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Sunday, July 20, 2014

हर रोज हजारों बलात्कार इज्जत की चादर में लपेट कर दफना दिए जाते हैं!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

हमारे देश में स्त्रियों के साथ बलात्कार तो रोज होते हैं, एकाध नहीं हजारों की संख्या में किये जाते हैं, लेकिन कुछ एक बलात्कार की घटनाएं किन्हीं अपरिहार्य कारणों और हालातों में सार्वजनिक हो जाती हैं। जिनके मीडिया के मार्फ़त सामने आ जाने पर औरतों, मर्दोँ और मीडिया द्वारा वहशी बलात्कारी मर्दों को गाली देने और सरकार को कोसने का सिलसिला शुरू हो जाता है। लेकिन हमारा अनुभव साक्षी है की इन बातों से न तो कुछ हासिल हुआ, न हो रहा और न होगा। क्योंकि हम इस रोग को ठीक करने के बारे में  ईमानदारी से विचार ही नहीं करना चाहते!

यदि साहस करके कड़वा सच कहा जाये तो सबसे गंभीर और सोचने वाली बात ये है कि हम बलात्कार को हजारों सालों से पोषित करते रहे हैं।  अत: हमें बलात्कार के प्रसंग में तकनीकी तौर पर नहीं, बल्कि निरपेक्ष भाव से बिना पूर्वाग्रह के एक पुरुष, पति या शासक बनकर नहीं, बल्कि एक पिता, एक माता, एक भाई और सबसे बढ़कर एक मानव बनकर विचार करना होगा कि किन-किन कारणों से आदिकाल से हम एक स्त्री को बलात्कार और मर्द की भोग की वस्तु मात्र ही मानते रहे हैं और खुद स्त्री को भी इसी सोच की पैदा करते रहे हैं या वो पैदा होती रही या ऐसी बनाई जाती रही है। हमें जानना होगा कि हमारी सोच और हमारे अवचेतन मन को रुग्ण करने वाले वे कौनसे ऐसे कारण हैं, जो आज भी बदस्तूर और सरेआम जारी हैं! जिन्हे देश की बहुसंख्यक आबादी न मात्र मानती ही है, बल्कि उन्हें सार्वजनिक रूप से महिमा मंडित भी करती रहती है।

जब तक बलात्कार की इस मूल जड़ को सामूहिक रूप से नहीं काटा जायेगा, हम सभी कभी न कभी एक दूसरे की बहन-बेटियों को अपनी दमित और कुत्सित कामनाओं का यों ही शिकार बनाते रहेंगे और फिर सोशल मीडिया सहित हम सर्वत्र, हर मंच से गरियाते रहने का निरर्थक नाटक भी करते रहेंगे। 

यदि हम में सच कहने की हिम्मत है तो हम सच कहें और देश की आधी आबादी को गुलाम मानने, गुलाम बनाये रखने, उसको बलात्कार तथा भोग की वस्तु मात्र बनी रहने देने और नारी को गुलाम समझने की शिक्षा देने वाले हमारे कथित धर्म ग्रंथों, कथित सांस्कृतिक संस्कारों और कथित सामाजिक (कु) शिक्षाओं के वाहकों को हमें साहस पूर्वक ध्वस्त करना होगा। क्या हम ऐसा करने को तैयार हैं? शायद नहीं!

अभी तक तो ऐसा करने की कोई टिमटिमाती आशा की किरण भी नहीं दिख रही। लेकिन जिस दिन हम ऐसा कर पाये उसके बाद भी हमें हजारों साल पुरानी इस बीमारी के खात्में का अगले कोई पचास सौ साल बाद कुछ सांकेतिक असर दिखेगा। अन्यथा तो नाटक करते रहें कुछ नहीं होने वाला। ये धर्म और संस्कृति जनित मानसिक बीमारी सख्त कानून बनाने या मर्दों या केंद्र सरकार या राज्य सरकारों को कोसने या गाली देने से नहीं मिटने वाली!

यदि हममें हिम्मत है तो इस दिशा में चिंगारी जलाएं करें, अन्यथा घड़ियाली आंसू बहाने से कुछ नहीं होगा। बलात्कार की जो घटनाएं सामने आ रही हैं, वे बलात्कार के कड़वे सच का संकेत मात्र हैं। सच तो ये है की हर रोज हजारों बलात्कार इज्जत की चादर में लपेट कर दफना दिए जाते हैं!
-Mob : 09875066111, Mail : nacbmail@gmail.com, Facebook : https://www.facebook.com/drnirankush

Wednesday, May 14, 2014

विवाह का झांसा देकर यौन सम्बन्ध बनाने वाले को बलात्कारी घोषित करने वाला कानून कितना जायज?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

अप्रेल 2014 के तीसरे सप्ताह में नयी दिल्ली की अतिरिक्त जिला एवं सेशन जज निवेदिता अनिल शर्मा ने एक न्यायसंगत और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसकी आवाज दब गयी। लेकिन यदि यही फैसला किसी पुरुष जज द्वारा सुनाया गया होता तो नारीवादी संगठन और नारीवादी लेखक-लेखिका सम्पूर्ण पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा कर देते और पुरजोर मांग की जाती कि महिलाओं के मामलों में महिला जजों द्वारा सुनवाई की जाकर निर्णय सुनाये जाने चाहिये। देशभर में महिला शक्तिकरण की मांग गूंज उठती और पुरुषों को पक्षपाती तथा न जाने क्या-क्या कहकर कोसा जाता! इस विषय को आगे बढाने से पहले इस प्रकरण के तथ्यों पर बिन्दुवार प्रकाश डालना उचित होगा :-

1. एक विवाहित महिला (जिसका सुप्रीम कोर्ट के एक निर्णय के अनुसार नाम उजागर नहीं किया जा सकता) जो एक बेटे की मॉं भी है, जिसने अपने पति से तलाक लिये बिना, एक विवाहिता पत्नी और मॉं होते हुए उसने अपने एक मित्र के साथ इश्क लड़ाना शुरू कर दिया।

2. दोनों का इश्क आगे बढता गया और दोनों के मध्य यौन सम्बन्ध बन गये। जिन्हें अंग्रेजी में एक्ट्रा मैरीटल अफेयर का नाम दिया गया है।

3. यह महिला कहती है कि उसने अपने प्रेमी के साथ इस कारण से विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाये, क्योंकि उसके प्रेमी ने उसको विवाह करने का वायदा किया था।

4. विवाहेत्तर सम्बन्धों के कारण उक्त विवाहित स्त्री कथित रूप से गर्भवती हो गयी, लेकिन उसके अनुसार उसके प्रेमी द्वारा गर्भपात करवा दिया गया। इस प्रकार दोनों के आपसी सम्बन्धों में खटास पैदा हो गयी।

5. इसके बाद इस स्त्री ने अपने प्रेमी के विरुद्ध केस दायर किया कि उसके प्रेमी ने उसे शादी का झांसा देकर बलात्कार किया और बाद में उसका गर्भपात करवा दिया।

6. प्रेमी के विरुद्ध बलात्कार का मुकदमा दर्ज हो गया और उसके विरुद्ध अतिरिक्त जिला अदालत में बलात्कार का मुकदमा चलाया गया।

7. दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद निर्णय सुनाते हुए अतिरिक्त सेशन एवं जिला जज निवेदिता अनिल शर्मा ने अपने फैसले में कहा है कि आजकल विवाहेत्तर सम्बन्धों को बलात्कार के केस में बदलने की प्रवृत्ति चल निकली है। इस कारण आये दिन ऐसे मामले सामने आ रहे हैं।

8. अतिरिक्त जिला जज ने इस मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए आरोपी को बलात्कार और धोखाधड़ी के आरोप से बरी करते हुए कहा कि रेकॉर्ड पर पेश साक्ष्यों से ऐसा कहीं भी साबित नहीं होता कि आरोपी ने 26 वर्षीय महिला से शादी का झूठा वादा कर उसके साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाए थे। अत: बलात्कार के आरोपी प्रेमी को निर्दोष मानते हुए दोषमुक्त कर दिया।

उपरोक्त फैसले की खबर समाचार-पत्रों में छपकर दब गयी, लेकिन अन्तरजाल पर इस खबर को कुछ न्यूज पोर्टल्स ने प्रमुखता से प्रकाशित किया, जिस पर अनेक पुरुष पाठकों ने टिप्पणी की। जिनमें से कुछ पाठकों की टिप्पणियॉं यहॉं प्रकाशित की जा रही हैं :-

प्रदीप शर्मा, दिल्ली का कहना है : लड़कियों के लिए जितने मजबूत कानून बनाओ वो उसका नाजायज फायदा उठाने की कोशिश करती हैं। और लड़कों को फसांती हैं।

नीरज रावत, नयी दिल्ली का कहना है : सही फैसला। जब तक अफैयर सही चला कुछ नहीं.....और बिगड़ गयी तो केस? हद है।

देव दिल्ली का कहना है : एक्सट्रा मैरिटल अफेयर को रेप केस में बदलने का ट्रेंड चल पड़ा है। 

अनाम पाठक का कहना है : अदालत ने कहा कि शादीशुदा होने के बावजूद महिला ने अफेयर किया और बाद में उसने बड़ी आसानी से अपने प्रेमी पर रेप का आरोप लगा दिया। महिला का एक बेटा भी है। महिला ने अपनी शिकायत में दावा किया कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाए। महिला ने आरोप लगाया कि बाद में वह अपने वादे से मुकर गया और उसका अबॉर्शन भी करवा दिया। इस मुकदमों को कोर्ट तक पहुँचाने से पहले किसी को कुछ भी समझ में क्यों नहीं आया।

मनीष भट्ट, नयी दिल्ली, का कहना है : सही फैसला। जब तक अफैयर सही चला कुछ नही और आपस में बिगड़ गयी तो केस? कानून का मजाक बना दिया है।

अर्काय, आगरा का कहना है : जब अफेयेर है तो रेप कैसा, सही फैसला?

वेंकट सिंह, दिल्ली का कहना है : प्री/एक्सट्रा मैरिटल अफेयर को रेप केस में बदलने का ट्रेंड चल पड़ा है...जब तक लड़की को ठीक ल रहा है, तब तक सब सही और बात बिगड़ जाये तो रेप का केस कर दो....बहुत अच्छा!!! क्या यही कानून है?

अनजान बनर्जी, सहारनपुर का कहना है : फैसला सही है, अपने निजी स्वार्थ के चलते और पैसे के लालच में और ब्लैकमेल के ट्रेंड के चलते ये झूंठे केस अब सामने आने लगे हैं। यह एक बहुत बड़ी सच्चाई है रेप और धरा 498ए का इस्तेमाल सिर्फ बदला लेने, पुरुषों को मारने एवं उनकी जायदाद लूटने के लिये किया जाता है बचो मर्दो.. इन औरत वाले ख़ूनी पंजों से।

ललित भारद्वाज, दिल्ली का कहना है : आजकल अदालत का काम जरा मुश्किल हो गया है, ऐसे झूठे आरोपों के कारण!

प्रतीक शर्मा, कानपुर का कहना है : मैं एक ऐसी घटना का साक्षी हूँ, जिसमें एक लड़की और एक लड़के के बिना विवाह के ही शारीरिक सम्बन्ध स्थापित हो गये। दोनों ने कई वर्ष तक एक साथ ख़ूब मौज-मस्ती की। एक दिन उस लड़के ने लड़की को किसी दूसरे लड़के के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया तो उसने उस लड़की से किनारा कर लिया। जिस पर उस लड़की ने लड़के के खिलाफ विवाह का झांसा देकर जबरन बलात्कार करने का मुकदमा दायर कर दिया। लड़के को पता चला तो उसे इतना गहरा आघात लगा कि उसने रेल के नीचे कटकर आत्महत्या कर ली। लड़की का कुछ नहीं बिगड़ा, लेकिन मॉं-बाप का इकलौत पुत्र असमय बिछुड़ गया। ऐसे एक नहीं अनेक मामले हर शहर में मिल जायेंगे। 

इस प्रकरण में सर्वाधिक विचारणीय प्रश्न यह है कि आरोप लगाने वाली औरत यदि विवाहिता नहीं होती तो बलात्कार के आरोपी का सजा से बचना लगभग असम्भव था। इस प्रकार के प्रकरणों के आये दिन सामने आने से अब यह जरूरी हो गया है कि कम से कम बालिग औरतों के मामले में तो इस प्रकार का कानून तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया जाना चाहिये। क्योंकि किसी बालिग अर्थात् समझदार औरत को किसी पुरुष द्वारा यौन-सम्बन्ध स्थापित करने के लिये झांसा दिया जाने का अपराध अपने आप में हास्यास्पद है।

यद्यपि यहॉं ये बात सही है कि अनेक पुरुष शादी का वायदा करके, बाद में किन्हीं विशेष या सामान्य कारणों से, किसी दुर्भावना से या बिना किसी दुर्भाव के विवाह करने से इनकार कर देते हैं और तब ऐसी लड़कियों की ओर से यही आरोप लगाया जाता है कि विवाह का झांसा देकर के उसके साथ यौन-सम्बन्ध बनाये और बाद में विवाह करने से इनकार कर दिया। इस स्थिति को बलात्कार के अपराध में आसानी से बदल दिया जाता है। जबकि इसके ठीक विपरीत भी स्थितियॉं निर्मित होती ही हैं। लड़का-लड़की दोनों में प्रेम हो जाता है। दोनों साथ जीने-मरने की कसमें खाते हैं और सारी सीमाओं को लांघते हुए अपनी यौन-पिपासा को शान्त करते रहते हैं। बाद में घरवालों के दबाव में या अन्य किसी से सम्बन्ध बन जाने पर लड़कियॉं किसी दूसरे लड़के के साथ विवाह रचा लेती हैं।

इन हालातें में दूसरे लड़के से विवाह करने वाली लड़कियों की ओर से ऐसे पूर्व प्रेमी लड़कों के विरुद्ध विवाह का झांसा देकर यौन शोषण करने या बलात्कार करने का कोई मुकदमा दर्ज नहीं करवाये जाते हैं, लेकिन ऐसे हालातों में पीड़ित लड़के या पुरुष के पास कोई कानूनी उपाय क्यों नहीं होना चाहिये? जबकि स्त्री के पास विवाह का झांसा देकर बलात्कार करने का आरोप लगाने का कानूनी अधिकार है। क्या ये स्थिति लैंगिक विभेद को जन्म नहीं देती है और इस कारण से अनेकानेक लड़कों/पुरुषों का जीवन बर्बाद नहीं हो रहा है? इसलिये इस कानून को तत्काल बदलने पर विचार किये जाने की जरूरत है।

Thursday, March 13, 2014

मुआवजे के बदले अपमान क्यों? जबकि है-अपमानकारी मुआवजे का स्थायी समाधान!

बलात्कारित स्त्री और मृतक की विधवा, बेटी या अन्य परिजनों को लोक सेवकों के आगे एक बार नहीं बार-बार न मात्र उपस्थित होना होता है, बल्कि गिड़गिड़ाना पड़ता है और इस दौरान कनिष्ठ लिपिक से लेकर विभागाध्यक्ष तक सबकी ओर से मुआवजा प्राप्त करने के लिये चक्कर काटने वालों से गैर-जरूरी तथा मनमाने सवाल पूछे जाते हैं। ऐसी-ऐसी बातें पूछी और कही जाती हैं, जिनका न तो मुआवजे से कोई ताल्लुकात होता है और न ही पूछने वालों को इस प्रकार के सवाल पूछने या जानकारी प्राप्त करने का कोई वैधानिक अधिकार होता है।........... जनता के इन नौकरों द्वारा बलात्कार की शिकार महिलाओं और मृतक की विधवा या बेटियों के संग कुकृत्य तक किये जाते हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

किसी भी स्त्री का बलात्कार और किसी भी परिवार के सदस्य की किसी हादसे में असामयिक मौत के बाद आमतौर पर सरकारों की ओर से मुआवजा देने की घोषणाएं की जाती हैं या निर्धारित नीति के अनुसार प्रशासन की ओर से मुआवजा दिये जाने के प्रावधान होते हैं। दोनों ही स्थितियों में मुआवजा प्राप्त करने के लिये दुष्कृत्य की शिकार स्त्री और मृतक के परिजनों को मुआवजा प्राप्त करने के लिये आवेदन करना विधिक अनिवार्यता है। यहॉं तक तो सब ठीक माना जा सकता है, लेकिन आवेदन करने मात्र से मुआवजा नहीं मिलता है। मुआवजे के लिये बलात्कारित स्त्री और मृतक की विधवा, बेटी या अन्य परिजनों को लोक सेवकों के आगे एक बार नहीं बार-बार न मात्र उपस्थित होना होता है, बल्कि गिड़गिड़ाना पड़ता है और इस दौरान कनिष्ठ लिपिक से लेकर विभागाध्यक्ष तक सबकी ओर से मुआवजा प्राप्त करने के लिये चक्कर काटने वालों से गैर-जरूरी तथा मनमाने सवाल पूछे जाते हैं। ऐसी-ऐसी बातें पूछी और कही जाती हैं, जिनका न तो मुआवजे से कोई ताल्लुकात होता है और न ही पूछने वालों को इस प्रकार के सवाल पूछने या जानकारी प्राप्त करने का कोई वैधानिक अधिकार होता है। लेकिन तकदीर और ईश्‍वर के दण्ड से दंशित और हालातों के आगे विवश ऐसे लोगों को सरकारी कार्यालयों में जनता की सेवा के नाम पर नियुक्त जनता के नौकरी की हर जायज-नाजायज बात सुननी और अनेक बार माननी भी पड़ती है। जिसके तहत जहॉं रिश्‍वत की मांग करना और रिश्‍वत प्राप्त करना तो आम बात है, लेकिन जनता के इन नौकरों द्वारा बलात्कार की शिकार महिलाओं और मृतक की विधवा या बेटियों के संग कुकृत्य तक किये जाते हैं। इस प्रकार की घटनाएँ केन्द्र और राज्य सरकारों के तकरीबन सभी विभागों में आमतौर पर आये दिन घटित होती रहती हैं। जिससे हर कोई वाकिफ है, लेकिन जिस प्रकार से दलित-आदिवासियों पर सरेआम होने वाले अत्याचारों कोे देखकर हजारों सालों से लोग मौन रहते आये हैं, उसी प्रकार से आदिकाल से महादलित बना दी गयी स्त्री या हालातों से मजबूर विवश इंसान की दुर्दशा को देखकर भी ऐसे मामलों में लोग मौन साध लेते हैं।

जमीन और जनता से जुड़ा हर जन प्रतिनिधि इन सब हालातों और क्रूरताओं से बखूबी वाकिफ होता है, यदि वो चाहे तो मन्त्री बनते ही ऐसे मामलों को चुटकी बजाते ही ठीक कर सकता है, लेकिन मन्त्री की कुर्सी पर बैठते ही वह स्वयं को राजा समझने लगता है। जिसके चलते उसे जनता के दु:ख-दर्द की आह सुनाई देना बन्द हो जाती है। अन्यथा क्या कोई भी सरकार केवल 5 कानून पारित करके, इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं कर सकती?
  • 1. पीड़ित, पीड़ित के परिजनों या अन्य किसी की भी ओर से, किसी भी प्रारूप में-जैसे-फोन, मोबाइल या पत्र के जरिये दी गयी सूचना को मुआवजा प्रदान करने की पत्रावलि शुरू करने के लिये कानूनी रूप से पर्याप्त दस्तावेज और आधार माना जाने का कानून हो।
  • 2. उक्त बिन्दु 1 के अनुसार सूचना प्राप्ति के एक सप्ताह के अन्दर कोई सकारात्मक तथा संवेदनशील तरीके से कार्य करने में निपुण और प्रशिक्षित लोक सेवक पीड़ित/आहत परिवार को अग्रिम सूचना देकर, पीड़ित/आहत परिवार की सुविधानुसार उनके घर या बताये किसी भी सुगम स्थान पर उपस्थित होकर स्वयं सरकारी खर्चे पर सारी औपचारिकताएँ पूर्ण करवाने के लिये कानूनी रूप से बाध्य हो।
  • 3. उक्त बिन्दु 2 के अनुसार औपचारिकताएँ पूर्ण करवाने के बाद हर हाल में आवेदन करने की तारीख से एक माह के अन्दर-अन्दर मुआवजे की राशि का चैक पीड़िता या कानूनी रूप से पात्र व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम सम्बन्धित तहसीलदार या उपखण्ड अधिकारी या समकक्ष अन्य प्राधिकारी द्वारा उनके निवास पर स्वयं उपस्थित होकर व्यक्तिगत रूप से प्रदान किये जाने का कानूनी प्रावधान हो।
  • 4. उपरोक्त बिन्दु 2 एवं 3 की पालना करने के लिये नामित/घोषित अधिकारियों/प्राधिकारियों के नाम और पदनाम सार्वजनिक रूप से परिपत्रित/प्रचारित किये जावें। ऐसे प्राधिकारियों की ओर से हर एक मामले की दैनिक प्रगति/कार्यवाही प्रतिदिन अपनी वैबसाइट पर डालना अनिवार्य हो और विलम्ब करने पर नामित/घोषित अधिकारी का कम से कम छ: माह का मूल वेतन काटने का कानूनी प्रावधान हो।
  • 5. ऐसे हर एक मामले की पहली और अन्तिम अपील सम्बन्धित जिला जज के समक्ष ही पेश किये जाने का प्रावधान हो, जिसका निर्णय जिला जज द्वारा हर हाल में एक माह के अन्दर-अन्दर किये जाने का कानूनी प्रावधान हो। अन्यथा जिला जज की एक वेतन वृद्धि रोकी जाने की कानूनी व्यवस्था हो।
यदि केन्द्र सरकार द्वारा या राज्य सरकार द्वारा उपरोक्त कानूनी प्रावधान पारित कर दिये जावें तो मुआवजे के कारण हो रहे पीड़ितों के अपमान और शोषण को हमेशा-हमेशा को रोका जा सकता है। केवल इतना ही नहीं यदि कोई लोकतांत्रिक सरकार केवल पांच कदम उठा सकती है तो अपने माथे से अपमानकारी मुआवजे के कलंक को हमेशा-हमेशा के लिये मिटा सकती है। जरूरत इस बात की है कि इसके लिये हम सरकार को मजबूर करें!

-लेखक : भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, जर्नलिस्ट्स, मीडिया एण्ड राईटर्स वैलफेयर एसोसिएशन के नेशलन चेययरमैन, प्रेसपालिका (पाक्षिक) के सम्पादक हैं। ऑल इण्डिया ट्राईबल रेलवे एम्पलाईज एशोसिएशन के संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष और अजा एवं अजजा के अखिल भारतीय परिसंघ के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव। इसके अलावा लेखक को लेखन एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये एकाधिक राष्ट्रीय सम्मानों से विभूूषित भी किया जा चुका है।-98750-66111 

Thursday, September 19, 2013

कानून है किस चिड़िया का नाम?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 में कहा गया है कि कानून के सामने प्रत्येक व्यक्ति को एक समान समझा जायेगा और प्रत्येक व्यक्ति को कानून का एक समान संरक्षण प्रदान किया जायेगा| जिसके तहत प्रत्येक अपराधी के विरुद्ध एक समान कानूनी कार्यवाही करना भी शामिल है, लेकिन इसके बावजदू भी पिछले कुछ समय से भारत में कुछ इस प्रकार की घटनाएँ हो रही हैं, जिन्हें जान, समझ और पढकर मैं ये सोचने को विवश

Sunday, April 28, 2013

भारत का बलात्कार करने वाले लड़ रहे हैं बलात्कार की लड़ाई!

सच तो ये है कि भारत का मतलब है भारत के असली मालिक, जो आज हर क्षेत्र में सबसे निचले पायदान पर वंचित वर्गों में शामिल हैं और इन्हीं वंचित वर्गों के हकों और स्वाभिमान का, हर क्षेत्र में दिनरात बेरोकटोक बलात्कार होता रहता है, जो वास्तव में भारत के साथ बलात्कार है। लेकिन भारत के साथ हजारों सालों से बलात्कार करने वाले इन 15 फीसदी वर्ग के लोगों में शामिल कुछ चालाक और षड़यंत्रकारी आज खुद आम आदमी की टोपी पहनकर और भगवा वस्त्र धारण करके बलात्कार के खिलाफ संघर्ष करने का नाटक खेल रहे हैं। इस  षड़यंत्र में कॉंग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार भी बुरी तरह से फंस चुकी है, क्योंकि कॉंग्रेस पार्टी में भी, कॉंग्रेसी चोला धारण किये हुए, इन फासिस्ट और देशद्रोहियों के ऐजेंट नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हैं।

Sunday, December 30, 2012

बलात्कार : स्थितियां कैसे बदलेंगी?

सच यह है कि हमारे देश में कानून बनाने, कानून को लागू करने और कोर्ट से निर्णय या आदेश या न्याय या सजा मिलने के बाद उनका क्रियान्वयन करवाने की जिम्मेदारी जिन लोक सेवकों या जिन जनप्रतिनिधियों के कंधों पर डाली गयी है, उनमें से किसी से भी भारत का कानून इस बात की अपेक्षा नहीं करता कि उन्हें-संविधान, न्यायशास्त्र, प्राकृतिक न्याय, मानवाधिकार, मानव व्यवहार, दण्ड विधान, साक्ष्य विधि, धर्मविधि, समाज शास्त्र, अपराध शास्त्र, मानव मनोविज्ञान आदि विषयों का ज्ञान होना

Friday, December 21, 2012

बलात्कार से निजात कैसे?

एक पुलिस का जवान कानून व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिये पुलिस में भर्ती होता है, लेकिन पुलिस अधीक्षक उसे अपने घर पर अपनी और अपने परिवार की चाकरी में तैनात कर देता है। (जो अपने आप में आपराधिक न्यासभंग  का अपराध है और इसकी सजा उम्र कैद है) जहॉं उसे केवल घरेलु कार्य करने होते हैं-ऐसा नहीं है, बल्कि उसे अफसर की बीवी-बच्चियों के गन्दे कपड़े भी साफ करने होते हैं। क्या यह उस पुलिस कॉंस्टेबल के सम्मान का बलात्कार नहीं है?


Tuesday, August 14, 2012

पाकिस्तान में हिन्दू स्त्रियों का बलात्कार और भारत की चुप्पी के मायने?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
1-भारत सरकार का ये नैतिक, मानवीय, धार्मिक, राष्ट्रीय, संवैधानिक और वैश्‍विक फर्ज है कि वह अपने स्तर पर कूटनीतिक प्रयासों के जरिये पाकिस्तान की सरकार को कड़ा सन्देश दे कि मानवता का मजाक उड़ाने वाले और हिन्दू बहन-बेटियों के साथ कुकर्म

Sunday, September 12, 2010

अतृप्त दाम्पत्य कारण एवं निवारण!



डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

दाम्पत्य मामलों में सलाहकार की भूमिका का वर्षों से निर्वाह करते-करते अचानक विचार आया कि हजारों लोगों की कहानियों को अपने मन में दबा कर दुनिया से विदा हो जाने के बजाय, इस दुनिया को सच्चाई से रूबरू करवाकर बताया जाये कि हमारा दाम्पत्य जीवन किस दौर से गुजर रहा है? लेकिन दम्पत्तियों के नाम, स्थान, आयु आदि के बारे में किसी भी प्रकार की जानकारी को प्रकट करना अनैतिक, गैर-कानूनी और अविश्वासपूर्ण है।

इसलिये मैं यहाँ पर पात्रों के नाम, शहरों के नाम और उनकी आयु को बदल कर अपने अनुभव बांटने जा रहा हूँ। हालांकि कुछ दम्पत्तियों ने उनके नाम सहित उनकी जानकारी प्रकाशित करने के लिये सहमति प्रदान की है, जिससे यह बात भी मजबूत होकर उभर रही है कि अब हमारे शहरों पर अमरीका एवं यूरोप का प्रभाव कितनी तेजी से बढ रहा है?

अक्सर मुझसे वे लोग मिलते हैं, जिनका विवाह हो चुका होता है और कई महिनों के बाद भी उनकी पटरी नहीं बैठ पाती है। कुछ युवक-युवति विवाह पूर्व भी सलाह लेने आते रहते हैं, जिन्हें विवाह पूर्व के यौन-सम्बन्धों को लेकर अपने भावी दाम्पत्य जीवन को लेकर अनेक प्रकार की शंकाएँ होती हैं। विवाहित जोडों की समस्याओं में भी अधिकतर मामलों में विवाह पूर्व के यौन-सम्बन्ध या विवाहेत्तर यौन सम्बन्ध ही समस्या का असली कारण होते हैं।

प्रथम आलेख में कोई दस वर्ष पहले की घटना का उल्लेख कर रहा हूँ। एक नवविवाहिता (जिसके विवाह को 20-25 दिन ही हुए थे), जिसे हम यहाँ काल्पनिक तौर पर मीनाक्षी नाम दे सकते हैं। अपने पति के साथ सिरदर्द का उपचार करवाने के बहाने मेरे पास आयी और धीरे से कहा कि क्या मैं आपसे अकेले में कुछ कह सकती हूँ। मैंने उनके पति को समझाया के वे बाहर के कमरे में बैठकर कर पत्रिकाएँ पढें, तब तक मैं आपकी पत्नी की तकलीफ सुन लेता हूँ।

मीनाक्षी ने घुमाफिरकार जो कुछ बतलाया उसका निष्कर्ष यह था कि उसकी उम्र 23 वर्ष है, वह 16 वर्ष की उम्र से लगातार अनेक पुरुषों/युवकों के साथ यौनसुख का आनन्द प्राप्त करती रही, लेकिन अपने पति से वह तनिक भी सन्तुष्ट नहीं है। उसने सीधा सवाल किया कि क्या इस समस्या का कोई समाधान सम्भव है या उसे तलाक लेना पडेगा? मैंने कुछ प्लासिबों-पिल्स देकर कहा कि चिन्ता मत करो दवाईयों से सब ठीक हो जायेगा। अपने आपको निराशा के भंवर से बाहर निकालो।

मीनाक्षी को तीन दिन बाद आने को कहा और उसके पति सुभाष (परिवर्तित नाम) को अन्दर बुलाकर अगले दिन अकेले में आने का कहा। सुभाष दूसरे दिन आकर मिला। उतावलेपन में खुदबखुद ही कहने लगा कि मेरी पत्नी ने क्या आपसे मेरे बारे में कुछ बताया है? डॉक्टर साहब बताईये मैं क्या करूँ? मुझे लगता है कि मेरी पत्नी मुझसे बिलकुल भी सन्तुष्ट नहीं है! मैंने उससे पूछा कि तुमको ऐसा क्यों लगता है, उसने बताया कि मैं अपनी पत्नी से हर रात, एक तरह से बलात्कार ही कर रहा हूँ। वह मेरा साथ नहीं देती है और रोने लगती है या जोर से गुस्सा हो जाती है। कुछ न कुछ समस्या जरूर है।

सुभाष ने बिना कुछ पूछे ही मुझे बहुत कुछ बतला दिया मैंने उससे पूछा कि विवाह पूर्व क्या स्थिति थी? पहले तो वह झेंपा लेकिन कुछ ही देर में खुलकर बताने लगा कि मैं 16-17 वर्ष का था तब से लगातार हस्तमैथुन करता आ रहा हूँ। बहुत प्रयास करने के बाद भी मुझे विवाह से पूर्व कोई लडकी नहीं मिली। इस कारण मैं हीन भावना का भी शिकार हो गया था, लेकिन खूबसूरत पत्नी पाकर मैं खुश था कि मेरा विवाहित जीवन आगे खुश रहने वाला है। परन्तु दर्भाग्य से सब बेकार हो गया! वो तो मुझसे हमेशा दूर-दूर भागती रहती है। रात को घरवालों के कारण मजबूरी में मेरे साथ आती है। शादी के बाद जो रोमांस की कल्पना थी, वैसा कुछ भी नहीं है। मैं क्या करूँ, जिससे मेरी पत्नी मेरे साथ खुशी-खुशी यौन-सम्बन्ध स्थापित कर सके?

सुभाष ने आगे बतलाया कि पहली रात को वह घबराहट एवं भय के कारण बहुत प्रयास करने के बाद भी सम्भोग नहीं कर पाया। उसे इतनी घबराहट हो गयी और उत्तेजना ही नहीं हुई। पहली रात को उसके अनुसार उसकी पत्नी का व्यवहार अच्छा था, लेकिन सारी रात कुछ नहीं कर पाने के कारण सुबह बिस्तर छोडते समय ही मीनाक्षी ने सुभाष को व्यंगात्मक लहजे में कहा कि मुझसे शादी किसलिये की है? बस इसके बाद तो सुभाष की मनोस्थित अत्यन्त खराब हो गयी। वह शर्म के मारे मरा जा रहा था, उसने बताया कि पत्नी की बात सुनकर एक बार तो उसके मन में खुदकुशी का विचार भी आया था।

सुभाष ने बतलाया कि उसने अपने आपको जैसे-तैसे संभाला और साहस करके अपनी पत्नी को समझाया कि आज उसकी तबियत ठीक नहीं है। शान्त रहो आगे भी बहुत सारी रात आयेंगी। इस पर उसकी पत्नी ने उसे उलाहना दिया कि सुहाग रात तो दुबारा नहीं आने वाली! कहते-कहते सुभाष मेरे सामने रो दिया था।

सुभाष ने आगे बताया कि जैसे-तैसे अगली रात को उसने अर्द्ध-उत्तेजना में अपनी पत्नी से सम्भोग का प्रयास किया तो कुछ ही क्षणों में वीर्यपात हो गया। इस पर उसकी पत्नी गुस्सा हो गयी और रोने गली। साहस करके कुछ समय बाद दुबारा सम्भोग करने का प्रयास किया तो इन्द्रिय में उत्तेजना तो पूर्ण थी, लेकिन मीनाक्षी ने सहयोग ही नहीं दिया और बिना यौनि में इन्द्रिय को डाले ही वीर्यपात हो गया।

मैंने सुभाष को भी तीन दिन बाद अकेले आने को कहकर और कुछ प्लासिबों-पिल्स देकर विश्वास दिलाया कि उसे कोई बीमारी नहीं है और वह पूरी तरह से स्वस्थ है। उसे केवल अपने आत्मविश्वास को बनाये रखने की जरूरत है। उससे कह दिया कि जब भी वह अपनी पत्नी को लेकर आये तो उसे अन्दर छोडकर, खुद बाहर बैठ जाये।

अगली बार जब सुभाष के साथ मीनाक्षी आयी तो वह प्रसन्न थी। सुभाष बाहर बैठ गया। वह बोली डॉक्टर साहब आपने मेरे पति को कुछ कहा? नहीं मैंने तो कुछ नहीं कहा, मैंने उसे स्पष्ट किया! मीनाक्षी बोली, आपके पास से जाने के बाद मुझे सुभाष कुछ बदला-बदला सा लग रहा है? डॉक्टर साहब कुछ ऐसा करें कि हमारा जीवन बर्बाद होने से बच जाये।

मीनाक्षी की बातों से लगा कि वह विवाह पूर्व की बातों को लेकर स्वयं पर गुस्सा थी और स्वयं को अपराधी मान रही थी। उसका कहना था कि मैंने विवाह पूर्व जो पाप किये हैं, मुझे उसी की सजा मिल रही है।

मीनाक्षी को समझाया कि सुभाष में कोई शारीरिक दोष नहीं है, तुम उसे न चाहते हुए भी पूरा सहयोग दो और सम्भोग के दौरान ऐसा प्रकट करो कि जैसे तुमको पूर्ण यौनानन्द की प्राप्ति हो रही है, फिर देखना कुछ ही दिनों में चमत्कार हो जायेगा। इसके अलावा यौनि को सिकोडने के कुछ तरीके भी मीनाक्षी को सुझाये और तीन दिन की प्लासिबो-पिल्स दे दी।

अगले दिन सुभाष खुश था, बोला साहब आपने तो चमत्कार कर दिया। मेरी पत्नी भी बदल गयी है, मुझे भी सम्भोग में आनन्द आ रहा है। लेकिन अभी भी पूर्ण सुधार बाकी है। उसने बताया कि उसकी असल समस्या यह है कि उसकी पत्नी की यौनि ढीलीढाली है, जिसके कारण उसे घर्षण में उतना भी आनन्द नहीं आता, जितना कि हस्तमैथुन में आता था। सुभाष ने बताया कि इसलिये वह अभी भी दिन में एक बार हस्तमैथुन के जरिये यौनसुख प्राप्त करता है।

मैंने सुभाष को बतलाया कि तुम्हारी समस्या की असली जड यही सोच है। तुम अपनी हथेली के मनमाफिक दबाव के साथ अपनी इन्द्रिय को उत्तेजित करके यौनसुख प्राप्त करने के आदि हो चुके हो, जबकि यौनि का अन्दर का भाग बहुत ही नाजुक और लचीला तथा हथैली की तुलना में बेहद कौमल होता है, जो तुमको ढीलाढाला अनुभव होता है। प्रकृति की अनुपम सौगात यौनि की कौमलता को तुम समझ ही नहीं पा रहे हो और अप्राकृतिक हस्तमैथुन को सच्चा यौनानन्द समझ बैठे हो। जब तक इस मानसिकता को नहीं बदलोगे, न तुम सुखी रहोगे और न तुम्हारी पत्नी को सुखी रख सकोगे। तुमको हस्तमैथुन के बारे में सब कुछ भुलाकर पत्नी संसर्ग को ही सच्चा सुख मानना होगा। इसके अलावा मैंने उसे विश्वास दिलाया कि तुम्हारी पत्नी को कुछ ऐसी दवाई दी हैं, जिनसे उसकी यौनि में कुछ कसावट आयेगी। लेकिन तुम गलती से भी आगे कभी हस्तमैथुन नहीं करना।

अगली मुलाकता में मीनाक्षी ने भी वही बात कही कि मुझे लगता है कि विवाह पूर्व अनेक वर्षों तक अनेक पुरुषों और लडकों के साथ सम्भोग करने के कारण उसकी यौनि ढीली हो गयी है, इस कारण सुभाष को मजा नहीं आता है। इस बारे में मीनाक्षी को समझाया कि हाँ इससे कुछ फर्क जरूर पडता है, लेकिन इतना फर्क नहीं पडता जितना की वह सोचती है। उसे बतलाया कि बच्चे होने के बाद भी तो पुरुष स्त्री के साथ पूर्ण यौन आनन्द प्राप्त करता है। उसे कहा कि होम्योपैथी में कुछ दवाई ऐसी होती हैं, जो यौनि में कसावट ला देती हैं। एक माह तक इसका सेवन करो और अपने दिमांग से पुरानी बातों को निकाल दो। तुम पूर्ण नारी हो और तुम्हारे पति पूर्ण पुरुष हैं। दोनों को एक-दूसरे के बारे में कुछ गलतफहमियाँ हैं, जिन्हें समझकर तुम सुखी एवं सन्तुष्ट जीवन जी सकते हो।

कुल मिलकार नतीजा ये हुआ कि करीब दो माह तक कुछ होम्योपैथिक दवाईयों तथा प्लासिबो-पिल्स का सेवन करने एवं हमारी परामर्श रूपी मनोचिकित्सा के बाद मीनाक्षी एवं सुभाष दोनों के जीवन में बहार आ गयी और उनका यौन जीवन सन्तोषप्रद हो गया।

परमात्मा की कृपा से सुभाष एवं मीनाक्षी के दो फूल से बच्चे भी हैं। जरा-जरा सी भ्रान्ति जीवन को बर्बाद कर देती हैं।

आजकल ऐलोपैथ चिकित्सक युवकों को खुलेआम यह सलाह देते हैं कि हस्तमैथुन से कोई नुकसान नहीं होता। मैं भी मानता हूँ कि कोई बडा शारीरिक नुकसान नहीं होता, लेकिन इसके मानसिक कुप्रभाव घातक होते हैं जो सम्पूर्ण जीवन को बर्बाद कर सकते हैं। इसलिये हस्तमैथुन के मानसिक कुप्रभावों से बचने के लिये हस्तमैथुन कभी नहीं करें और यदि अब से पूर्व कोई युवक करता रहा है तो हस्तमैथुन एवं यौनिजनति यौन सुख में तुलना करके अपने यौन जीवन को बर्बाद नहीं करें।

अन्त में वही एक पंक्ति जो मैं हमेशा कहता रहा हूँ कि-

सेक्स दो टांगों के बीच का खेल नहीं, बल्कि दो कानों के बीच (दिमांग) का खेल है।

अत: स्वस्थ सेक्स के लिये स्वस्थ शरीर के साथ-साथ स्वस्थ मन को होना बेहद जरूरी है।

..................-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, टिप्पणीकार, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध १९९३ में स्थापित एवं १९९४ से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें ०९ सितम्बर, २०१० तक, ४४५४ रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के १७ राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. ०१४१-२२२२२२५ (सायं ७ से ८ बजे)

Thursday, August 19, 2010

डॉ. लोहिया

"भारतीय संस्कृति और डॉ. राम मनोहर लोहिया" पर मेरी टिप्पणी
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

प्रवक्ता डॉट कॉम पर प्रदर्शित आलेख
भारतीय संस्कृति और डॉ. राम मनोहर लोहिया-लेखक डॉ. मजोज चतुर्वेदी पर मेरी टिप्पणी प्रस्तुत है-

बहुयामी लेख लिखने के लिए डॉ. चतुर्वेदी जी को धन्यवाद!

प्रस्तुत लेख के विद्वान लेखक डॉ. मनोज चतुर्वेदी जी का कहना है कि-

“डॉ. राममनोहर लोहिया भारतीय संस्कृति के व्याख्याता, भारतीय राजनीति के विराट् व्यक्तित्व, भारतीय समाजवाद के प्रचारक तथा एक महान देशभक्त थे। वे राजनीतिज्ञों तथा नौकरशाहों के लिए आतंक थे, तो दलितों के मसीहा, शोषितों के उध्दारक तथा भारतीय राजनीति के स्वप्नद्रष्टा थे।”
आगे आपने लिखा है कि-

“यह ठीक है कि महात्मा गांधी ने राम तथा कृष्ण को ऐतिहासिक व्यक्ति न मानकर (मिथकिय) काल्पनिक व्यक्ति माना है,……”

लेखक ने डॉ. लोहिया के विचारों के बारे में ये भी लिखा है कि-

“क्या शालीनता, सहनशीलता, त्याग, समर्पण तथा पतिव्रत धर्म का पालन करना मात्र स्त्री का ही धर्म है। कि वो पुरूषवादी मानसिकता को सहती रहे। पुरूष उसे संपत्ति माने। उसे जब चाहें रौदे। चाहे जो मन में आए वो करें। यह इसलिए कि वो उस पुरूष की व्याहिता है। उसकी पत्नी है। उसकी संपत्ति है। पर पुरूष के उपर ये नियम नही लागु होते क्या? अन्याय, अत्याचार तथा शोषण का प्रतिकार उसे करनी ही होगी।”

लेखक ने डॉ. लोहिया को उधृत करते हुए लिखा है कि डॉ. लोहिया ने कहा था कि-

१-”बनारस और दूसरी जगह के मंदिरों में हरिजन सवर्ण भेद खत्म हो।”

२-”भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति ने पुण्य नगरी काशी में सार्वजनिक रूप से दो सौ ब्राह्मणों के पैर धोए। सार्वजनिक रूप से किसी का पैर धोना अश्लीलता है। इस अश्लील काम को ब्राह्मण जाति तक सीमित करना दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए। इस विशेषाधिकार प्राप्त जाति में अधिकांशतः ऐसो को सम्मिलित करना, जिनमें न योग्यता हो न चरित्र, विवेक बुद्धि का पूरा त्याग है जो जाति-प्रथा और पागलपन अवश्यंभावी अंग है।”

३-"बलात्कार और वादाफरामोशी को छोड़कर औरत-मर्द के बीच सारे रिश्ते जायज है। लड़की की शादी करना मां-बाप की जिम्मेवारी नहीं, अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दे देने पर उनकी जिम्मेवारी खतम हो जाती है।”

४- "अवसर मिलने से योग्यता आती है। देश में सभी 60 प्रतिशत अवसर हिंदुस्तान की 90 प्रतिशत आबादी यानि शुद्र, हरिजन, धार्मिक अल्पसंख्यकों की पिछड़ी जातियां, औरत और आदिवासियों को मिलनी चाहिए। इस सिध्दांत को ऊंची-से-ऊंची प्रतियोगिता में लागू करना चाहिए।”

लेखक आगे लिखते है कि-

डॉ. लोहिया राष्ट्रीय एकता एवं समाजिक समरसता के लिए एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें-

“जोशी, पांडेय, मिश्रा, उपाध्याय, त्यागी, प्रधान, सिंह, राठौर, रेड्डी, नंबुदरी, डोंगरा, मुखर्जी, यादव, हरिजन नामक जाति सूचक शब्दों का स्थान न होता तथा राज्यसत्ता पर ब्राह्मण तथा बनिया वर्चस्व समाप्त हो।”

विद्वान लेखक डॉ. मनोज चतुर्वेदी जी एवं डॉ. लोहिया के विचारों से सहमति या असहमति प्रकट किये बिना विचारणीय मुद्दा/सवाल यह है कि-

मेरे अनेक विद्वान मित्र प्रवक्ता पर डॉ. लोहिया के जैसे विचारों के प्रकटीकरण को देश, हिंदुत्व और संसकृति कि विरुद्ध मानते हैं. क्या डॉ. लोहिया जी भी देश, हिंदुत्व और संसकृति के विरोधी थे?
शायद इस बात से कोई भी सहमत नहीं होगा.

इसलिए सवाल ये नहीं है कि कौन क्या कह रहा है या कौन क्या कह गया है, बल्कि सवाल ये है कि कही हुई बातों पर कहने वालों ने कितना अमल किया? इस कसौटी पर डॉ. लोहिया जी को खरा मानने में कोई मतभेद नहीं हो सकते.

मैं केवल यही कहना चाहूँगा कि सत्य की आराधना करने वाले और सत्य को जीने वाले, सत्य को कहने में संकोच नहीं करते! बेशक महार जाती में जन्मे डॉ. आंबेडकर हों या वैश्य जाती में जन्मे डॉ. लोहिया हों.

हमें भारत के इन महान सपूतों से ईमानदारी से सच को कहने और बिना पूर्वाग्रह सच लो सुनने का सामर्थ्य सीखना होगा. तब ही हम राष्ट्र भक्त या संस्कृति के सच्चे संवर्धक या संरक्षक कहलाने के हक़दार हैं!

Friday, March 19, 2010

नक्सलवाद का कडवा सच!

हमारे देश में नक्सलवाद को राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री देश की सबसे बडी या आतंकवाद के समकक्ष समस्या बतला चुके हैं। अनेक लेखक भी वातानुकूलित कक्षों में बैठकर नक्सलवाद के ऊपर खूब लिख रहे हैं। राष्ट्रपति एवं प्रधानमन्त्री का बयान लिखने वालों में से अधिकतर ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की वस्तुस्थिति जाकर देखना तो दूर, उन क्षेत्रों के जिला मुख्यालयों तक का दौरा नहीं किया है। अपने आप को विद्वान कहने वाले और बडे-बडे समाचार-पत्रों में बिकने वाले अनेक लेखक भी नक्सलवाद पर लिखते हुए नक्सलवाद को इस देश का खतरनाक कोढ बतला रहे हैं।

कोई भी इस समस्या की असली तस्वीर पेश करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। या यह कहा जाये कि असल समस्या के बारे में उनको ज्ञान ही नहीं है। अनेक तो नक्सलवाद पर की असली तस्वीर पेश करने की खतरनाक यात्रा के मार्ग पर चाहकर भी नहीं चलना चाहते हैं। ऐसे में कूटनीतिक सोच एवं लोगों को मूर्ख बनाने की नीति से लिखे जाने वाले आलेख और राजनेताओं के भाषण इस समस्या को उलझाने के सिवा और कुछ भी नहीं कर रहे हैं। राजनेता एवं नौकरशाहों की तो मजबूरी है, लेकिन स्वतन्त्र लेखकों से ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे असल को छोडकर सत्ता के गलियारे से निकलने वाली ध्वनि की नकल करते दिखाई दें। जिन लेखकों की रोजी रोटी बडे समाचार पत्रों में झूठ को सज बनाकर लेखन करने से चलती है, उनकी विवशता तो समझ में आती हैं, लेकिन सिर्फ अपने अन्दर की आवाज को सुनकर लिखने वालों को कलम उठाने से पहले अपने आपसे पूछना चाहिये कि मैं नक्सलवाद के बारे में अपने निजी अनुभव के आधार पर कितना जानता हँू? यदि आपकी अन्तर्रात्मा से उत्तर आता है कि कुछ नहीं, तो मेहरबानी करके इस देश और समाज को गुमराह करने की कुचेष्टा नहीं करें।

नक्सवाद पर कुछ लिखने से पहले मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि मैं किसी भी सूरत में हिंसा का पक्षधर नहीं हूँ और नक्लल प्रभावित निर्दोष लोगों के प्रति मेरी सम्पूर्ण सहानुभूति है। इसलिये इस आलेख के माध्यम से मैं हर उस व्यक्ति को सम्बोधित करना चाहता हूँ, जिन्हें इंसाफ की व्यवस्था को बनाये रखने में आस्था और विश्वास हो। जिन्हें संविधान द्वारा प्रदत्त इस मूल अधिकार (अनुच्छे-14) में विश्वास हो, जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि देश के प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समान समझा जायेगा और प्रत्येक व्यक्ति को कानून का समान संरक्षण प्रदान किया जायेगा। जिनको संवैधानिक व्यवस्था मैं आस्था और विश्वास हो, लेकिन याद रहे, केवल कागजी या दिखावटी नहीं, बल्कि जिन्हें समाज की सच्ची तस्वीर और समस्याओं के व्यावहारिक पहलुओं का भी ज्ञान हो वे ही इन बातों को समझ सकते हैं। अन्यथा इस लेख को समझना आसान या सरल नहीं होगा?

यदि उक्त पंक्तियों को लिखने में मैंने धृष्टता नहीं की है तो कृपया सबसे पहले बिना किसी पूर्वाग्रह के इस बात को समझने का प्रयास करें कि एक ओर तो कहा जाता है कि हमारे देश में लोकतन्त्र है और दूसरी ओर लोकतन्त्र के नाम पर 1947 से लगातार यहाँ के बहुसंख्यक लोगों के समक्ष चुनावों का नाटक खेला जा रहा है। यदि देश में वास्तव में ही लोकतन्त्र है तो सरकार एवं प्रशासनिक व्यवस्था में देश के सभी वर्गों का समान रूप से प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है? सभी वर्गों के लोगों की हर क्षेत्र में समान रूप से हिस्सेदारी भी होनी चाहिये। अन्यथा तो लोकतन्त्र होने के कोई मायने ही नहीं रह जाते हैं!

कुछ कथित प्रबुद्ध लोग कहते हैं, कि इस देश में तो लोकतन्त्र नहीं, केवल भीड तन्त्र है। इस विचारधारा के लोगों से मेरा सवाल है कि यदि लोकतन्त्र नहीं, भीडतन्त्र है तो केवल दो प्रतिशत लोगों के हाथ में इस देश की सत्ता और संसाधन क्यों हैं? भीडतन्त्र का प्रभाव दिखाई क्यों नहीं देता? भीडतन्त्र के पास तो सत्ता की चाबी होती है, फिर भी भीडतन्त्र इन दो प्रतिशत लोगों को सत्ता एवं संसाधनों से बेदखल क्यों नहीं कर पा रहा है? इन सवालों के उत्तर तलाशने पर पता चलेगा कि न तो इस देश में सच्चे अर्थों में लोकतन्त्र है और न हीं इस देश की ताकत भीडतन्त्र के पास है!

उपरोक्त परिप्रेक्ष में नक्सलवाद को समझने के लिये हमें आदिवासियों के बारे में भी कुछ मौलिक बातों को समझना बहुत जरूरी है, क्योंकि अधिसंख्य लोगों द्वारा यह झूठ फैलाया जा रहा है कि केवल आदिवासी ही नक्सलवाद का संवाहक है! वर्तमान में आदिवासी की दशा, इस देश में सबसे बुरी है। इस बात को स्वयं भारत सरकार के आँकडे ही प्रमाणित करते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि आजादी के बाद से आज तक आदिवासी का केवल शोषण ही शोषण किया जाता रहा है। मैं एक ऐसा कडवा सच उद्‌घाटित करने जा रहा हँू, जिसे बहुत कम लोग जानते हैं! वो यह कि आजादी के बाद से दलित नेतृत्व ने भी आदिवासी वर्ग का जमकर शोषण, अपमान एवं तिरस्कार किया है। आदिवासियों के साथ दलित नेतृत्व ने हर मार्चे पर कुटिल विभेद किया है। इसकी भी वजह है। आदिवासियों के शोषण का हथियार स्वयं सरकार ने दलित नेतृत्व के हाथ में थमा दिया है।

इस देश के संविधान में अनुसूचित जाति (दलित) एवं अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) नाम के दो आरक्षित वर्ग प्रारम्भ से ही बनाये गये हैं। जिन्हें संक्षेप में एससी एवं एसटी कहा जाता है। यही संक्षेपीकरण सम्पूर्ण आदिवासियों का और इस देश के इंसाफ पसन्द लोगों का दुर्भाग्य है। इन एससी एवं एसटी दो संक्षेप्ताक्षरों को आजादी के बाद से आज तक इस देश के सभी राजनेताओं और नौकरशाहों ने पर्यायवाची की तरह प्रयोग किया है। इन दोनों वर्गों के उत्थान के लिये बनायी गयी नीतियों में कहीं भी इन दोनों वर्गों के लिये अलग-अलग नीति बनाने पर ध्यान नहीं दिया गया।

सरकार की कुनीतियों के चलते, एससी एवं एसटी वर्गों के कथित हितों के लिये काम करने वाले सभी संवैधानिक, सरकारी, संसदीय, गैर-सरकारी एवं समाजिक प्रकोष्ठों पर देशभर में केवल एससी के लोगों ने ऐसा कब्जा जमाया कि आदिवासियों के हित दलित नेतृत्व के यहाँ गिरवी हो गये। दलित नेतृत्व ने एससी एवं एसटी के हितों की रक्षा एवं संरक्षण के नाम पर केवल एससी के हितों का ध्यान रखा। केन्द्र या राज्यों की सरकारों द्वारा तो यह तक नहीं पूछा जाता कि एससी एवं एसटी वर्गों के अलग-अलग कितने लोगों या जातियों या समाजों का उत्थान किया गया? ०९ प्रतिशत मामलों में इन दोनों वर्गों की प्रगति रिपोर्ट भेजने वाले और उनका सत्यापन करने वाले दलित होते हैं। जिन्हें आमतौर पर इस बात से कोई सारोकार नहीं होता कि आदिवासियों के हितों का संरक्षण हो रहा है या नहीं और आदिवासियों के लिये स्वीकृत बजट दलितों के हितों पर क्यों खर्चा जा रहा है या क्यों लैप्स हो रहा है?

आदिवासियों के उत्थान की कथित योजनाओं के क्रियान्वयन के लिये ऐसे लोगों को जिम्मेदारी दी जाती रही है, जो आदिवासियों की पृष्ठभूमि को एवं आदिवासियों की समस्याओं के बारे में तो कुछ नहीं जानते, लेकिन यह अच्छी तरह से जानते हैं कि बिना कुछ किये आदिवासियों के लिये आवण्टित फण्ड को हजम कैसे किया जाता है! ऐसे ब्यूरोके्रट्‌स को दलित नेतृत्व का पूर्ण समर्थन मिलता रहा है। स्वाभाविक है कि उन्हें भी इसमें से हिस्सेदारी मिलती होगी? यहाँ यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि दलित नेतृत्व में सभी लोग आदिवासियों के विरोधी या दुश्मन नहीं हैं, बल्कि आम दलित तो आज भी आदिवासी के प्रति बेहद संवेदनशील है।
यही नहीं यह जानना भी जरूरी है कि एक जाति विशेष के कुछेक चालाक लोगों ने एससी एवं एसटी वर्गों की कथित एकता के नाम पर हर जगह कभी न समाप्त किया जा सकने वाला कब्जा जमा रखा है। ये लोग एससी की अन्य कमजोर (संख्याबल में) जातियों के भी शोषक हैं। आदिवासी भी प्रशासन में संख्यात्मक दृष्टि से दलितों की तुलना मे आधे से भी कम है। जिस देश में हर जाति एक राष्ट्रीय पहचान रखती हो, उस देश में एक वर्ग में बेमेल जातियों को शामिल कर देना और संवैधानिक रूप से दो भिन्न वर्गों (एससी एवं एसटी) को एक ही डण्डे से हाँकना, किस बेवकूफ की नीति है? यह तो सरकार ही बतला सकती है, लेकिन यह सही है कि आदिवासी की पृष्ठभूमि एवं जरूरत को आज तक न तो समझा गया है और न हीं इस दिशा में सार्थक पहल की जा रही है।

दूसरी ओर इस देश के केवल दो प्रतिशत लोग लच्छेदार अंग्रेजी में दिये जाने वाले तर्कों के जरिये इस देश को लूट रहे हैं और 98 प्रतिशत लोगों को मूर्ख बना रहे हैं। मुझे तो यह जानकर आश्चर्य हुआ कि इन दो प्रतिशत लोगों में हत्या जैसे जघन्य अपराध करने वालों की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से कई गुनी है, लेकिन उनमें से किसी बिरले को ही कभी फांसी की सजा सुनाई गयी होगी? इसके पीछे भी कोई न कोई कुटिल समझ तो काम कर ही रही है। अन्यथा ऐसा कैसे सम्भव है कि अन्य 98 प्रतिशत लोगों को छोटे और कम घिनौने मामलों में भी फांसी का हार पहना कर देश के कानून की रक्षा करने का फर्ज बखूबी निभाया जाता रहा है। यदि किसी को विश्वास नहीं हो तो सूचना अधिकार कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट से आंकडे प्राप्त करके स्वयं जाना जा सकता है कि किस-किस जाति के, कितने-कितने लोगों ने एक साथ एक से अधिक लोगों की हत्या की और उनमें से किस-किस जाति के, कितने-कितने लोगों को फांसी की सजा दी गयी और किनको चार-पाँच लोगों की बेरहमी से हत्या के बाद भी केवल उम्रकैद की सजा सुनाई गयी? आदिवासियों को सुनाई गयी सजाओं के आंकडों की संख्या देखकर तो कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सदमाग्रस्त हो सकता है!

यही नहीं आप आँकडे निकाल कर पता कर लें कि किस जाति की महिलाओं के साथ बलात्कार अधिक होते हैं? किस जाति के लोग बलात्कार अधिक करते हैं और किस जाति की महिलाओं के साथ बलात्कार होने पर सजा दी जाती है एवं किस जाति की महिला के साथ बलात्कार होने पर मामला पुलिस के स्तर पर ही रफा-दफा कर दिया जाता है या अदालत में जाकर कोई सांकेतिक सजा के बाद समाप्त हो जाता है?

आप यह भी पता कर सकते हैं कि इस देश के दो प्रतिशत महामानवों के मामलों में प्रत्येक स्तर पर कितनी जल्दी न्याय मिलता है, जबकि शेष 98 प्रतिशत के मामलों में केवल तारीख और तारीख बस! मानव अधिकार आयोग, महिला आयोग आदि के द्वारा सुलटाये गये मामले उठा कर देखें, इनमें कितने लोगों को न्याय या मदद मिलती है? यहाँ पर भी जाति विशेष एवं महामानव होने की पहचान काम करती है। पेट्रोल पम्प एवं गैस ऐजेंसी किनको मिल रही हैं? अफसरों में जिनकी गोपनीय रिपोर्ट गलत या नकारात्मक लिखी जाती है, उनमें किस वर्ग के लोग अधिक हैं तथा नकारात्मक गोपनीय रिपोर्ट लिखने वाले कौन हैं? संघ लोक सेवा आयोग द्वारा कौनसी दैवीय प्रतिभा के चलते केवल दो प्रतिशत लोगों को पचास प्रतिशत से अधिक पदों पर चयनित किया जाता रहा है? जानबूझकर और दुराशयपूर्वक मनमानी एवं भेदभाव करने की यह फेहरिस्त बहुत लम्बी है!

ऐसी असंवेदनशील, असंवैधानिक, विभेदकारी और मनमानी प्रशासनिक व्यवस्था एवं शोषक व्यवस्था में आश्चर्य इस बात का नहीं होना चाहिये कि नक्सनवाद क्यों पनप रहा है, बल्कि आश्चर्य तो इस बात का होना चाहिये कि इतना अधिक क्रूरतापूर्ण दुर्व्यवहार होने पर भी केवल नक्लवाद ही पनप रहा है? लोग अभी भी आसानी से जिन्दा हैं? अभी भी लोग शान्ति की बात करने का साहस जुटा सकते हैं? लोगों को इतना होने पर भी लोकतन्त्र में विश्वास है?

एक झूट की ओर भी पाठकों का ध्यान खींचना जरूरी है, वह यह कि नक्लवादियों के बारे में यह कु-प्रचारित किया जाता रहा है कि नक्सली केवल आदिवासी हैं! जबकि सच्चाई यह है कि हर वर्ग का, हर वह व्यक्ति जिसका शोषण हो रहा है, जिसकी आँखों के सामने उसकी माँ, बहन, बेटी और बहू की इज्जत लूटी जा रही है, नक्सलवादी बन रहा है! कल्पना करके देखें माता-पिता की आँखों के सामने उनकी 13 से 16 वर्ष की उम्र की लडकी का सामूहिक बलात्कार किया जाता है और स्थानीय पुलिस उनकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती! स्थानीय जन-प्रतिनिधि आहत परिवार को संरक्षण देने के बजाय बलात्कारियों को पनाह देते हैं! तहसीलदार से लेकर राष्ट्रपति तक गुहार करने के बाद भी कोई सुनवाई नहीं होती है। ऐसे हालात में ऐसे परिवार के माता-पिता या बलात्कारित बहनों के भाईयों को क्या करना चाहिये? इस सवाल का उत्तर इस देश के संवेदनशील और इंसाफ में आस्था एवं विश्वास रखने वाले पाठकों से अपेक्षित है।

दूसरी तस्वीर, अपराध कोई ओर (बलशाली) करता है और पुलिस द्वारा दोषी से धन लेकर या अन्य किसी दुराशय से किसी निर्दोष को फंसा दिया जाता है। बेकसूर होते हुए भी वह कई वर्षों तक जेल में सडता रहता है। इस दौरान जेल गये व्यक्ति का परिवार खेती, पशु आदि सब बर्बाद हो जाते हैं। उसकी पत्नी और, या युवा बहन या बेटी को अगवा कर लिया जाता है। या उन्हें रखैल बनाकर रख लिया जाता है। अनेक बार तो 15 से 20 वर्ष के युवाओं को ऐसे मामलों में फंसा दिया जाता है और उनकी सारी जवानी जेल में ही समाप्त हो जाती है। जब कोई सबूत नहीं मिलता है तो वर्षों बाद अदालत इन्हें रिहा कर देती है, लेकिन ऐसे लोगों का न तो कोई मान सम्मान होता है और न हीं इनके जीवन का कोई मूल्य होता है। इसलिये अकारण वर्षों जेल में रहने के उपरान्त भी इनको किसी भी प्रकार का मुआवजा मिलना तो दूर, ये लोग जानते ही नहीं कि मुआवजा है किस चिडिया का नाम!

हम सभी जानते हैं कि सरकार को गलत ठहराकर, सरकार से मुआवजा प्राप्त करना लगभग असम्भव होता है। इसीलिये सरकार से मुआवजा प्राप्त करने के लिये अदालत की शरण लेनी पडती है, जिसके लिये वकील नियुक्त करने के लिये जरूरी दौलत इनके पास होती नहीं और इस देश की कानून एवं न्याय व्यवस्था बिना किसी वकील के ऐसे निर्दोष को, निर्दोष करार देकर भी सुनना जरूरी नहीं समझती है। इसके विपरीत अनेक ऐसे मामले भी इस देश में हुए हैं, जिनमें अदालत स्वयं संज्ञान लेकर मुआवजा प्रदान करने के आदेश प्रदान करती रही हैं, लेकिन किसी अपवाद को छोडकर ऐसे आदेश केवल उक्त उल्लिखित दो प्रतिशत लोगों के पक्ष में ही जारी किये जाते हैं।

मुझे याद आता है कि एक जनहित के मामले में एक सामाजिक कार्यकर्ता ने अपने राज्य के उच्च न्यायालय को अनेक पत्र लिखे, लेकिन उन पर कोई संज्ञान नहीं लिया गया, जबकि कुछ ही दिन बाद उन पत्रों में लिखा मामला एक दैनिक में प्रकाशित हुआ और उच्च न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेकर उसे जनहित याचिका मानकर हाई कोर्ट के तीन वकीलों का पैनल उसकी पैरवी करने के लिये नियुक्त कर दिया। अगले दिन दैनिक में हाई कोर्ट के बारे में बडे-बडे अक्षरों में समाचार प्रकाशित हुआ और हाई कोर्ट द्वारा संज्ञान लिये जाने के पक्ष में अखबार द्वारा सदीके पढे गये। इन हालातों में अन्याय, भेदभाव और क्रूरतापूर्ण दुर्व्यवहार के चलते पनपने वाले नहीं, बल्कि जानबूझकर पनपाये जाने वाले नक्सलवाद को, जो लोग इस देश की सबसे बडी समस्या बतला रहे हैं, असल में वे स्वयं ही इस देश की सबसे बडी समस्या हैं!

जैसा कि वर्तमान में सरकार द्वारा नक्सलियों के विरुद्ध संहारक अभियान चलाया जा रहा है, उस अभियान के मार्फत नक्लवादियों को मारकर इस समस्या से कभी भी स्थायी रूप से नहीं निपटा जा सकता, क्योंकि बीमार को मार देने से बीमारी को समाप्त नहीं किया जा सकता। यदि बीमारी के कारणों को ईमानदारी से पहचान कर, उनका ईमानदारी से उपचार करें तो नक्सलवाद क्या, किसी भी समस्या का समाधान सम्भव है, लेकिन अंग्रेजों द्वारा कुटिल उद्देश्यों की पूर्ति के लिये स्थापित आईएएस एवं आईपीएस व्यवस्था के भरोसे देश को चलाने वालों से यह आशा नहीं की जा सकती कि नक्सलवाद या किसी भी समस्या का समाधान सम्भव है! कम से कम डॉ. मनमोहन सिंह जैसे पूर्व अफसरशाह के प्रधानमन्त्री रहते तो बिल्कुल भी आशा नहीं की जा सकती।-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

Monday, March 15, 2010

प्रधान न्यायाधीश का बयान अस्वीकार्य : डॉ. मीणा



जयपुर। भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ने एक बयान जारी करके कहा है कि देश की सबसे बडी अदालत के प्रधान न्यायाधीश का बलात्कारी से विवाह करने की अनुमति दिये जाने सम्बन्धी बयान निन्दनीय तो है ही साथ ही साथ प्रधान न्यायाधीश की गरिमा के अनुरूप भी नहीं है।



डॉ. मीणा का कहना है कि देश के प्रधान न्यायाधीश जैसे गरिमामयी और संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से ऐसे अमानवीय और अव्यावहारिक बयानों की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यदि इस प्रकार से बलात्कारी से विवाह करने को परोक्ष रूप से बढावा दिया गया तो आगे चलकर सम्पूर्ण समाज को इसके अनेक प्रकार के अकल्पनीय, गम्भीर और घातक परिणामों का सामना करना पडेगा।

बास के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम मीणा का कहना है कि यदि एक क्षण को हम प्रधान न्यायाधीश के सुझाव को मान लेते हैं तो ऐसे रुग्ण लोग जो किसी लडकी से विवाह करने में सफल नहीं हो पाते हैं, वे पहले तो उससे बलात्कार करेंगे और बाद में पीडित लडकी को विवश करके विवाह करने को राजी कर लिया जायेगा। इससे जहाँ एक ओर तो महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में वृद्धि होगी, वहीं दूसरी ओर इससे बलात्कार जैसे गम्भीर अपराध की सजा से अपराधी बच निकलेगा।

डॉ. मीणा का कहना है कि अब समय आ गया है, जबकि संवैधानिक एवं जिम्मेदार पदों पर बैठे लोगों द्वारा स्त्री के प्रति अधिक संवेदनशीलता का परिचय दिया जाये और उसे भी इंसान समझा जाये। जब किसी बलात्कारी से विवाह करने की बात कहीं जाती है तो किसी भी पीडिता स्त्री के लिये इससे बडी अपमानजनक कोई बात नहीं हो सकती।

डॉ. मीणा कहते हैं कि इस प्रकार के बयान देने वाला चाहे देश का प्रधान न्यायाधीश हो या अन्य कोई भी हो, हर एक इंसाफ पसन्द व्यक्ति द्वारा उसकी आलोचना और भर्त्सना की ही जानी चाहिये। डॉ. मीणा ने कहा है कि इस प्रकार के अमानवीय और असंवेदनशील बयान की कुछ महिला संगठनों के अलावा अन्य किसी के द्वारा आलोचना नहीं किया जाना भी बेहद चिन्ता का विषय है।

बास के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम मीणा का कहना है कि जब भी स्त्री के सवाल पर निर्णय लेना हो पुरुष को केवल पति या प्रेमी बनकर ही नहीं, बल्कि पिता और भाई बनकर भी सोचने की आदत डालनी चाहिये। तब ही पुरुष, स्त्री से जुडे मामलों में पूर्ण न्याय कर सकेगा।
-प्रेस विज्ञप्ति जारी करंता : पंकज सत्तावत, सहायक कार्यालय सचिव, राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय, भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास), जयपुर।