालक बास का पदाधिकारी है, कम से कम धौंस-दबट या असंसदीय भाषा का प्रयोग करने या अकारण चालान काटने से पूर्व यातायात पुलिस को सोचना पडता है। ऐसा नहीं है कि बास का फोटो कार्ड अभेद्य "सुरक्षा कवच" है। अनेक बार बास के परिचय के बाद भी अप्रिय स्थिति का सामना करना पडता है, जिससे घटना के बाद संगठन द्वारा कानूनी तरीके से निपटा जाता है, जो आतताईयों को अधिक कष्टप्रद अनुभव होता है।

अत: मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि हमारे कार्यकर्ताओं को अत्याचारों, नाइंसाफी एवं मनमानी के विरुद्ध काफी सीमा तक संरक्षण प्राप्त हो रहा है। इसलिये अकसर मैं जहाँ कहीं भी बुलाया जाता हूँ या जब कभी भी कहीं बोलने का मौका मिलता है, दो बातें जरूर कहता हूँ।

एक-"बोलोगे नहीं तो कोई सुनेगा कैस?" और

दूसरी-"एक साथ आना शुरूआत है, एक साथ चलना प्रगति है और एक साथ काम करना सफलता है!"

श्री संजय जी पुलिस जैसी भी है, उसे उसके लिये दोषी ठहराकर समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। जैसा समाज है और समाज में जितने भी गुण-दोष हैं, वैसे ही समाज में नागरिक हैं और उन्हीं नागरिकों में से पुलिस है।

शुभकामनाओं सहित।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
098285-02666
0141-2222225

Wednesday, November 17, 2010

रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!

रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?
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इस बात में तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि केन्द्र एवं राज्य सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है! मैं फिर से दौहरा दूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है!" शेष 10 फीसदी भ्रष्टाचार के लिये दोषी लोगों को कठोर सजा के जरिये ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार देश की सबसे बडी समस्याओं में से एक भ्रष्टाचार से निजात पायी जा सकती है।

मेरी उपरोक्त बात पढकर अनेक पाठकों को लगेगा कि यदि ऐसा होता तो भ्रष्टाचार कभी का रुक गया होता। इसलिये मैं फिर से जोर देकर कहना चाहता हूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहती तो अवश्य ही रुक गया होता, लेकिन असल समस्या यही है कि सरकारें चाहती ही नहीं!" सरकारें ऐसा चाहेंगी भी क्यों? विशेषकर तब, जबकि लोकतन्त्र के विकृत हो चुके भारतीय लोकतन्त्र के संसदीय स्वरूप में सरकारों के निर्माण की आधारशिला ही काले धन एवं भ्रष्टाचार से रखी जाती रही हैं। अर्थात् हम सभी जानते हैं कि सभी दलों द्वारा काले धन एवं भ्रष्टाचार के जरिये अर्जित धन से ही तो लोकतान्त्रिक चुनाव ल‹डे और जीते जाते हैं।

स्वयं मतदाता भी तो भ्रष्ट लोगों को वोट देने आगे रहता है, जिसका प्रमाण है-अनेक भ्रष्ट राजनेताओं के साथ-साथ अनेक पूर्व भ्रष्ट अफसरों को भी चुनावों में भारी बहुमत से जिताना, जबकि सभी जानते हैं की अधिकतर अफसर जीवनभर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये ही अफसर हमारे जनप्रतिनिधि बनते जा रहे हैं। मैं ऐसे अनेक अफसरों के बारे में जानता हूँ जो 10 साल की नौकरी होते-होते एमपी-एमएलए बनने का ख्वाब देखना शुरू कर चुके हैं। साफ़ और सीधी सी बात है-कि ये चुनाव को जीतने लिये, शुरू से ही काला धन इकत्रित करना शुरू कर चुके हैं, जो भ्रष्टाचार के जरिये ही कमाया जा रहा है। फिर भी मतदाता इन्हें ही जितायेगा।

ऐसे हालत में सरकारें बिना किसी कारण के ये कैसे चाहेंगी कि भ्रष्टाचार रुके, विशेषकर तब; जबकि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार, जो सभी राजनैतिक दलों की ऑक्सीजन है। यदि सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार को ही समाप्त कर दिया गया तो इन राजनैतिक दलों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा! परिणाम सामने है : भ्रष्टाचार देशभर में हर क्षेत्र में बेलगाम दौ‹ड रहा है और केवल इतना ही नहीं, बल्कि हम में से अधिकतर लोग इस अंधी दौ‹ड में शामिल होने को बेताब हैं।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाया जावे।

अधिकतर लोगों के भ्रष्टाचार की दौ‹ड में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद भी उन लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं या जो भ्रष्टाचार को ठीक नहीं समझते हैं। क्योंकि आम जनता के दबाव में यदि सरकार ‘‘सूचना का अधिकार कानून" बना सकती है, जिसमें सरकार की 90 प्रतिशत से अधिक फाइलों को जनता देख सकती है, तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना क्यों असम्भव है? यद्यपि यह सही है कि ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बन जाने मात्र से ही अपने आप किसी प्रकार का जादू तो नहीं हो जाने वाला है, लेकिन ये बात तय है कि यदि ये कानून बन गया तो भ्रष्टाचार को रुकना ही होगा।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-
भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं,
भ्रष्टाचार से दुखी हैं,
भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया,
भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और
जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।

अनेक कथित बुद्धिजीवी, निराश एवं पलायनवादी लोगों का कहना है कि अब तो भ्रष्टाचार की गंगा में तो हर कोई हाथ धोना चाहता है। फिर कोई भ्रष्टाचार की क्यों खिलाफत करेगा? क्योंकि भ्रष्टाचार से तो सभी के वारे-न्यारे होते हैं। जबकि सच्चाई ये नहीं है, ये सिर्फ भ्रष्टाचार का एक छोटा सा पहलु है।

यदि सच्चाई जाननी है तो निम्न तथ्यों को ध्यान से पढकर सोचें, विचारें और फिर निर्णय लें, कि कितने लोग भ्रष्टाचार के पक्ष में हो सकते हैं?

अब मेरे सीधे सवाल उन लोगों से हैं जो भ्रष्ट हैं या भ्रष्टाचार के हिमायती हैं या जो भ्रष्टाचार की गंगा में डूबकी लगाने की बात करते हैं। क्या वे उस दिन के लिए सुरक्षा कवच बना सकते हैं, जिस दिन-

1. उनका कोई अपना बीमार हो और उसे केवल इसलिए नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवाएँ कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरने के बाद भी अप्रूव्ड करदी गयी थी?

2. उनका कोई अपना बस में यात्रा करे और मारा जाये और उस बस की इस कारण दुर्घटना हुई हो, क्योंकि बस में लगाये गए पुर्जे कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरने के बावजूद अप्रूव्ड कर दिए थे?

3. उनका कोई अपना खाना खाने जाये और उनके ही जैसे भ्रष्टाचारियों द्वारा खाद्य वस्तुओं में की गयी मिलावट के चलते, तडप-तडप कर अपनी जान दे दे?

4. उनका कोई अपना किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टर बिना रिश्वत लिये उपचार करने या ऑपरेशन करने से साफ इनकार कर दे या विलम्ब कर दे और पीड़ित व्यक्ति बचाया नहीं जा सके?

ऐसे और भी अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।

यहाँ मेरा आशय केवल यह बतलाना है की भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?

उपरोक्त विवरण पढकर यदि किसी को लगता है की भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिये तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाने के लिये अपने-अपने क्षेत्र में, अपने-अपने तरीके से भारत सरकार पर दबाव बनायें। केन्द्र में सरकार किसी भी दल की हो, लोकतन्त्रान्तिक शासन व्यवस्था में एकजुट जनता की बाजिब मांग को नकारना किसी भी सरकार के लिये आसान नहीं है।

क्या है? ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून"

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19.1.ग में प्रदत्त मूल अधिकार के तहत 1993 में शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयन्ती के दिन (26 एवं २7 सितम्बर की रात्री को) स्थापित एवं भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से 6 अप्रेल, 1994 से पंजीबद्ध एवं अनुमोदित ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लगातार अनेक राज्यों के अनेक क्षेत्रों व व्यवसायों से जुडे लोगों के साथ कार्य करते हुए और 20 वर्ष 9 माह 5 दिन तक भारत सरकार की सेवा करते हुए मैंने जो कुछ जाना और अनुभव किया है, उसके अनुसार देश से भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिये ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना जरूरी है, जिसके लिये केन्द्र सरकार को संसद के माध्यम से वर्तमान कानूनों में कुछ बदलाव करने होंगे एवं कुछ नए कानून बनवाने होंगे, जिनका विवरण निम्न प्रकार है :-

1-भ्रष्टाचार अजमानतीय अपराध हो और हर हाल में फैसला 6 माह में हो : सबसे पहले तो यह बात समझने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार केवल मात्र सरकारी लोगों द्वारा किया जाने वाला कुकृत्य नहीं है, बल्कि इसमें अनेक गैर-सरकारी लोग भी लिप्त रहते हैं। अत: भ्रष्टाचार या भ्रष्ट आचरण की परिभाषा को बदलकर अधिक विस्तृत किये जाने की जरूरत है। इसके अलावा इसमें केवल रिश्वत या कमीशन के लेन-देन को भ्रष्टाचार नहीं माना जावे, बल्कि किसी के भी द्वारा किसी के भी साथ किया जाने वाला ऐसा व्यवहार जो शोषण, गैर-बराबरी, अन्याय, भेदभाव, जमाखोरी, मिलावट, कालाबाजारी, मापतोल में गडबडी करना, डराना, धर्मान्धता, सम्प्रदायिकता, धमकाना, रिश्वतखोरी, उत्पीडन, अत्याचार, सन्त्रास, जनहित को नुकसान पहुँचाना, अधिनस्थ, असहाय एवं कमजोर लोगों की परिस्थितियों का दुरुपयोग आदि कुकृत्य को एवं जो मानव-मानव में विभेद करते हों, मानव के विकास एवं सम्मान को नुकसान पहुंचाते हों और जो देश की लोकतान्त्रिक, संवैधानिक, कानूनी एवं शान्तिपूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट, नष्ट या प्रदूषित करते हों को ‘‘भ्रष्टाचार" या "भ्रष्ट आचरण" घोषित किया जावे।

इस प्रकार के भ्रष्ट आचरण को भारतीय दण्ड संहिता में अजमानतीय एवं संज्ञेय अपराध घोषित किया जावे। ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों को पुलिस जाँच के तत्काल बाद जेल में डाला जावे एवं उनके मुकदमों का निर्णय होने तक, उन्हें किसी भी परिस्थिति में जमानत या अन्तरिम जमानत या पेरोल पर छोडने का प्रावधान नहीं होना चाहिये। इसके साथ-साथ यह कानून भी बनाया जावे कि हर हाल में ऐसे मुकदमें की जाँच 3 माह में और मुकदमें का फैसला 6 माह के अन्दर किया जावे। अन्यथा जाँच या विचारण में विलम्ब करने पर जाँच एजेंसी या जज के खिलाफ भी जिम्मेदारी का निर्धारण करके सख्त दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिये।

..............‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून के शेष सुधार अगली किश्त में शीघ्र पढने को मिलेंगे....

पाठकों से निवेदन है कि खुलकर प्रतिक्रिया दें और बहस को आगे बढाने में सहयोग करें!

Saturday, August 21, 2010

सिक्खों की सुरक्षा मुसलमानों की जिम्मेदारी-डॉ. मीणा

सिक्खों की सुरक्षा मुसलमानों की जिम्मेदारी-डॉ. मीणा

जयपुर। भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि कश्मीर में सिखों को जानमाल के खतरे की आशंका है और ऐसे हालात में कोई भी व्यक्ति सामान्य जीवन नहीं जी सकता है। आतंकियों के इरादे नेक नहीं हैं। ऐसे में बहुत जरूरी है कि कश्मीरी सिखों को भयमुक्त करने के लिये आतंकियों के विरुद्ध योजनाबद्ध तरीके से सख्ती से निपटा जाये और आतंकियों की ओर से सिक्खों को दी गयी धमकी का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करने वाले किसी भी व्यक्ति को तत्काल देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में डाला जावे।


डॉ. मीणा ने प्रधामन्त्री को लिखे पत्र में साफ शब्दों में कहा है कि यदि आतंकियों के भय से पण्डितों की भांति सिख भी कश्मीर छोडने को विवश हो गये तो इससे भारत सरकार की कश्मीर में उपस्थिति पर ही सवाल खडा हो जायेगा। पहले से ही कश्मीरी पण्डित, कश्मीर से विस्थापित होकर, देशभर में दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं। अब आतंकी सिक्खों को खदेडना चाहते हैं। आतंकियों की इस कुनीति को भारत के लोग बर्दास्त नहीं कर सकते हैं।


डॉ. मीणा ने कहा है कि भारत के प्रधानमन्त्री के नाते आपका संवैधानिक दायित्व है कि आप कश्मीर में ही नहीं सारे देश में नस्लीय या धार्मिक आधार पर किसी के विरुद्ध भी जहर उगलने या धमकाने वाले लोगों के विरुद्ध कडाई से पेश आयें। अन्यथा भारत संघ के प्रधानमन्त्री के रूप में आपकी मंसा पर सवाल खडे होना स्वाभाविक है।

डॉ. मीणा ने देश के और विशेषकर कश्मीर के मुसलमानों का भी आह्वान किया है कि वे कश्मीरी सिक्खों की ढाल बनें, जिससे उनकी देशभक्ति पर उंगली उठाने वालों को भी जवाब मिल सके। अन्यथा ऐसी शक्तियाँ जो देश के मुसलमानों को गद्दार और देशद्रोही कहती हैं, उन्हें ताकतवर होने का अवसर मिलेगा।

दिनांक : 21.08.10

पंकज सत्तावत
सहायक कार्यालय सचिव
भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय, जयपुर।

Saturday, June 19, 2010

अगला भगत सिंह कभी भी पैदा होने वाला नहीं है!


युवा सोच के धनी श्री विकास भारतीय ने मुझे निम्न आलेख पढने का संकेत मेल पर किया, मैंने इसे पढ़कर नीचे अपनी प्रतिक्रिया भी उनको लिख भेजी है :-

TUESDAY, FEBRUARY 16, 2010


अगला भगत सिंह कौन?

आने वाले विगत वर्षो में भारत में जो भुखमरी आनेवाली है उसका अंदाजा न तो केंद्र सरकार को है नाही इसपर कोई क्रांतिकारी कदम आम जनता द्वारा ही उठाया जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रतिस्पर्धा के कारण छोटे उद्योगों का दिन प्रतिदिन विनाश होता जा रहा है। अपार्टमेंट्स और बहुमंजिली इमारतों से आम जनता को कुछ भी मिलने वाला नहीं है। आम जनता को तो रोजगार चाहिए। यहाँ मै ये बता देना चाहता हूँ की आम जनता आखिर है कौन? आम जनता वो है जिनके माँ बाप गरीबी रेखा से नीचे की जीवन श्रेणी में जीवन यापन करते है। जिनको मिलने वाला सरकारी फंड सरकारी लुटेरो की जेबों को गर्म रखता है। जो घुट घुट कर जीने को मजबूर है। जिनके पास खाने को नहीं है और सरकार कहती है अपने बच्चो को पढ़ाओ और काम न करवाओ। इसके लिए सरकार ने श्रम मंत्रालय तक का निर्माण किया है जिनका ज्यादातर समय कार्यालयों में सेब, चाय, सिगरेट और मशाले खाते हुए कटता है। जिस घर में बीमारी ने अपना ठेहा जमा रखा हो और घर में दो जून की रोटी न हो अगर उससे सरकार कहे की अपने बच्चो से काम न करवाओ तो यह कहा तक उचित है। अंग्रेजी आसान भाषा है ऐसा ज्यादातर विद्वानों से सुनने को मिलता है। अगर ऐसा है तो महात्मा गाँधी, राम मनोहर लोहिया और खुद केंद्र सरकार आज़ादी के समय से ही क्यों हिंदी लाने के लिए प्रयत्नसिल थे और है भी? प्रश्न यह उठता है की आखिर हम इंग्लिश क्यों सीखे? हमारे ब्यूरोक्रेट्स, अधिकारी और सरकारी कर्मचारी अगर अपने कर्तव्यों का सही से पालन करते और कर रहे होते तो आज जो भयावह स्थिति बनी है क्या वो बन पाती? क्योकि अगर शुरू से ही हिंदी का विकास और सत्प्रयोग किया गया होता तो शायद आज ये स्थिति नहीं बनती। महात्मा गाँधी ने तो यहाँ तक कहा था की ये राष्ट्र द्रोह है उन्होंने प्रसिद्ध स्वराज्य में लिखा था की अंग्रेजी जानने वाले ने आम जनता को ठगने में कुछ न उठा रखा है।
लेकिन वर्तमान में उन गरीबो का जो शीतलहर से पूल के निचे, किसी राजमार्ग के किनारे मर रहे है? शायद वो नहीं होता। अगर आज़ादी के पश्चात हमारे देश के करता धर्ताओ ने देश के साथ थोडा भी देशभक्ति दिखाया होता तो शायद जो स्थिति आज उत्पन्न हुई है वो न हो पाती। आज सामाचार पत्रों में ये मुद्दे प्राचीन सभ्यताओ की तरह अथवा हिंदी भाषा को ही ले लीजिये की तरह ख़तम होते जा रहा है। हमारे देश की जनसँख्या १ अरब से कही ज्यादा है और कुछ लाख लोगो के इंजिनियर, डॉक्टर बन जाने से अथवा कुछ हज़ार अच्छे बहुमंजिली इमारतों के बन जाने से उन गरीबो का क्या लेना देना है। सरकार दिखा रही की देश का विकास हो रहा है लेकिन सरकार इसपर प्रकाश नहीं डाल रही है। नरेगा हो या अन्य बहुत से मद जो गरीबो के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू किये गए है पूरा देश जानता है की कितने गरीबो का उससे कल्याण हो पाता है। समाचार पत्र, और एन.जी.ओ समाज में रुआब और सरकारी फंड पाने हेतु या गरीबो के स्वार्थ हेतु खोला जा रहा है ये शायद उन्ही हो मालूम होगा। आर.एन.आई के आकड़ो को देखा जाये और मार्केट में बिक रहे समाचार पत्रों को देखा जाये तो इसका अंदाजा और बेहतरी से किया जा सकता है। सरकार के खिलाफ अब बहुत कम ही पत्रकार अपना मुंह खोलने को तैयार है लेकिन ये सब समय की माया है। जनता अब क्रांति के मायने भूल चुकी है अथवा उसको कोई भगत सिंह , चंद्रशेखर आज़ाद जैसा नहीं मिल पा रहा है। अथवा आज के भगत सिंह और चन्द्र शेखर आज़ाद को फिक्र हो गयी है की वो जमाना कुछ और था उस समय तो मात्र अंग्रेजो से भय था या उनकी जमात काम थी। लेकिन आज अगर आवाज उठाया तो कही मेरे ही खिलाफ सी.बी.आई जाँच न शुरू हो जाए, कही मुझे मार न दिया जाये या कही मुझे समूचे लोकतंत्र से तो नहीं जूझना पड़ेगा।
समय का तकाजा है देखना है अगला भगत सिंह कब सामने आएगा।
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अगला भगत सिंह कभी भी पैदा होने वाला नहीं है!

Wednesday, November 11, 2009

पुलिस से कैसे निपटें?


बास के राष्ट्रीय
डॉ पुरुषोत्तम मीणा का पाक्षिक संदेश।
(जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र प्रेसपालिका के १६ से ३० सितम्बर, ०९ के अंक में प्रकाशित)
भारत को आजाद हुए ६२ र्वा गुजर चुके हैं, लेकिन आज भी आम व्यक्ति का सम्मान एवं उसकी जानमाल सुरक्षित नहीं हैं। हालात इतने खतरनाक हैं कि पिछले दिनों राट्रपति भवन में भी चोरी हो गयी। ऐसे में आम व्यक्ति की सुरक्षा व्यवस्था के बारे में सहज कल्पना की जा सकती है।कहने को तो संविधान में साफ ाब्दों में लिखा गया है कि कानून के समक्ष प्रत्येक व्यक्ति को समान समझा जायेगा एवं कानून का सभी को समान संरक्षण प्राप्त होगा। केवल इतना ही नहीं, बल्कि ऐसा प्रावधान संविधान के भाग तीन में नागरिकों के मूल अधिकारों के रूप में किया गया है, जिनका उ्वंघन करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है और यदि कोई मूल अधिकारों का उ्वंघन करता भी है तो उसके खिलाफ सीधे देश की सुप्रीम कोर्ट तथा अपने राज्य के हाई कोर्ट में याचिका दायर करके संरक्षण मांगा जा सकता है। हमारे देश के संविधान में देश के सुप्रीम कोर्ट एवं होई कोर्ट्‌स को मूल अधिकारों के गारण्टर एवं पहरेदार के रूप में माना गया है। अनेकों बार अनेक मामलों में सुप्रीम कोर्ट एवं हाई कोर्ट्‌स ने इस जिम्मेदारी का निर्वाह भी किया है।इसके बावजूद भी बार-बार यह बात सामने आती है कि आज भी आम व्यक्ति को यदि सबसे अधिक भय है, तो केवल -पुलिस से ही है। उस पुलिस से जिसे संविधान में पब्लिक सर्वेण्ट अर्थात्‌ जनता की नौकर लिखा गया है। देश के किसी न किसी हिस्से से आये दिन खबरें आती रहती हैं कि पुलिस ने एक आम व्यक्ति के साथ किस प्रकार से अमानवीय एवं क्रूरतापूर्ण व्यवहार किया। बल्कि यह कहना अधिक ठीक होगा कि पुलिस लोगों को सुरक्षा दिलाने के बजाय, लोगों को आतंकित एवं भयभीत करने के लिये अधिक प्रचारित होती रहती है या मीडिया द्वारा प्रचारित की जाती रहती है। कथित रूप से पुलिस की इतनी क्रूर एवं भयाक्रान्त कर देने वाली छवि के उपरान्त भी ऐसा माना जाता है कि पुलिस के सहयोग के बिना किसी भी आम- ओ-खास और यहाँ तक कि गुण्डों का भी काम नहीं चल सकता है।
समाज में मान्यता है कि जहाँ बडे लोगों को पुलिस छाया की तरह से सुरक्षा प्रदान करती है। पुलिस पर गुण्डों को संरक्षण प्रदान करने के आरोप भी लगाये जाते हैं, जबकि आम व्यक्ति को शिकायत रहती है कि पुलिस न मात्र उसकी सुनती ही नहीं, बल्कि पुलिस उसके साथ अभद्रता भी करती है। समाज में अधिकतर लोगों का यह भी मानना है कि बडे लोगों एवं गुण्डों का तो पुलिस कुछ कर नहीं सकती और अपनी भडास आम व्यक्ति के विरुद्ध निकालती है। इसलिये पुलिस से आम व्यक्ति सबसे अधिक त्रस्त है। इन सब बातों में कितनी सधाई है। इस विाय की पडताल करना न तो इस आलेख को लिखने का लक्ष्य है और न हीं ऐसी कोई पडताल की गयी है, बल्कि इस आलेख को लिखने के पीछे हम यह बतलाने का प्रयास कर रहे हैं कि जब पुलिस को लोगों की सुरक्षा प्रदान करने के लिये वेतन दिया जाता है, फिर भी पुलिस आम लोगों के विरुद्ध अभद्र व्यवहार करने के लिये बदनाम होती रहती है। ऐसे में आम व्यक्ति पुलिस से कैसे निपट सकता है?हम सभी जानते हैं कि हर समस्या के एक से अधिक पहलू होते हैं। प्रत्येक पहलू को निपक्षता पूर्वक समझे बिना समस्या का समाधान सम्भव नहीं हो सकता। ऐसा देखने में आया है कि पुलिस अपनी छवि में कैद है। पुलिसजनों के मनोमस्तिक में यह बात घर किये हुए है कि यदि वह अपनी अंग्रेजों की दैन क्रूरता वाली छवि से मुक्त हो गयी तो उसकी महत्ता समाप्त हो जायेगी और उसकी कोई सुनने वाला नहीं है। कुछ सीमा तक इसमें सधाई भी है। इस कारण पुलिस अपनी पुरातन और अंग्रेजों की दैन छवि में ही सम्भवतः न चाहकर भी कैद है।
इसके विपरीत हमें देखना होगा कि क्या पुलिस के बिना हमारा काम चल सकता है। जब भी कोई मुसीबत आती है, हम सीधे पुलिस थाने में जाकर गुहार करते हैं, बेशक थाने में कथित रूप से बिना लिये दिये सुनवाई नहीं होने के ढेरों आरोप पुलिस के माथे पर हमेशा ही लगते रहते हैं। लेकिन यह भी तो सच है कि पुलिस हमें संरक्षण प्रदान करती है। इसलिये पुलिस के अस्तित्व को आम व्यक्ति के जीवन में नकारा नहीं जा सकता। यदि एक दिन के लिये भी पुलिस को हटा दिया जावे तो हमारे पडौस में रहने वाले कितने ही सफेदपोश चेहरे सरे राह लोगों को लूटते मिल जायेंगे। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि पुलिस के नाम से ही आम व्यक्ति की सुरक्षा होती है। इसके उपरान्त भी इस बात को स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पुलिस को सुरक्षा प्रदान करने के एवज में आम व्यक्ति से अभद्रता करने का हक होना चाहिये। एक सम्मानित व्यक्ति जब पुलिस थाने में जाता है तो पूरी उम्मीद के साथ जाता है कि उसको कानूनी संरक्षण प्रदान किया जायेगा। लेकिन उसे अधिकतर तिरस्कार एवं अपमान ही सहना पडता है। थाने की प्रचलित परम्परानुसार हर सम्भव प्रयास यह होता है कि जहाँ तक सम्भव हो फरियादी की एफआईआर दर्ज नहीं करनी पडे। एफआईआर दर्ज करते ही उस थाना क्षेत्र में एक अपराध संख्या और बढ जाती है। जाँच-पडताल करने के लिये एक मुकदमा और दर्ज हो जाता है। जिसका न्यायालय में चालान करना होता है। पुलिस के आला अधिकारियों को मुकदमों की संख्या बढने का जवाब देना पडता है।
यह सबसे बुरी और गलत बात है कि अधिक मुकदमे दर्ज होने का कारण आला पुलिस अधिकारियों द्वारा थानाधिकारी से पूछा जाता है। जबकि इसके विपरीत होना तो यह चाहिये कि जिस थाने में अधिक मुकदमे दर्ज हुए हों, उस थाने को जनता के प्रति अधिक संवेदनशीलता का प्रमाण-पत्र दिया जाना चाहिये। आखिर अपराधियों से आहत जनता का कानूनी तौर पर उपचार प्रदान करने का काम करने के लिये ही तो पुलिस थानों की स्थापना की गयी है। जिन्हें अधिकतम कानूनी उपचार प्रदान करने के लिये, सवालों के घेरे में खडा करना किसी भी सूरत में न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। क्या कभी किसी उधतम स्तर के चिकित्सा अधिकारी ने नीचे के स्तर के चिकित्सक से यह सवाल किया है कि उसके द्वारा अधिक संख्या में बीमारों का उपचार क्यों किया गया? यदि नहीं तो पुलिस से भी यह नहीं पूछा जाना चाहिये कि उसने अधिक फरियादियों की फरियाद दर्ज क्यों की? क्योंकि पुलिस भी तो आहत व्यक्ति को कानूनी उपचार प्रदान करती है। कानूनी उपचार भी जीवन के लिये उतना ही जरूरी है, जितना कि चिकित्सक द्वारा प्रदान किया जाने वाला ाारीरिक या मानसिक उपचार। इसलिये आमजन को सबसे पहला काम तो यह करना होगा कि ऐसा माहौल बनाया जावे कि अधिक मुकदमे दर्ज करने वाले पुलिस थानों को पुरस्कृत किया जावे। इसके लिये सरकारों को बाकायदा कानून बनाने के लिये बाध्य किया जावे कि जब भी कोई व्यक्ति पुलिस थाने में अपनी फरियाद लेकर जाये, तो सबसे पहले मुकदमा दर्ज किया जावे, उसके बाद यह देखा जावे कि आहत व्यक्ति की ओर से प्रस्तुत तथ्य सत्य हैं या नहीं। इस बात की पुटि सुप्रीम कोर्ट द्वारा भी की जा चुकी है। किसी भी अस्पताल में रोगी का केस पहले बनाया जाता है, यह बाद में देखा जाता है कि रोगी को क्या तकलीफ या क्या बीमारी है और कोई बीमारी है भी या नहीं!
दूसरी और सबसे महत्वूपर्ण बात है वो यह है कि हमारे देश में इतने कानून हैं कि पश्चिमी देशों के कानूनविदों द्वारा भारत को कानूनों का जंगल कहा जाता है। इस कानूनों के जंगलों की समाज के लिये क्रियान्विती की जिम्मेदारी हमारे संविधान ने पुलिस के सिर पर डाली है। इसके साथ-साथ यह तथ्य भी ध्यान देने योग्य है कि पुलिस द्वारा कोर्ट में पेश मुकदमों में से अधिसंख्य मामलों में अपराधी छूट जाते हैं। केवल इतना ही नहीं, बल्कि एक तटस्थ अध्ययन के अनुसार तो सजा पाने वालों में निर्दोा लोगों की संख्या अधिक है। यह तथ्य सरकार से छिपा नहीं है। इसके बावजूद भी इस बीमारी से मुक्ति के लिये कोई स्थायी समाधान क्यों नहीं सोचा जाता है? यह अपने आप में आश्चर्य का विाय है। हमेशा सतही उपचार किये जाते हैं। जबकि सबसे बडी समस्या है मूल में, अर्थात्‌ कानून को लागू करने वाली पुलिस के सिपाही से लेकर सबसे बडे व सीधे प्रथम श्रेणी में संघ लोक सेवा आयोग द्वारा भर्ती किये जाने वाले आईपीएस तक किसी भी पुलिसवाले के लिये किसी भी प्रकार की कानूनी ौक्षणिक योग्यता की अनिवार्यता नहीं है। प्रशिक्षण के दौरान कानून सिखाने की औपचारिकता पूर्ण करके इन सबको कानून का जानकार बनाया जाता है। यदि इस प्रकार के प्रशिक्षण द्वारा ही कानून सिखाया जाना सम्भव है तो फिर देशभर में कानून के विश्वविालय एवं महाविालयों की स्थापना की आवश्यकता ही नहीं है। वास्तव में हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहाँ कानूनों का जंगल है और उस कानूनी जंगल को सुरक्षित रखने, उसे देश के हर व्यक्ति के लिये फलित करने की पूरी जिम्मेदारी कानून से अनभिज्ञ पुलिस के लोगों के हाथ में दी गयी है। अर्थात्‌ जिस प्रकार से दूर-दराज गाँवों में गैर-कानूनी रूप से नीम हकीम लोगों का शारीरिक उपचार करते हैं। उसी प्रकार देशभर में पुलिस द्वारा भी कानूनी उपचार प्रदान करने के लिये विधि-स्नातक की योग्यता नहीं होने के उपरान्त भी खुलेआम नीम-हकीमी कानूनी उपचार प्रदान किया जा रहा है। फिर भी हम आशा करते हैं कि पुलिस कानून के अनुसार हमें संरक्षण प्रदान करे? यह कैसे सम्भव है? जिन लोगों ने कानून पढा नहीं। जिन्हें संविधान की सर्वोच्च्ता, नागरिक मूल अधिकारों की गरिमा और मानव अधिकारों की पवित्रता का जिन लोगों को वास्तविक ज्ञान नहीं, उन लोगों से इन सबके क्रियान्वयन एवं इनकी सुरक्षा की अपेक्षा करना सिवा मूर्खता के और क्या है? जब एक पुलिस वाला किसी आहत व्यक्ति को कानूनी उपचार प्रदान करने के बजाय उसके साथ अभद्र व्यवहार कर रहा होता है तो उसे ज्ञात ही नहीं होता है कि वह संविधान के अनुच्छेद- १४, १९, २१ एवं ३२ का तो उल्लंघन कर ही रहा है। साथ ही साथ अपने देश को अन्तर्राट्रीय मंच पर खुले तौर पर मानव अधिकारों का उल्लंघन करने वाला देश भी घोाित कर रहा होता है। इसलिये वह ऐसा कर रहा है। तो निर्का की बात यह है कि हम उन लोगों से कानून लागू करने की उम्मीद करते हैं, जो जानते ही नहीं कि कानून है क्या? परन्तु इसमें पुलिस का नहीं देश के कर्णधारों का दाो है। हमारे देश में अंग्रेजों की देन ाासन व्यवस्था ज्यों की त्यों लागू है, जिसके तहत विधि मन्त्रालय का मुखिया अर्थात्‌ सचिव एक आईएएस होता है, जो कि समान्यतः किसी भी विाय का स्नातक होता है। उससे भी कानून में स्नातक होने की अपेक्षा नहीं है। विधि सचिव के नियन्त्रण में विधि-मन्त्रालय एवं विधि सचिव की सलाह पर विधि-मन्त्री कार्य करते हैं। और विधि-मन्त्रालय ही कानूनों में संशोधन करने या नये कानून बनाने का काम करता है। ऐसे में देश की दशा क्या होनी चाहिये? सहज ही कल्पना की जा सकती है। लेकिन हमें इसी देश में रहना है और इसी देश की नीम हकीम पुलिस व्यवस्था से कानूनी संरक्षण भी पाना है। ऐसे में आम व्यक्ति क्या करे? इस विाय के सभी पहलुओं पर चिन्तन-मनन करने के उपरान्त निर्का रूप में संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि एक आम व्यक्ति को तीन मोर्चों पर लगातार कार्य करने की सख्त जरूरत है। तीनों मोर्चों पर काम करने से भी पहले लोगों को सक्रिय एवं अराजनैतिक समूहों के रूप में समर्पित होकर संगठित होने की जरूरत है, क्योंकि अकेले व्यक्ति की आवाज किसी को सुनाई नहीं देती है। संगठित होकर आपको निम्न तीन मोर्चों पर लगातार एवं प्रतिदिन काम करने होंगे-सबसे पहले आपको अपने संगठन में जनबल एवं धनबन की ताकत बढाने के लिये प्रतिदिन लगातार काम करते रहना होगा। जिससे कि आपको कभी भी उद्देश्य के लिये शान्तिपूर्ण प्रदर्शन करने या आन्दोलन के लिये अपने ही सदस्यों की पर्याप्त संख्या, जिसे प्रशासन भीड कहता है, को जुटाने में मुश्किलातों का सामना नहीं करना पडे। इसी प्रकार से किसी भी कार्य को अंजाम देने के लिये संसाधन की अत्यन्त जरूरत होती है, जिनके लिय धन की पर्याप्तता एवं लगातार उपलब्ध्ता बहुत जरूरी है। इसलिये नियमित रूप से धन संग्रह करना भी अत्यन्त जरूरी है। जिससे की धन की कमी में किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पडे।
दूसरा, आपको अव्यावहारिक एवं गैर- कानूनी तथा आम व्यक्ति के हितों के विरुद्ध जारी कुव्यवस्था का न मात्र लगातार और हर मंच पर विरोध करना है, बल्कि उसमें सुधार के लिये सुझाव एवं समाधान भी पेश करने होंगे। जिससे कि केन्द्र एवं राज्यों की सरकारें आपकी पीडा एवं उपचार को समझ सके। प्रस्तुत विाय में अपराधों की जाँच करने वाले प्रत्येक पुलिसजन, आईपीएस एवं आईएएस की भर्ती की पहली ार्त के रूप में कानून की उपाधि की अनिवार्यता को लागू करवाने के लिये लगातार मांग और जन-आन्दोलन करने की जरूरत है।तीन, जब तक उपरोक्त परिवर्तन नहीं होते हैं, तब तक देश के वफादार नागरिक होने के नाते प्रचलित व्यवस्था तथा कानूनों का आदर और पालन करना हम सबका प्रथम धर्म और कानूनी कर्त्तव्य है। अतः प्रचलित कानून के अनुसार पुलिस को कानून का क्रियान्वयन करने के लिये बाध्य किया जावे। जिसके लिये हमें एक कारगर नीति पर कार्य करना होगा और इसे अंजाम पूर्ण धैय पूर्वक तक पहुंचाना होगा।
भारत में प्रचलित साक्ष्य अधिनियम के तहत एक प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्यी की गवाही के आधार पर सुप्रीम कोर्ट किसी भी अपराधी को फांसी तक की सजा बहाल रख सकता है, तो फिर आप इस बात को क्यों भूल जाते हैं कि पुलिस द्वारा आम व्यक्ति के विरुद्ध अभद्रता किये जाने या गाली-गलोंच करने के लिये पुलिस के विरुद्ध वही कानून कैसे मूक रह सकता है। जरूरत है, कानून के समक्ष, कानूनी रूप से, यह सिद्ध करने की, कि किसी पुलिसजन ने आपके साथ अभद्रता एवं गाली-गलोंच की है। इसके लिये अनेक प्रकार के टिप्स हो सकते हैं, जिन्हें हमें भ्रटाचार एवं अत्याचार अन्वोण संस्थान के प्रशिक्षण शिविरों में कार्यकर्ताओं को बतलाते हैं। उन्हें सार्वजनिक करना उचित नहीं है। लेकिन एक तरीका पाठकों के हित में सामने प्रस्तुत करना जरूरी है। लेकिन सबसे पहले आपको उक्त विवेचन के प्रकाश में यह ध्यान में रखना होगा कि पुलिस को नीम हकीमी कानूनी उपचार करने का लाईसेंस सरकार द्वारा दिया गया है। यही नहीं पुलिस राजनैतिक दबावों में काम करती है। अधिक मुकदमें दर्ज होने पर थाने के प्रभारी से उध पुलिस अधिकारी सवाल जवाब करते हैं। कहीं भी अपराधियों द्वारा बारदात करने पर पुलिस को ही अकर्मण्यता का दोषी माना जाकर प्रचारित एवं भ्रटाचार के मामले में पुलिस को सर्वाधिक बदनाम किया जाता है, बेशक वातानुकूलित कक्षों में विराजमान अन्य अनेक सफेदपोश उधाधिकारी कितने ही अधिक भ्रट क्यों न हों? इन हालातों में पुलिस किस प्रकार की मानसिकता से गुजर रही होती है, इसे भी हमें हर समय समझकर याद रखना होगा।
इस पृठभूमि को ध्यान में रखते हुए जब भी पुलिस द्वारा अपना फर्ज निर्वाह करने में आनाकानी की जावे, अभद्रता या गाली-गलोंच की जावे या फरियादी का मुकदमा दर्ज करने से इनकार किया जावे तो सुसभ्य तरीके से समूह के रूप में पुलिस के समक्ष पेश हों और फरियादी की बात को फिर से थाना प्रभारी या उपलब्ध थाने के वरिठतम अधिकारी/निरीक्षक के समक्ष तथ्यों सहित पेश करें। बहुत अधिक सम्भावना है कि आपकी बात सुन ली जावेगी और मामला दर्ज करके पुलिस मामले पर जरूरी कानूनी कार्यवाही करेगी, क्योंकि पुलिसवाले भी समाज के हिस्से हैं। उनको वेतन इसी बात के लिये मिलता है, और इसी से उनके भी परिवार का पालन-पाोण होता है। लेकिन यदि आपका वास्ता किसी दुट प्रकृति के ऐसे व्यक्ति से पडे जो अपने फर्ज को भूलकर वर्दी के नशे में आपका तिरस्कार एवं अपमान करने का प्रयास करे, तो सबसे पहले तो इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज रहे आनन्द नारायण मुल्ला की बात को याद रखें, जो उन्होंने अपने एक निर्णय में लिखी है कि पुलिस वर्दीधारी गुण्डों का गिरोह है। अतः चुपचाप थाने से बाहर आ जावें, क्योंकि वर्दीधारी गुण्डे आपके साथ कैसा भी दुर्व्यवहार कर सकते हैं। बाहर आकर फरियादी की ओर से सारी घटना की रिपोर्ट फिर से सम्बन्धित पुलिस अधीक्षक के नाम बनायी जावे, जिसमें उल्लेख किया जावे कि उपस्थित थाना प्रभारी द्वारा रिपोर्ट लिखने से इनकार करने एवं फरियादी के साथ अभद्रता या गाली-गलोंच से पेश आने के कारण दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा १५४ (३) के तहत यह रिपोर्ट पुलिस अधीक्षक को प्रस्तुत करने की मजबूरी है। याद रहे कि इस रिापोर्ट के साथ आपके समूह के किन्हीं दो समझदार, विश्वसनीय, परिपक्व एवं निर्भीक लोगों को थाने में हुई घटना का प्रत्यक्षदर्शी गवाह बनाया जावे और इन दोनों गवाहों के पुलिस अधीक्षक के नाम बनायी गयी रिपोर्ट पर हस्ताक्षर करवाये जावें। रिपोर्ट के तथ्यों के समर्थन में फरियादी एवं दोनों गवाहों की ओर से १०-१० रुपये के नॉन-ज्यूडिशियल स्टॉम्प पेपर पर, ापथ-पत्र बनवाकर रिपोर्ट के साथ संलग्र की जावे, जिनका ब्यौरा रिपोर्ट में दिया जावे। समस्त विवरण रिपोर्ट आदि की फोटो कॉपी अपने पास अवश्य रखें। रिपोर्ट के अन्त में साफ ाब्दों में लिखा जावे कि फरियादी के मामले की रिपोर्ट दर्ज करवाने के साथ-साथ थाने में अभद्रता करने के लिये दोषी लोगों (थाने में जाते समय पुलिस वालों की वर्दी पर लगी नेम प्लेट पर नाम पढ लें और यदि किसी ने नेम प्लेट नहीं लगा रखी हो तो उसका चेहरा, बनावट, रंग, उम्र आदि का उल्लेख रिपोर्ट में करें) के विरुद्ध भी एफआईआर दर्ज की जावे। अन्त में पुलिस अधीक्षक को लिखें के यदि उनकी रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी उपचार उपलब्ध नहीं करवाये गये तो विवश होकर मामला न्यायालय में पेश करना पडेगा।
यदि आप जिला मुख्यालय पर रहते हों तो ४-५ समझदार लोग समूह के रूप में ही पुलिस अधीक्षक से मिलकर रिपोर्ट पेश करें एवं उसकी पावती अवश्य ही प्राप्त कर लें। अन्यथा फैक्स या रजिस्टर्ड-एडी के जरिये अपनी रिपार्ट भेजें। रिपार्ट में फरियादी का फोन एवं मोबाइल नम्बर अवश्य लिखें। पुलिस अधीक्षक को फोन/मोबाइल पर भी सम्पर्क करें और ४-५ दिन तक इन्तजार करें। यदि ४-५ दिन में कोई कार्यवाही नहीं हो तो पहले फोन पर फिर से बात करें और यदि कोई सन्ताोजनक जवाब नहीं मिले तो ापथ-पत्र की फोटो प्रति एवं फरियादी की रिपोर्ट सहित मामले को किसी तटस्थ, समझदार एवं अनुभवी वकील के माध्यम से स्थानीय कोर्ट में पेश करें, जिसमें थाना प्रभारी के साथ-साथ पुलिस अधीक्षक को कानूनी कार्यवाही नहीं करने के लिये दाोी ठहराकर पार्टी बनाया जावे। साथ ही फिर से फरियादी एवं दोनों गवाहों के नये ापथ- पत्र कोर्ट में पेश करने को वकील से कहें। हो सके तो फरियादी एवं दोनों गवाहों के बयान दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा १६४ के तहत कोर्ट के समक्ष दर्ज करवा दिये जावें। ताकि जाँच के दौरान गवाहों के बयानों को नकारे जाने की कोई सम्भावना नहीं रहें।
तीन मार्चों पर की जाने वाली उपरोक्त समस्त कार्यवाही में लोगों का गवाह के रूप में सहयोग व समर्थन तथा धन की जरूरत होगी। साथ ही साथ भाग-दौड में मानसिक सम्बल की भी जरूरत होती है, जिसके लिये हर कोई साधारण व अकेला व्यक्ति सक्षम एवं समर्थ नहीं हो सकता है। इसलिये हमने समूह के रूप में संगठित होने की बात पर जोर दिया है और संगठन भी ऐसा हो, जिसमें जनबल एवं धनबल की मजबूत ताकत हो। ऐसे ही लक्ष्यों को पाने की लिये भ्रटाचार एवं अत्याचार अन्वोण संस्थान की स्थापना की गयी है। लेकिन मात्र इसकी सदस्यता ग्रहण करने से कुछ नहीं हो सकता। आपको सदस्यता ग्रहण करने के बाद राट्रीय स्तर पर और स्थानीय स्तर पर इस संस्थान के मंच पर लगातार जनबल एवं धनबल को बढाते रहना होगा। अन्यथा केवल सदस्यता ग्रहण करने से कुछ नहीं होगा। फिर भी याद रहे कि किसी भी कार्य कीुरुआत पहले कदम से ही होती है। जो आपने सदस्य बनकर उठा लिया है। अगले कदम के लिये प्रयास करें और धैर्य रखें। किसी भी पेड में फल लगने में समय लगता है और फल लगने तक धैर्य के साथ-साथ पेड को सींचना तो होता ही है, उसे संरक्षित भी रखना पडता है। क्या आप भ्रटाचार एवं अत्याचार अन्वोण संस्थान नाम के इस पेड को धैर्यपूर्वक, सींचने, संरक्षित रखने और फलते-फुलते देखने के लिये दृढप्रतिज्ञ होकर तत्पर हैं? यदि हाँ तो आप केवल पुलिस से ही नहीं, हर प्रकार के अन्याय से निपट सकने में सक्षम बन सकते हैं। तो फिर विलम्ब किस बात काुरू करें-आज, अभी और तत्काल। हम सदैव से कहते रहे हैं कि-एक साथ आनाुरुआत है, एक साथ रहना प्रगति है और एक साथ काम करना सफलता है।भ्रटाचार एवं अत्याचार अन्वोण संस्थान के ३७७० सदस्य यदि उपरोक्त बताये अनुसार एकजुट हो सकें तो कोई कारण नहीं कि उनकी बात नहीं सुनी जावे और उनके अधिकारों का हनन करने की कोई हिमाकत करके कानून की सजा पाने से बच सके। एक बार दिल से शुरुआत तो करें। आपका साथी-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा।