मेरे शुभचिंतक और समालोचक जिनके विश्वास एवं संबल पर मैं यहाँ लिख पा रहा हूँ!

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Thursday, April 9, 2015

अलवर राजस्थान के किसानों को रोड पर लाने की शुरूआत!

अलवर राजस्थान के किसानों को रोड पर लाने की शुरूआत!
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राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अलवर में जापानी कम्पनी को 500 एकड़ जमीन देंगी।
क्यों? क्योंकि इस जमीन में जापानी इन्वेस्टमेंट जोन स्थापित होगा! इसमें सैरेमिक्स, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम और मैन्यूफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों पर फॉक्स होगा।
लेकिन सरकार को यह भी बतलाना चाहिए कि-
क्या उक्त निर्णय/घोषणा से पूर्व इस तथ्य का आकलन किया गया है-कि इस कारण कितने किसान हमेशा को बेरोजगार होंगे?
यदि नहीं तो क्यों नहीं किया गया?
जिन किसानों की बेसकीमती उपजाऊ जमीन जापानी कम्पनी/कार्पोरेट को दी जाएगी उनके स्थाई पुनर्वास की क्या कोई जमीनी योजना है या नहीं?
इस बारे में राजस्थान सरकार को खुलासा करना होगा। स्थानीय किसान नेता होने का दावा करने वाले वर्तमान, निवर्तमान और पूर्व जनप्रतिनिधियों को इस बारे में सजग होकर सामने आना होगा।
अन्यथा केंद्र सरकार के भूमि अधिग्रहण कानून (काले कानून) की आड़ में अगले चार सालों में न जाने कितने किसानों को आत्महत्या करने को मजबूर किया जाएगा?
जो भी पाठक सरकार की इस मनमानी को शोषण, अन्याय और अत्याचार मानते हैं, अपने विचार जरूर लिखें।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख-हक़ रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन

Thursday, March 13, 2014

मुआवजे के बदले अपमान क्यों? जबकि है-अपमानकारी मुआवजे का स्थायी समाधान!

बलात्कारित स्त्री और मृतक की विधवा, बेटी या अन्य परिजनों को लोक सेवकों के आगे एक बार नहीं बार-बार न मात्र उपस्थित होना होता है, बल्कि गिड़गिड़ाना पड़ता है और इस दौरान कनिष्ठ लिपिक से लेकर विभागाध्यक्ष तक सबकी ओर से मुआवजा प्राप्त करने के लिये चक्कर काटने वालों से गैर-जरूरी तथा मनमाने सवाल पूछे जाते हैं। ऐसी-ऐसी बातें पूछी और कही जाती हैं, जिनका न तो मुआवजे से कोई ताल्लुकात होता है और न ही पूछने वालों को इस प्रकार के सवाल पूछने या जानकारी प्राप्त करने का कोई वैधानिक अधिकार होता है।........... जनता के इन नौकरों द्वारा बलात्कार की शिकार महिलाओं और मृतक की विधवा या बेटियों के संग कुकृत्य तक किये जाते हैं।
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

किसी भी स्त्री का बलात्कार और किसी भी परिवार के सदस्य की किसी हादसे में असामयिक मौत के बाद आमतौर पर सरकारों की ओर से मुआवजा देने की घोषणाएं की जाती हैं या निर्धारित नीति के अनुसार प्रशासन की ओर से मुआवजा दिये जाने के प्रावधान होते हैं। दोनों ही स्थितियों में मुआवजा प्राप्त करने के लिये दुष्कृत्य की शिकार स्त्री और मृतक के परिजनों को मुआवजा प्राप्त करने के लिये आवेदन करना विधिक अनिवार्यता है। यहॉं तक तो सब ठीक माना जा सकता है, लेकिन आवेदन करने मात्र से मुआवजा नहीं मिलता है। मुआवजे के लिये बलात्कारित स्त्री और मृतक की विधवा, बेटी या अन्य परिजनों को लोक सेवकों के आगे एक बार नहीं बार-बार न मात्र उपस्थित होना होता है, बल्कि गिड़गिड़ाना पड़ता है और इस दौरान कनिष्ठ लिपिक से लेकर विभागाध्यक्ष तक सबकी ओर से मुआवजा प्राप्त करने के लिये चक्कर काटने वालों से गैर-जरूरी तथा मनमाने सवाल पूछे जाते हैं। ऐसी-ऐसी बातें पूछी और कही जाती हैं, जिनका न तो मुआवजे से कोई ताल्लुकात होता है और न ही पूछने वालों को इस प्रकार के सवाल पूछने या जानकारी प्राप्त करने का कोई वैधानिक अधिकार होता है। लेकिन तकदीर और ईश्‍वर के दण्ड से दंशित और हालातों के आगे विवश ऐसे लोगों को सरकारी कार्यालयों में जनता की सेवा के नाम पर नियुक्त जनता के नौकरी की हर जायज-नाजायज बात सुननी और अनेक बार माननी भी पड़ती है। जिसके तहत जहॉं रिश्‍वत की मांग करना और रिश्‍वत प्राप्त करना तो आम बात है, लेकिन जनता के इन नौकरों द्वारा बलात्कार की शिकार महिलाओं और मृतक की विधवा या बेटियों के संग कुकृत्य तक किये जाते हैं। इस प्रकार की घटनाएँ केन्द्र और राज्य सरकारों के तकरीबन सभी विभागों में आमतौर पर आये दिन घटित होती रहती हैं। जिससे हर कोई वाकिफ है, लेकिन जिस प्रकार से दलित-आदिवासियों पर सरेआम होने वाले अत्याचारों कोे देखकर हजारों सालों से लोग मौन रहते आये हैं, उसी प्रकार से आदिकाल से महादलित बना दी गयी स्त्री या हालातों से मजबूर विवश इंसान की दुर्दशा को देखकर भी ऐसे मामलों में लोग मौन साध लेते हैं।

जमीन और जनता से जुड़ा हर जन प्रतिनिधि इन सब हालातों और क्रूरताओं से बखूबी वाकिफ होता है, यदि वो चाहे तो मन्त्री बनते ही ऐसे मामलों को चुटकी बजाते ही ठीक कर सकता है, लेकिन मन्त्री की कुर्सी पर बैठते ही वह स्वयं को राजा समझने लगता है। जिसके चलते उसे जनता के दु:ख-दर्द की आह सुनाई देना बन्द हो जाती है। अन्यथा क्या कोई भी सरकार केवल 5 कानून पारित करके, इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं कर सकती?
  • 1. पीड़ित, पीड़ित के परिजनों या अन्य किसी की भी ओर से, किसी भी प्रारूप में-जैसे-फोन, मोबाइल या पत्र के जरिये दी गयी सूचना को मुआवजा प्रदान करने की पत्रावलि शुरू करने के लिये कानूनी रूप से पर्याप्त दस्तावेज और आधार माना जाने का कानून हो।
  • 2. उक्त बिन्दु 1 के अनुसार सूचना प्राप्ति के एक सप्ताह के अन्दर कोई सकारात्मक तथा संवेदनशील तरीके से कार्य करने में निपुण और प्रशिक्षित लोक सेवक पीड़ित/आहत परिवार को अग्रिम सूचना देकर, पीड़ित/आहत परिवार की सुविधानुसार उनके घर या बताये किसी भी सुगम स्थान पर उपस्थित होकर स्वयं सरकारी खर्चे पर सारी औपचारिकताएँ पूर्ण करवाने के लिये कानूनी रूप से बाध्य हो।
  • 3. उक्त बिन्दु 2 के अनुसार औपचारिकताएँ पूर्ण करवाने के बाद हर हाल में आवेदन करने की तारीख से एक माह के अन्दर-अन्दर मुआवजे की राशि का चैक पीड़िता या कानूनी रूप से पात्र व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम सम्बन्धित तहसीलदार या उपखण्ड अधिकारी या समकक्ष अन्य प्राधिकारी द्वारा उनके निवास पर स्वयं उपस्थित होकर व्यक्तिगत रूप से प्रदान किये जाने का कानूनी प्रावधान हो।
  • 4. उपरोक्त बिन्दु 2 एवं 3 की पालना करने के लिये नामित/घोषित अधिकारियों/प्राधिकारियों के नाम और पदनाम सार्वजनिक रूप से परिपत्रित/प्रचारित किये जावें। ऐसे प्राधिकारियों की ओर से हर एक मामले की दैनिक प्रगति/कार्यवाही प्रतिदिन अपनी वैबसाइट पर डालना अनिवार्य हो और विलम्ब करने पर नामित/घोषित अधिकारी का कम से कम छ: माह का मूल वेतन काटने का कानूनी प्रावधान हो।
  • 5. ऐसे हर एक मामले की पहली और अन्तिम अपील सम्बन्धित जिला जज के समक्ष ही पेश किये जाने का प्रावधान हो, जिसका निर्णय जिला जज द्वारा हर हाल में एक माह के अन्दर-अन्दर किये जाने का कानूनी प्रावधान हो। अन्यथा जिला जज की एक वेतन वृद्धि रोकी जाने की कानूनी व्यवस्था हो।
यदि केन्द्र सरकार द्वारा या राज्य सरकार द्वारा उपरोक्त कानूनी प्रावधान पारित कर दिये जावें तो मुआवजे के कारण हो रहे पीड़ितों के अपमान और शोषण को हमेशा-हमेशा को रोका जा सकता है। केवल इतना ही नहीं यदि कोई लोकतांत्रिक सरकार केवल पांच कदम उठा सकती है तो अपने माथे से अपमानकारी मुआवजे के कलंक को हमेशा-हमेशा के लिये मिटा सकती है। जरूरत इस बात की है कि इसके लिये हम सरकार को मजबूर करें!

-लेखक : भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष, जर्नलिस्ट्स, मीडिया एण्ड राईटर्स वैलफेयर एसोसिएशन के नेशलन चेययरमैन, प्रेसपालिका (पाक्षिक) के सम्पादक हैं। ऑल इण्डिया ट्राईबल रेलवे एम्पलाईज एशोसिएशन के संस्थापक व राष्ट्रीय अध्यक्ष और अजा एवं अजजा के अखिल भारतीय परिसंघ के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव। इसके अलावा लेखक को लेखन एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये एकाधिक राष्ट्रीय सम्मानों से विभूूषित भी किया जा चुका है।-98750-66111 

Sunday, November 24, 2013

नाम बताये बिना आरटीआई

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक याचिका पर निर्णय सुनाते हुए इस बात को मान्यता दी है कि सूचना का अधिकार अधिनियम कानून के तहत सूचना प्राप्त करने के लिये आरटीआई का आवेदन दायर करने वाले आवेदकों के जीवन को खतरा है। कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपने आदेश में केवल इतना ही नहीं स्वीकारा है, बल्कि साथ-साथ यह आदेश भी पारित किया है कि सूचना चाहने वाले अपना नाम-पता जाहिर किये बिना ही आरटीआई का आवेदन पेश कर सकते हैं और इस प्रकार से पेश आवेदन पर सूचना दी जायेगी।

Saturday, October 1, 2011

आदिवासी : ग्यारह अवरोधक

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

आजादी के तत्काल बाद संविधान में सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक रूप से सर्वाधिक कमजोर जिन दो वर्गों या समूहों को चिह्नत किया गया था, उनमें एक आदिवासी वर्ग है, जिसे संविधान में ‘अनुसूचित जनजाति’ कहा गया था, संविधान में उसे दलित के समकक्ष खड़ा कर दिया था| इसके चलते वर्तमान में आदिवासी वर्ग देश का सर्वाधिक शोषित, वंचित और फिसड्डी वर्ग/समूह बना दिया गया है|