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Monday, August 13, 2012

भ्रष्टाचार की शुरुआत कहाँ से...?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

आजादी के बाद से अनेक मोर्चों पर मनमानी और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ छोटे-बड़े अनेक आन्दोलन देश में होते रहे हैं। जिनमें से अधिकतर का इतिहास है कि वे भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाने के बाद समाप्त होते रहे हैं। पिछले एक वर्ष के दौरान समाज के एक वर्ग और कार्पोरेट घरानों के इशारों पर कदमताल करते

Friday, August 3, 2012

अन्ना के समर्थकों के समक्ष निराशा का आसन्न संकट?

आखिरकार अन्ना ने सत्ता के बजाय व्यवस्था को बदलने के लिये कार्य करने की सोच को स्वीकार कर ही लिया है। जिसकी लम्बे समय से मॉंग की जाती रही है। जहॉं तक अन्ना की प्रस्तावित राजनैतिक विचारधारा का सवाल है तो सबसे पहली बात तो ये कि यह सवाल उठाने का देश के प्रत्येक व्यक्ति को हक है!

Wednesday, March 14, 2012

विधानसभा चुनाव परिणामों के संकेत-अन्ना और बाबा ने भ्रष्टाचार की लड़ाई को कई वर्ष पीछे धकेल दिया है।

पॉंच राज्यों के चुनाव परिणामों से जो सन्देश निकलकर सामने आया है, उसके ये संकेत तो स्पष्ट रूप से प्रकट हो ही चुके हैं कि मतदाता ने केवल कॉंग्रेस, भाजपा और बसपा को ही धूल नहीं चटायी है, बल्कि इसके साथ-साथ अन्ना हजारे और रामदेव को भी मटियामेट कर दिया है। जो इस देश के भ्रष्टाचार से त्रस्त आम लोगों के लिये दु:खद बात है। क्योंकि पूरे देश में सेवारत हजारों सच्चे सामाजिक कार्यकर्ताओं के दशकों के सतत और कड़े प्रयासों से भ्रष्टाचार जो वास्तव में देशभर में मुद्दा बन चुका था, उस मुद्दे का अन्ना और बाबा ने सत्यानाश कर दिया है। इन्होंने भ्रष्टाचार की लड़ाई को कई वर्ष पीछे धकेल दिया है।

Friday, December 30, 2011

लोकपाल-हमाम में सभी नंगे!


डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

लोकपाल विधेयक के बहाने कॉंग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी गठबन्धन यूपीए और भाजपा के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबन्धन एनडीए सहित सभी छोटे-बड़े विपक्षी दलों एवं ईमानदारी का ठेका लिये हुंकार भरने वाले स्वयं अन्ना और उनकी टीम के मुखौटे उतर गये! जनता के समक्ष कड़वा सत्य प्रकट हो गया!

Tuesday, November 15, 2011

क्या भारत का मतदाता भहरूपियों को नयी दिल्ली की गद्दी सौंपने को तैयार है?

इस समय देश की दिशा और दशा दोनों ही डगमगाने लगी हैं| सम्पूर्ण भारत में मंहगाई सुरसा की भांति विकराल रूप धारण करती जा रही है| जिसके प्रति केन्द्र सरकार तनिक भी चिन्तित नहीं दिखती है| परिणामस्वरूप जहॉं एक ओर गरीब मर रहा है| उसके लिये जीवनयापन भी मुश्किल हो गया है| किसान आत्महत्या कर रहे हैं| जबकि इसके विपरीत सम्पन्न और शासक वर्ग दिनोंदिन धनवान होकर विलासतपूर्ण जीवन जीने और उसका प्रदर्शन करने से भी नहीं चूक रहा है|


इन हालातों में जहॉं एक ओर युवा वर्ग निराशा और अवसाद से ग्रस्त होकर सृजन के बजाय विसृजन तथा आपराधिक कार्यों की ओर प्रवृत्त हो रहा है| जिसके चलते सड़क पर चलती औरतों के जैवर लूटे जा रहे हैं, चोरी-डकैतियॉं और एटीम मसीनों को चुराने तक की घटनाओं में भारत का भविष्य अर्थात् युवावर्ग लिप्त हो रहा है|

प्रतिपक्ष जिसका कार्य, सत्ताधारी दल की राजनैतिक असफलताओं, कमजोरियों और मनमानी नीतियों को उजागर करके देश और समाज के सामने लाना है, वह निचले दबके और अल्पसंख्यकों के प्रति पाले हुए स्थायी दुराग्रहों और धर्मान्धता की बीमारी से मुक्त नहीं हो पा रहा है| स्वयं प्रतिपक्षी पार्टी के लोग जो कभी ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की बात किया करते थे, खुद भी उसी प्रकार से सत्ताधारियों की भांति भ्रष्ट हैं और गिरगिट की भांति रंग बदल रहे हैं| जिस प्रकार से कांशीराम के अवसान के बाद मायावती ने ‘तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार’ के नारे को भूलकर ब्राह्मणों के साथ दिखावटी दोस्ती करके सत्ता पर काबिज हो चुकी हैं| यही नहीं माया ने अन्य सभी राजनैतिक दलों को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को भी मजबूर कर दिया है|

सत्ताधारियों और सत्ता से बेदखल लोगों का चरित्र कहॉं है, आम लोग समझ ही नहीं पाते हैं| जो पार्टी सिर्फ सोनिया तथा मनमोहन की पूँजीवादी नीतियों के इर्दगिर्द घूमती रही है, उस पार्टी को मिश्रित अर्थव्यवस्था के जन्मदाता जवाहर लाल नेहरू को अचानक अपने बैनरों पर छाप देना और इन्दिरा, लाल बहादुर, राजीव और नरसिम्हाराव को एक ओर कर देना अपने आप में अनेक भ्रम और भ्रान्तियों का शिकार होने का द्योतक है| इसका मतलब ये समझा जाये कि अब मनमोहन सिंह के दिन लद गये हैं? जबकि स्वयं यूपीए का कहना है कि दुनिया के तमाम देश आर्थिक संकट से त्रस्त हैं, लेकिन भारत में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होने के कारण ही भारत की अर्थव्यवस्था बच सकी है?

भारत की सबसे बड़ी दूसरी पार्टी भाजपा का रिमोट कंट्रोल संघ भी अब अपने आपको इस कदर नीचे गिरा चुका है कि जबरन अन्ना के पीछे लग रहा है, जबकि अन्ना मानने को ही तैयार ही नहीं है| यह बात अलग है कि अब तो सारा देश जान चुका है कि अन्ना भाजपा और संघ का ही संयुक्त उत्पाद है| इसके बावजूद अन्ना अभी भी संघ और भाजपा से दूरी बनाये रखने में क्या कोई ऐसी राजनीति खेल रहे हैं, जिसके परिणाम यूपीए को उसकी बेवकूफियों और हठधर्मिता का दुष्परिणाम भोगने को विवश कर देंगे?

अब तो कॉंग्रेस से दशकों से जुड़े कट्टर कॉंग्रेसी भी यह मानने लगा है कि कॉंग्रेस दिशाभ्रम की शिकार होने के साथ-साथ भाजपा-संघ-हिन्दुत्वादी ताकतों के चक्रव्यूह में इतनी बुरी तरह से फंसती जा रही है कि २०१४ के चुनाव में कॉंग्रेस की नैया पार लगना आसान नहीं होगा| वहीं दूसरी ओर कॉंग्रेस की राजनीतिक सूझबूझ के जानकारों का कहना है कि २०१४ आने तक तो देश का परिदृश्य ही बदल चुका होगा| उनका कहना है कि नीतीश कुमार भाजपा से पीछा छुड़ा चुके होंगे और आडवाणी, मोदी, स्वराज, जेटली, राजनाथ सिंह और गडकरी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाओं से टकराकर भाजपा बिखरने के कगार पर पहुँच चुकी होगी| जबकि कुछ दूसरे जनाकारों का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो भाजपा के नेतृत्व की कमान पण्डित मुरली मनोहर जोशी को मिल सकती है, जो लम्बे समय से इन्तजार में हैं|

इन हालातों में भारत की दिशा और दशा दोनों ही पटरी से उतरी हुई लगती हैं, जिसके चलते न मात्र देश का शासकीय भविष्य भ्रष्ट ब्यूराक्रेट्स की मनमानी नीतियों का शिकार है, बल्कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे लोग भी नीति और अनीति को भूलकर इसी स्थिति का लाभ उठाकर तथा एकजुट होकर अपनी पूरी ताकत झोंक देने का रिस्क ले चुके हैं और हर हाल में इस देश में मुस्लिम, दमित, दलित, पिछड़ा, आदिवासी और महिला उत्थान के विराधी होने और साथ ही साथ हिन्दुत्वादी राष्ट्र की स्थापना करने की बातें करने का समय-समय पर नाटक करने वाले लोगों को भारत की सत्ता में दिलाने के हर संभव प्रयास कर रहे हैं| 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या भारत का धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक न्याय को समर्पित और सौहार्दपूर्ण संस्कारों में आस्था तथा विश्‍वास रखने वाला आम मतदाता, मंहगाई और भ्रष्टाचार से तंग होकर ऐसे भहरूपियों को नयी दिल्ली की गद्दी सौंपने को तैयार है? लगता तो नहीं, लेकिन यूपीए सरकार की वर्तमान आम आदमी विरोधी नीतियों से निजात पाने के लिये मतदाता गुस्से में कुछ भी गलती कर सकता है!

Friday, August 12, 2011

फिर से अन्ना का अनशन : कौन साथ? कौन खिलाफ?


फिर से अन्ना का अनशन : कौन साथ? कौन खिलाफ?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

अन्ना जी ने फिर से हुंकार भरी है-भ्रष्टाचार के खिलाफ देश को एकजुट करके सरकार से दो-दो हाथ करने के लिये वे राजधानी नयी दिल्ली में आ गये हैं और अन्तिम सांस तक लड़ने का ऐलान कर चुके हैं| ये बात तो भविष्य के गर्भ में छिपी है कि अन्ना को कितनी सफलता मिलेगी, लेकिन एक बात तय है कि इस समय देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक सामूहिक जनान्दोलन जरूर खड़ा हो गया है| यद्यपि कुछ लोगों ने निहित स्वार्थवश भ्रष्टाचार के विरुद्ध शुरू किये गये इस आन्दोलन को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है| फिर भी अन्ना को अभी भी देशभर से समर्थन मिल रहा है| जिससे लोगों की अन्ना के प्रति निष्ठा प्रमाणित होती है|

हालांकि यहॉं पर यह बात भी विचारणीय है कि वर्तमान में जो हालत दिख रहे हैं, ये कोई एक दो साल या एक दो दशक का मामला नहीं है! ये आदिकाल से चला आ रहा भ्रष्टाचार का विकराल रूप है, जो पहले कुछ लोगों तक ही सीमित था, लेकिन अब लोकतंत्र की गंगा में हर कोई हाथ धोना चाहता है, जहॉं एक ओर कांग्रेस नीत यूपीए की केंद्र सरकार पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगते और प्रमाणित होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्त सरकार देने का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी का कर्नाटक में येदियुरप्पा ने मु:ह कर दिया है!

उधर मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चौहान अपने पत्रकार साले संजय सिंह को प्रथम श्रेणी का ठेकेदार बनवाकर, उसके मार्फ़त करोड़ों के ठेके चला रहे हैं| मुख्यमन्त्री के साले संजय सिंह पर राज्य का सारा प्रशासन मेहरबान है! हर अफसर संजय सिंह को खुश करके मुख्यमन्त्री का चहेता बनना चाहता है| राज्य में जमीनों की खरीद-फरोख्त में खुलकर इतना भ्रष्टाचार हो रहा है कि लोग यहॉं तक कहने लगे हैं कि चौहान मध्य प्रदेश को बेच रहे हैं| चौहान की सरकार को अब तक की सबसे भ्रष्ट सरकार बताया जा रहा है|

दिल्ली की मुख्यमन्त्री शीला दीक्षित भी कटघरे में खड़ी हैं| जिन्हें कुर्सी से अपदस्थ करने के लिये विपक्षी भाजपा पूरे प्रयास कर रही है| राजस्थान के मुख्यमन्त्री के बेटे एवं बेटी को कुछ कम्पनियों की ओर से खुश करने के समाचार सुर्खियों में बने रहते हैं| गुजरात की कथित विकासवादी सरकार और नवोदित क्लीनमैन नीतीश कुमार की सरकार भी भ्रष्टाचार के मामले में किसी से पीछे नहीं हैं| झारखण्ड के हालात सबको पता हैं| उड़ीसा में बीजू सरकार के खिलाफ बोलने की किसी में हिम्मत नहीं है| तमिलनाडू तो भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा गढ बन गया लगता है? उत्तर प्रदेश और उत्तरा खण्ड में जो कुछ हो रहा है, उससे बच्चा-बच्चा वाकिफ है|

जिधर देखो उधर ही घोटाले ही घोटाले हैं| ऐसा लगता है माने सबके सब वास्तव में ही नंगे हैं!

-कोई सैनिकों के कफ़न चोर हैं तो कोई कोई सैनिकों के भवन (मुंबई की आदर्श सोसायटी) चोर हैं!
-कोई धर्म निरपेक्षता के नाम पर ठग रहा है तो कोई धर्मोन्माद के नाम पर बर्बाद कर रहा है!
-कोई कमजोर वर्गों को लुटने का डर दिखा रहा है तो कोई दूसरा उन्हें लूटकर डरा रहा है|
-कोई आरक्षण देकर लूट रहा है तो कोई आरक्षण छीन लेने का भय दिखाकर लूट रहा है|
-कहीं आर्थिक भ्रष्टाचार है, कहीं सामाजिक भ्रष्टाचार है तो कहीं धार्मिक भ्रष्टाचार|

इसलिए कोई भी राजनैतिक दल खुलकर अन्ना के जन लोकपाल बिल के समर्थन के लिए आगे नहीं आने वाला| प्रतिपक्षी भाजपा भी नहीं, क्योंकि 

(1) अन्ना राजनैतिक दलों और अफसरशाही की ऑक्सीजन भ्रष्टाचार को मिटाने की बात कर रहे हैं! जिसे कोई भी दल मिटाना नहीं चाहता|
(2) अन्ना सरकार नहीं व्यवस्था बदलने की बात कर रहे हैं, जिसमें भाजपा को क्यों रुची होने लगी?

जबकि इसके विपरीत बाबा रामदेव सरकार बदलने  के लिए उस काले धन की बात कर रहे हैं, जिसे कभी लाया जा सकेगा! इस बात का आम लोगों को तनिक भी विश्‍वास नहीं है| इसके उपरान्त भी बाबा को भाजपा का खुला समर्थन है, क्योंकि-

(1) सरकार बदलने पर बाबा रामदेव हिंदुत्व के नाम पर भाजपा को समर्थन देने को पहले से ही सहमत हैं!
(2) काला धन वापस देश में लाने के लिए वैसे ही प्रयास करने का नाटक करते रहने में किसको आपत्ती है, जैसे बोफोर्स मामले में वी पी सिंह, चन्द्र शेखर,  देवेगौडा, गुजराल और अटल सरकार ने किये थे!
(यहॉं इन प्रयासों में कांग्रेस की सरकार को भी शामिल किया जा सकता है, लेकिन उस पर तो इस मामले को दबाने का आरोप उन लोगों ने लगाया, जिनकी सरकार एक दशक से अधिक समय तक सत्ता में रही| फिर भी किसी ने कुछ नहीं किया या मामले में कुछ था ही नहीं केवल वोट बटोरने के लिए जनता को सबने मिलकर बेवकूफ बनाया!)

अन्य दलों के हालत भी कमोबेस ऐसे ही हैं| सबके सब एक थैली के चट्टे बट्टे हैं, जो अपना वेतन बढ़ाते समय तो एकमत हो जाते हैं और पांच साल तक जनता को गुमराह करने के लिए संसद में झगड़ते रहते रहने का नाटक करते रहते हैं!

इसलिए राजनैतिक दलों से किसी प्रकार की ईमानदारी की आशा करना बेमानी है! हालात जो बतला रहे हैं, उसके मुताबिक कांग्रेस तो हर कीमत पर अन्ना आन्दोलन को दबाकर अपना कार्यकाल पूर्ण करना चाहती है, जो हर राजनैतिक दल की इच्छा होती है , जबकि भाजपा सत्ता में आना चाहती है, जो हर विपक्षी पार्टी की इच्छा होती है! इसके अलावा कोई भी दल नहीं चाहता कि इस देश के लोगों को भ्रष्टाचार, गैर बराबरी, शोषण और भेदभाव से निजात दिलायी जावे| अन्ना की टीम भी एनजीओ, कार्पोरेट घरानों और मीडिया के भ्रष्टाचार को लेकर एकदम चुप है, क्योंकि अन्ना टीम के लिए इन सबकी सख्त जरूरत है!

इन हालातों में भी अन्ना जन लोकपाल को लागू करवाने के लिये कमर कस चुके हैं, लोगों में जोश है| अन्ना के साथ देश के हर कौने में से समर्थन मिलने की सम्भावना है| जिसे कॉंग्रेस के अलावा भी कुछ ताकतें, असफल करने में जुटी हुई हैं| ये ताकतें नहीं चाहती कि अन्ना को इस बात का श्रेय मिले और अन्ना केवल व्यवस्था बदलने की बात करते रहें तथा सरकार बनी रहे| ऐसी ताकतें सत्ता के लिये अपने कथित सिद्धान्तों की बली देने के लिये योजनाएँ बना रही हैं| अन्यथा क्या कारण है कि अन्ना के साथ वे शक्तियॉं न मात्र सड़क पर, बल्कि प्रिण्ट, इलेक्ट्रोनिक और वेब मीडिया पर भी दूरी बनाकर चल रही हैं| यह अत्यधिक निन्दनीय और शर्मनाक है|

Friday, April 29, 2011

भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी क्यों?


भ्रष्टाचार की जड़ें इतनी गहरी क्यों?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता कि इन दिनों भारत में हर क्षेत्र में, भ्रष्टाचार चरम पर है| भ्रष्टाचार के ये हालात एक दिन या कुछ वर्षों में पैदा नहीं हुए हैं| इन विकट हालातों के लिये हजारों वर्षों की कुसंस्कृति और सत्ताधारियों को गुरुमन्त्र देने के नाम पर सिखायी जाने वाली भेदभावमूलक धर्मनीति तथा राजनीति ही असल कारण है| जिसके कारण कालान्तर में गलत एवं पथभ्रष्ट लोगों को सम्मान देने नीति का पनपना और ऐसे लोगों के विरुद्ध आवाज नहीं उठाने की हमारी वैचारिकता भी जिम्मेदार है|

आजादी के बाद पहली बार हमें अपना संविधान तो मिला, लेकिन संविधान का संचालन उसी पुरानी और सड़ीगली व्यवस्था के पोषक लोगों के ही हाथ में रहा| हमने अच्छे-अच्छे नियम-कानून और व्यवस्थाएँ बनाने पर तो जोर दिया, लेकिन इनको लागू करने वाले सच्चे, समर्पित और निष्ठावान लोगों के निर्माण को बिलकुल भुला दिया|

दुष्परिणाम यह हुआ कि सरकार, प्रशासन और व्यवस्था का संचालन करने वाले लोगों के दिलोदिमांग में वे सब बातें यथावत स्थापित रही, जो समाज को जाति, वर्ण, धर्म और अन्य अनेक हिस्सों में हजारों सालों से बांटती रही| इन्हीं कटुताओं को लेकर रुग्ण मानसिकता के पूर्वाग्रही लोगों द्वारा अपने चहेतों को शासक और प्रशासक बनाया जाने लगा| जो स्वनिर्मित नीति अपने मातहतों तथा देश के लोगों पर थोपते रहे|

एक ओर तो प्रशासन पर इस प्रकार के लोगों का कब्जा होता चला गया और दूसरी ओर राजनीतिक लोगों में आजादी के आन्दोलन के समय के समय के जज्बात् और भावनाएँ समाप्त होती गयी| जिन लोगों ने अंग्रेजों की मुखबिरी की वे, उनके साथी और उनके अनुयाई संसद और सत्ता तक पहुँच स्थापित करने में सक्षम हो गये| जिनका भारत, भारतीयता और मूल भारतीय लोगों के उत्थान से कोई वास्ता नहीं रहा, ऐसे लोगों ने प्रशासन में सुधार लाने के बजाय खुद को ही भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबे अफसरों के साथ मिला लिया और विनिवेश के नाम पर देश को बेचना शुरू कर दिया|

सत्ताधारी पार्टी के मुखिया को कैमरे में कैद करके रिश्‍वत लेते टीवी स्क्रीन पर पूरे देश ने देखा, लेकिन सत्ताधारी लोगों ने उसके खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय, उसका बचाव किया| राष्ट्रवाद, संस्कृति और धर्म की बात करने वालों ने तो अपना राजधर्म नहीं निभाया, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद यूपीए प्रथम और द्वितीय सरकार ने भी उस मामले को नये सिरे से देखना तक जरूरी नहीं समझा|

ऐसे सत्ताधारी लोगों के कुकर्मों के कारण भारत में भ्रष्टाचार रूपी नाग लगातार फन फैलाता जा रहा है और कोई कुछ भी करने की स्थिति में नहीं दिख रहा है| सत्ताधारी राजनैतिक गठबन्धन से लेकर, सत्ता से बाहर बैठे, हर छोटे-बड़े राजनैतिक दल में भ्रष्टाचारियों, अत्याचारियों और राष्ट्रद्रोहियों का बोलबाला लगातार बढता ही जा रहा है| ऐसे में नौकरशाही का ताकतवर होना स्वभाविक है| भ्रष्ट नौकरशाही लगातार मनमानी करने लगी है और वह अपने कुकर्मों में सत्ताधारियों को इस प्रकार से शामिल करने में माहिर हो गयी है कि जनप्रतिनिधि चाहकर भी कुछ नहीं कर सकें|

ऐसे समय में देश में अन्ना हजारे जी ने गॉंधीवाद के नाम पर भ्रष्टाचार के खिलाफ अनशन करके सत्ता को झुकाने का साहस किया, लेकिन स्वयं हजारे जी की मण्डली में शामिल लोगों के दामन पर इतने दाग नजर आ रहे हैं कि अन्ना हजारे को अपने जीवनभर के प्रयासों को बचाना मुश्किल होता दिख रहा है|

ऐसे हालात में भी देश में सूचना का अधिकार कानून लागू किया जाना और सत्ताधारी गठबन्धन द्वारा भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी पाये जाने पर अपनी ही सरकार के मन्त्रियों तथा बड़े-बड़े नेताओं तथा नौकरशाहों के विरुद्ध कठोर रुख अपनाना आम लोगों को राहत प्रदान करता है|

अन्यथा प्रपिपक्ष तो भ्रष्टाचार और धर्म-विशेष के लोगों का कत्लेआम करवाने के आरोपी अपने मुख्यमन्त्रियों को उनके पदों से त्यागपत्र तक नहीं दिला सका और फिर भी भ्रष्टाचार के खिलाफ गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने का नाटक करता रहता है!