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Wednesday, April 6, 2011

सीबीआई ने थरथराते और कंपकंपाते हुए पूर्व जज निर्मल यादव के विरुद्ध चालान पेश किया!

सीबीआई ने थरथराते और कंपकंपाते हुए
पूर्व जज निर्मल यादव के विरुद्ध चालान पेश किया!

सीबीआई जहॉं एक ओर सामान्य व्यक्ति के विरुद्ध मामला जॉंचाधीन होने पर भी प्रेस कॉंफ्रेंस करके मीडिया को बढाचढाकर तथ्यों की जानकारी देने में पीछे नहीं रहती है, वही दूसरी ओर हाई कोर्ट की सेवानिवृत जज के विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराधों के तथ्यों की विश्‍वसनीयता प्रमाणित हो जाने पर भी उसका नाम तक लेने में संकोच कर रही है, जिससे सीबीआई की न्यायपालिका के प्रति दौहरी नीति का स्वत: ही पता चलता है| चालान पेश होने के बाद आरोपी पूर्व जज निर्मल यादव ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘‘सीबीआई पागल हो गयी है|’’
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मनीराम शर्मा, एडवोकेट

भारत की सर्वोच्च जॉंच एजेंसी केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने सम्भवत: अपने इतिहास में पहली बार हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज के विरुद्ध मुकदमा बना कर, कोर्ट में चालान (आरोप-पत्र) पेश किया है| चालान पेश करने के बाद सीबीआई ने जो मीडिया का प्रेस विज्ञप्ति जारी की है, उसे पढकर लगता है कि सीबीआई के अफसरों के हाथ-पॉंव फूले हुए हैं और थरथराते व कंपकंपाते हाथों से सीबीआई ने पंजाब-हरियाणा तथा उत्तराखण्ड हाई कोर्ट की पूर्व जज निर्मल यादव के विरुद्ध मुकदमा बना कर सीबीआई की विशेष कोर्ट में पेश किया है| यह स्थिति तो तब है, जबकि पूर्व जज निर्मल यादव के खिलाफ मुकदमा चलाने हेतु देश के राष्ट्रपति से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा १९ के अन्तर्गत स्वीकृति मिलने के बाद ही यह चालान पेश किया गया है|

सीबीआई ने भष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा ११ व १२ के अन्तर्गत सीबीआई की विशेष न्यायालय में चालान पेश किया है, जिसमें आगामी पेशी ६ अप्रेल को निर्धारित की गई है| ४५ पृष्ठीय चालान में मुख्य आरोप है कि पूर्व जज निर्मल यादव ने (हरियाणा-पंजाब हाई कोर्ट की जज के रूप में कार्य करते हुए) सम्पति से सम्बन्धित एक मामले का निर्णय करने में अत्यधिक फुर्ती दिखाई तथा जिसमें हरियाणा के अतिरिक्त महाधिवक्ता संजीव बंसल द्वारा पैरवी की गयी थी| इस मामले में संजीव बंसल के निकट मित्र और दिल्ली के व्यवसायी रविन्द्र सिंह के माध्यम से १५ लाख रुपये का रिश्‍वत के रूप में भुगतान करने का प्रयास किया गया था, जिसके चलते उसके पक्ष का पोषण किये जाने का पूर्व जज निर्मल यादव पर आरोप है|

सीबीआई कोर्ट में प्रस्तुत आरोप-पत्र के अनुसार उक्त मामले का निर्णय ११ मार्च, २००८ सुनाये जाने के दौरान, पक्षकार रविन्द्र सिंह ने अतिरिक्त महाधिवक्ता संजीव बंसल, आरोपी जज निर्मल यादव एवं प्रतिपक्षी सेवा निवृत मजिस्ट्रेट जी. आर. मित्तल से टेलीफोन तथा माबाइल द्वारा लगातार सम्पर्क किया|

प्रकरण के तथ्यों के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार पंचकुला के सेक्टर १६ के विवादित प्लाट नं. ६०१, जिसे कि सेवा निवृत मजिस्ट्रेट जी. आर. मित्तल को बेचने का करार हुआ था, उसके विषय में वीणा गोयल व मित्तल के बीच विवाद उत्पन्न हो गया| मितल ने कई दौर के मुकदमों के बाद निचली अदालत में मामला जीता था और यह मामला अन्नत: पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत हुआ|

अरूण जैन नामक वरिष्ठ अधिवक्ता ने गोयल की अपील याचिका तैयार की थी, किन्तु तत्पश्‍चात जैन से अनापत्ति लेकर संजीव बंसल को इस मामले की पैरवी हेतु लगाया गया| प्रकरण ०१ फरवरी, २००८ को पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट की जज निर्मल यादव के समक्ष सुनवाई हेतु प्रस्तुत हुआ था, किन्तु उस दिन वह डिवीजन बैंच में व्यस्त थी| अत: पेशकार द्वारा मामला ०३ मार्च, २००८ को सुनवाई के लिए स्थगित किया गया, किन्तु डिवीजन बैंच से लौटने के बाद जज निर्मल यादव ने इस मामले को ०४ फरवरी, ०८ को अपने कोर्ट में लगवाकर सुनवाई की एवं निर्णय सुरक्षित रख लिया और एक माह से अधिक समय तक मामले के निर्णय को लम्बित रखने के बाद ११ मार्च, २००८ को वीणा गोयल के पक्ष में निर्णय सुनाया गया|

इस मामले में सीबीआई की ओर से पिछले दिनों कोर्ट में पेश आरोप-पत्र (चालान) में कहा गया है कि इस मामले की आरोपी पूर्व जज निर्मल यादव ने मामले की सुनवाई करने में जल्दबाजी दिखाई| यह भी आरोप है कि अगस्त २००८ में एक व्यापारी रविन्द्र सिंह ने गलती से रिश्‍वत की राशि १५ लाख रुपये पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट की ही मिलते-जुलते नाम वाली अन्य महिला जज निर्मलजीत कौर के यहां पहुंचा दी थी, जिसने इस १५ लाख रुपये की रिश्‍वत की राशि के सम्बन्ध में पुलिस को रिपोर्ट कर दी थी| इसी से यह मामला सामने आया था|

पुलिस ने अपनी जॉंच-पड़ताल में पाया कि महिला जज निर्मलजीत कौर के निवास पर पहुँचायी गयी १५ लाख रुपये की धनराशि वास्तव में न्यायाधीश निर्मल यादव को देने के लिए भेजी गयी थी, लेकिन मिलते-जुलते नाम के कारण गलती से निर्मलजीत कौर के निवास पर पहुँचा दी गयी| चण्डीगढ पुलिस ने मात्र ९ दिन में तथ्यों का अन्वेषण कर संजीव बंसल, राजीव गुप्ता व रविन्द्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया, जिन्होंने पुलिस को बताया कि उक्त धनराशि हाई कोर्ट की तत्कालीन जज निर्मल यादव को उक्त मामले में उनके हितों के पूर्ण करने वाला निर्णय देने के लिए भेजी गयी थी| पक्षकार एवं जज तथा अन्य शामिल लोगों के मोबाईल कॉल डिटेल से भी इन तथ्यों की पुष्टि हुई|

पंजाब के गवर्नर एस. एस. रोडरिगस ने पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तीर्थसिंह ठाकुर के ध्यान में लाते हुए २६ अगस्त, ०८ को इस मामले की सीबीआई से जांच कराने का आग्रह किया था| यद्यपि इसके विपरीत केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने सीबीआई से कहा कि संजीव बंसल, रविन्द्रसिंह और निर्मल सिंह द्वारा न्यायाधीश निर्मल यादव के साथ मिलकर षडयन्त्र कर अपराध करने का नाम मात्र का भी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है| अत: भारत सरकार से आरोपी जज एवं अन्य के विरुद्ध अभियोजन चलाने की स्वीकृति के अभाव में मार्च, २०१० में सीबीआई द्वारा चण्डीगढ स्थित सीबीआई कोर्ट से मामले को बन्द करने की प्रार्थना भी की गयी थी, जिसे सीबीआई कोर्ट द्वारा अस्वीकार कर दिया था|

उपरोक्त मामला इसी स्तर पर दबने के कगार पर ही था, लेकिन सूचना का अधिकार कानून के अन्तर्गत एक आवेदन केे जबाब में खुलासा हुआ कि रिश्‍वत के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट तथा केन्द्र सरकार द्वारा क्लीन चिट देने के दो माह बाद पंजाब के गवर्नर, सीबीआई तथा गोखले कमेटी ने निष्कर्ष निकाला कि पूर्व जज निर्मल यादव को वास्तव में १५ लाख रुपये दिए जाने थे| यह तथ्य मीडिया के माध्यम से सार्वजनिक हो गया|

इसके बाद अतिरिक्त महाधिवक्ता संजीव बंसल ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था, जबकि निर्मल यादव नैतिकता के आधार पर अवकाश पर चली गई| बाद में उन्हें उत्तराखण्ड हाई कोर्ट में स्थानान्तरित कर दिया गया| भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधिपति बालाकृष्णन ने अलग से न्यायाधीशों की कमेटी से जांच हेतु अनुशंसा की थी, किन्तु इसके साथ-साथ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की हैसियत से केन्द्रीय सरकार को निर्मल यादव के विरुद्ध किसी भी प्रकार की कार्यवाही नहीं करने की सलाह भी दी थी| उस समय के मुख्य न्यायाधिपति की अनुशंसा पर गठित गोखले कमेटी ने अपनी ९२ पृष्ठीय रिपोर्ट में कहा है कि न्यायाधीश निर्मल यादव पर लगाये गये आरोप सारभूत व गंभीर है जो न्यायाधीश निर्मल यादव को अपने पद से हटाने की कार्यवाही प्रारम्भ करने हेतु पर्याप्त हैं|

अन्तत: भारत के मुख्य न्यायाधीश कपाड़िया की राय पर राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल द्वारा २८ फरवरी, २०११ को सेवा निवृत्त हो चुकी जज निर्मल यादव के विरुद्ध अभियोजन चलाने की स्वीकृति प्रदान की गई| इसके उपरान्त भी सीबीआई की ओर से जो आरोप-पत्र कोर्ट में पेश किया गया है, उसकी प्रेस विज्ञप्ति में ओरापी जज एवं अन्य के नाम तक उजागर नहीं दिये गये हैं और इसके विपरीत विज्ञप्ति में विशेष रूप से यह भी लिखा गया है कि ‘‘भारतीय कानून में एक अभियुक्त को उचित परीक्षण में दोषी न पाये जाने तक निर्दोष समझा जाता है|’’

इस प्रकार सीबीआई जहॉं सामान्य व्यक्ति के विरुद्ध मामला जॉंचाधीन होने पर भी प्रेस कॉंफ्रेंस करके मीडिया को बढाचढाकर तथ्यों की जानकारी देने में पीछे नहीं रहती है, वही सीबीआई एक हाई कोर्ट की सेवानिवृत जज के विरुद्ध प्रथम दृष्टया अपराधों के तथ्यों की विश्‍वसनीयता प्रमाणित हो जाने पर भी उसका नाम तक लेने में संकोच कर रही है, जिससे सीबीआई की न्यायपालिका के प्रति दौहरी नीति का स्वत: ही पता चलता है|

उक्त चालान पेश होने के बाद आरोपी पूर्व जज निर्मल यादव ने टिप्पणी करते हुए कहा है कि ‘‘सीबीआई पागल हो गयी है|’’ यहॉं विशेष रूप से ध्यान देने योग्य तथ्य है कि सीबीआई की विज्ञप्ति में आरोपी पूर्व जज के साथ-साथ उच्च पदासीन आरोपी व्यक्तियों के नाम तक उजागर नहीं किए गए है और अन्त में स्पष्टीकरण जोड़कर अभियुक्तों को निर्दोष भी बताया गया है| यद्यपि यह समाचार दैनिक समाचार पत्रों में पूर्व में सचित्र प्रकाशित होता रहा है| कानून की दृष्टि में किसी के भी विरुद्ध प्रस्तुत किया जाने वाला आरोप पत्र एक लोक दस्तावेज (पब्लिक डॉक्यूमेण्ट) होता है, जिसे कोई भी व्यक्ति कोर्ट में आवेदन देकर प्राप्त कर सकता है| जिसको सीबीआई द्वारा गोपनीय रखने का कोई औचित्य नहीं है|

जबकि इसके विपरीत सुप्रीम कोर्ठ द्वारा शिवनंदन पासवान (एआईआर, १९८७ सुप्रीम कोर्ट-८७७) के प्रकरण में व्यक्त विचारों के अनुसार चूंकि अपराधिक कार्यवाही समाज हित में संचालित होती है, अत: कोई भी नागरिक इसमें किसी भी स्तर पर भागीदार बन सकता है| ऐसे में प्रश्‍न यह है कि क्या सीबीआई पूर्व में भी कभी ऐसा बर्ताव करती रही है और क्या सभी मामलों में ऐसा स्पष्टीकरण जोड़ा जाता रहा है कि ‘‘कोर्ट द्वारा दोषी सिद्ध नहीं हो जाने तक आरोपियों को दोषी नहीं समझा जाना चाहिये|’’

केवल इतना ही नहीं, बल्कि सीबीआई का यह व्यवहार विनीत नारायण (विनीत नारायण बनाम भारत संघ, सुप्रीम कोर्ट-८८९) के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा व्यक्त विचारों का भी उल्लंघन करता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि ‘‘कानून अभियोजन एवं अनुसंधान हेतु अभियुक्तों को उनकी हैसियत के अनुसार वर्गीकृत नहीं करता है| समान प्रकार का अपराध करने वाले सभी अपराधियों के साथ समान व्यवहार होना चाहिए|’’ ऐसे हालात में यह संदेहास्पद है कि जो सीबीआई आरोपी सिद्ध हो चुके अभियुक्तों का नाम तक प्रकट करने में संकोच कर रही है और साथ ही साथ उन्हें निर्दोष भी बताने का प्रयास कर रही है, क्या वही सीबीआई उनके विरुद्ध कोर्ट के समक्ष अभियोजन (मुकदमे) का दृढ़तापूर्वक संचालन करते समय दबाव में नहीं आयेगी| अत: यह संदिग्ध ही है कि सीबीआई कंपकंपाते और थरथराते हाथों से अभियुक्तों को दण्डित करवाने में सफल हो पायेगी|

सीबीआई की ४ अप्रेल, २०११ की प्रेस विज्ञप्ति में मात्र इतना सा कहा गया है कि अगस्त २००८ में पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के एक अन्य न्यायाधीश के दरवाजे पर पाये गये १५ लाख रुपये के सम्बन्ध में पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय के एक न्यायाधीश और चार अन्य लोगों के विरूद्ध चंडीगढ के विशेष न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर दिया है| विधि एवं न्याय मंत्रालय से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा १९ के अन्तर्गत अभियोजन स्वीकृति प्राप्त होने बाद यह आरोप पत्र दाखिल किया गया है|

From : PRESSPALIKA-01.04.2011

Wednesday, November 17, 2010

रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!

रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'

भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?
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इस बात में तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि केन्द्र एवं राज्य सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है! मैं फिर से दौहरा दूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है!" शेष 10 फीसदी भ्रष्टाचार के लिये दोषी लोगों को कठोर सजा के जरिये ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार देश की सबसे बडी समस्याओं में से एक भ्रष्टाचार से निजात पायी जा सकती है।

मेरी उपरोक्त बात पढकर अनेक पाठकों को लगेगा कि यदि ऐसा होता तो भ्रष्टाचार कभी का रुक गया होता। इसलिये मैं फिर से जोर देकर कहना चाहता हूँ कि "हाँ यदि सरकारें चाहती तो अवश्य ही रुक गया होता, लेकिन असल समस्या यही है कि सरकारें चाहती ही नहीं!" सरकारें ऐसा चाहेंगी भी क्यों? विशेषकर तब, जबकि लोकतन्त्र के विकृत हो चुके भारतीय लोकतन्त्र के संसदीय स्वरूप में सरकारों के निर्माण की आधारशिला ही काले धन एवं भ्रष्टाचार से रखी जाती रही हैं। अर्थात् हम सभी जानते हैं कि सभी दलों द्वारा काले धन एवं भ्रष्टाचार के जरिये अर्जित धन से ही तो लोकतान्त्रिक चुनाव ल‹डे और जीते जाते हैं।

स्वयं मतदाता भी तो भ्रष्ट लोगों को वोट देने आगे रहता है, जिसका प्रमाण है-अनेक भ्रष्ट राजनेताओं के साथ-साथ अनेक पूर्व भ्रष्ट अफसरों को भी चुनावों में भारी बहुमत से जिताना, जबकि सभी जानते हैं की अधिकतर अफसर जीवनभर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये ही अफसर हमारे जनप्रतिनिधि बनते जा रहे हैं। मैं ऐसे अनेक अफसरों के बारे में जानता हूँ जो 10 साल की नौकरी होते-होते एमपी-एमएलए बनने का ख्वाब देखना शुरू कर चुके हैं। साफ़ और सीधी सी बात है-कि ये चुनाव को जीतने लिये, शुरू से ही काला धन इकत्रित करना शुरू कर चुके हैं, जो भ्रष्टाचार के जरिये ही कमाया जा रहा है। फिर भी मतदाता इन्हें ही जितायेगा।

ऐसे हालत में सरकारें बिना किसी कारण के ये कैसे चाहेंगी कि भ्रष्टाचार रुके, विशेषकर तब; जबकि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार, जो सभी राजनैतिक दलों की ऑक्सीजन है। यदि सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार को ही समाप्त कर दिया गया तो इन राजनैतिक दलों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा! परिणाम सामने है : भ्रष्टाचार देशभर में हर क्षेत्र में बेलगाम दौ‹ड रहा है और केवल इतना ही नहीं, बल्कि हम में से अधिकतर लोग इस अंधी दौ‹ड में शामिल होने को बेताब हैं।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाया जावे।

अधिकतर लोगों के भ्रष्टाचार की दौ‹ड में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद भी उन लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं या जो भ्रष्टाचार को ठीक नहीं समझते हैं। क्योंकि आम जनता के दबाव में यदि सरकार ‘‘सूचना का अधिकार कानून" बना सकती है, जिसमें सरकार की 90 प्रतिशत से अधिक फाइलों को जनता देख सकती है, तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना क्यों असम्भव है? यद्यपि यह सही है कि ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बन जाने मात्र से ही अपने आप किसी प्रकार का जादू तो नहीं हो जाने वाला है, लेकिन ये बात तय है कि यदि ये कानून बन गया तो भ्रष्टाचार को रुकना ही होगा।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-
भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं,
भ्रष्टाचार से दुखी हैं,
भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया,
भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और
जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।

अनेक कथित बुद्धिजीवी, निराश एवं पलायनवादी लोगों का कहना है कि अब तो भ्रष्टाचार की गंगा में तो हर कोई हाथ धोना चाहता है। फिर कोई भ्रष्टाचार की क्यों खिलाफत करेगा? क्योंकि भ्रष्टाचार से तो सभी के वारे-न्यारे होते हैं। जबकि सच्चाई ये नहीं है, ये सिर्फ भ्रष्टाचार का एक छोटा सा पहलु है।

यदि सच्चाई जाननी है तो निम्न तथ्यों को ध्यान से पढकर सोचें, विचारें और फिर निर्णय लें, कि कितने लोग भ्रष्टाचार के पक्ष में हो सकते हैं?

अब मेरे सीधे सवाल उन लोगों से हैं जो भ्रष्ट हैं या भ्रष्टाचार के हिमायती हैं या जो भ्रष्टाचार की गंगा में डूबकी लगाने की बात करते हैं। क्या वे उस दिन के लिए सुरक्षा कवच बना सकते हैं, जिस दिन-

1. उनका कोई अपना बीमार हो और उसे केवल इसलिए नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवाएँ कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरने के बाद भी अप्रूव्ड करदी गयी थी?

2. उनका कोई अपना बस में यात्रा करे और मारा जाये और उस बस की इस कारण दुर्घटना हुई हो, क्योंकि बस में लगाये गए पुर्जे कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरने के बावजूद अप्रूव्ड कर दिए थे?

3. उनका कोई अपना खाना खाने जाये और उनके ही जैसे भ्रष्टाचारियों द्वारा खाद्य वस्तुओं में की गयी मिलावट के चलते, तडप-तडप कर अपनी जान दे दे?

4. उनका कोई अपना किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टर बिना रिश्वत लिये उपचार करने या ऑपरेशन करने से साफ इनकार कर दे या विलम्ब कर दे और पीड़ित व्यक्ति बचाया नहीं जा सके?

ऐसे और भी अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।

यहाँ मेरा आशय केवल यह बतलाना है की भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?

उपरोक्त विवरण पढकर यदि किसी को लगता है की भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिये तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाने के लिये अपने-अपने क्षेत्र में, अपने-अपने तरीके से भारत सरकार पर दबाव बनायें। केन्द्र में सरकार किसी भी दल की हो, लोकतन्त्रान्तिक शासन व्यवस्था में एकजुट जनता की बाजिब मांग को नकारना किसी भी सरकार के लिये आसान नहीं है।

क्या है? ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून"

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19.1.ग में प्रदत्त मूल अधिकार के तहत 1993 में शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयन्ती के दिन (26 एवं २7 सितम्बर की रात्री को) स्थापित एवं भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से 6 अप्रेल, 1994 से पंजीबद्ध एवं अनुमोदित ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान" (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लगातार अनेक राज्यों के अनेक क्षेत्रों व व्यवसायों से जुडे लोगों के साथ कार्य करते हुए और 20 वर्ष 9 माह 5 दिन तक भारत सरकार की सेवा करते हुए मैंने जो कुछ जाना और अनुभव किया है, उसके अनुसार देश से भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिये ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून" बनाना जरूरी है, जिसके लिये केन्द्र सरकार को संसद के माध्यम से वर्तमान कानूनों में कुछ बदलाव करने होंगे एवं कुछ नए कानून बनवाने होंगे, जिनका विवरण निम्न प्रकार है :-

1-भ्रष्टाचार अजमानतीय अपराध हो और हर हाल में फैसला 6 माह में हो : सबसे पहले तो यह बात समझने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार केवल मात्र सरकारी लोगों द्वारा किया जाने वाला कुकृत्य नहीं है, बल्कि इसमें अनेक गैर-सरकारी लोग भी लिप्त रहते हैं। अत: भ्रष्टाचार या भ्रष्ट आचरण की परिभाषा को बदलकर अधिक विस्तृत किये जाने की जरूरत है। इसके अलावा इसमें केवल रिश्वत या कमीशन के लेन-देन को भ्रष्टाचार नहीं माना जावे, बल्कि किसी के भी द्वारा किसी के भी साथ किया जाने वाला ऐसा व्यवहार जो शोषण, गैर-बराबरी, अन्याय, भेदभाव, जमाखोरी, मिलावट, कालाबाजारी, मापतोल में गडबडी करना, डराना, धर्मान्धता, सम्प्रदायिकता, धमकाना, रिश्वतखोरी, उत्पीडन, अत्याचार, सन्त्रास, जनहित को नुकसान पहुँचाना, अधिनस्थ, असहाय एवं कमजोर लोगों की परिस्थितियों का दुरुपयोग आदि कुकृत्य को एवं जो मानव-मानव में विभेद करते हों, मानव के विकास एवं सम्मान को नुकसान पहुंचाते हों और जो देश की लोकतान्त्रिक, संवैधानिक, कानूनी एवं शान्तिपूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट, नष्ट या प्रदूषित करते हों को ‘‘भ्रष्टाचार" या "भ्रष्ट आचरण" घोषित किया जावे।

इस प्रकार के भ्रष्ट आचरण को भारतीय दण्ड संहिता में अजमानतीय एवं संज्ञेय अपराध घोषित किया जावे। ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों को पुलिस जाँच के तत्काल बाद जेल में डाला जावे एवं उनके मुकदमों का निर्णय होने तक, उन्हें किसी भी परिस्थिति में जमानत या अन्तरिम जमानत या पेरोल पर छोडने का प्रावधान नहीं होना चाहिये। इसके साथ-साथ यह कानून भी बनाया जावे कि हर हाल में ऐसे मुकदमें की जाँच 3 माह में और मुकदमें का फैसला 6 माह के अन्दर किया जावे। अन्यथा जाँच या विचारण में विलम्ब करने पर जाँच एजेंसी या जज के खिलाफ भी जिम्मेदारी का निर्धारण करके सख्त दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिये।

..............‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून के शेष सुधार अगली किश्त में शीघ्र पढने को मिलेंगे....

पाठकों से निवेदन है कि खुलकर प्रतिक्रिया दें और बहस को आगे बढाने में सहयोग करें!

Monday, April 19, 2010

पीटना क्रूरता नहीं, तो फिर क्या है-क्रूरता?


पीटना क्रूरता नहीं, तो फिर क्या है-क्रूरता?

1-सुप्रीम कोर्ट कहता है कि बहु को पीटना क्रूरता नहीं है, ऐसे में यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि इन हालातों में आरोपी को पुलिस द्वारा पीटना क्रूरता कैसे हो सकती है? और यदि क्रूरता की यही परिभाषा है तो फिर मानव अधिकार आयोग का क्या औचित्य रह जाता है?

2-जिस पुरुष को पीडिता के आरोप को अन्तिम सत्य मानकर सजा सुनाई गयी उसके पक्ष में और जिस पुरुष को पीडिता के बयान को अन्तिम सत्य नहीं मानकर बरी कर दिया गया उसके विरोध में कौन खडा होगा, जिससे कि कोर्ट पुनर्विचार करने को विवश हो?

3-जो सफाई दी जाती है, वह यह है कि अलग-अलग जज के अलग-अलग विचारों के कारण ऐसे फैसले आते हैं! इसके विरोध में मेरा कहना है कि यदि कोई जज अपने विचारों के आधार पर फैसले करता है, तो वह जज की कुर्सी पर बैठने के काबिल ही नहीं है, क्योंकि इस देश में कानून का शासन है और कानून के अनुसार ही निर्णय लिये और किये जाते हैं।

4-क्या अब ऐसा समय आ गया है कि कोर्ट के निर्णयों के विरोध में भी जनता और संगठनों को सडक पर उतर कर, जिन्दाबाद-मुर्दाबाद करना होगा। यदि सुप्रीम कोर्ट के हाल में सुनाये गये फैसलों को देखें तो ऐसा ही लगता है।

5-इस बात की परवाह किये बिना बहस होनी चाहिये कि बहस के कारण न्यायिक अवमानना का खतरा उत्पन्न हो सकता है! क्योंकि डरे और सहमे हुए लोगों को कभी भी न्याय नहीं मिलता है।

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
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पिछले साल के अन्त में एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि सास द्वारा अपनी बहू को पीटना या अपने बेटे से उसे तलाक दिलवाने की धमकी दिलवाना, आईपीसी (भारतीय दंड संहिता) की धारा 498-ए के तहत क्रूरता नहीं है। इससे पूर्व सुप्रीम कोर्ट एक अन्य मामले में कह चुका है कि पति की मृत्यु के बाद उसकी दूसरी पत्नी को अनुकम्पा नियुक्ति दी जा सकती है, बशर्ते कि पहली पत्नी को कोई आपत्ती नहीं हो। (इस सम्बन्ध में मेरा आलेख-दोनों बीवी राजी को क्या करेगा काजी! पढा जा सकता है।) जबकि इसके विपरीत हालिया सुनाये गये एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कहा गया कि दत्तक सन्तान को अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दी जा सकती।

पूर्व में सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट मत था कि कोई भी भारतीय स्त्री अदालत के समक्ष किसी पुरुष पर बलात्कार का झूठा आरोप नहीं लगा सकती। इसलिये बलात्कार के मामले में पीडिता के बयान को अन्तिम सत्य मानकर आरोपी को सजा सुनायी जा सकती है। इसी तथ्य पर सुप्रीम कोर्ट का हाल का मत है कि कोई भी स्त्री अदालत के समक्ष न मात्र असत्य बोलकर झूठा आरोप लगाकर बलात्कार के आरोप में पुरुष को झूठा फंसा सकती है, बल्कि कोर्ट ने यह भी कहा कि अनेक स्त्रियाँ रुपये लेकर भी बलात्कार के झूठे आरोप लगा सकती हैं। अतः उनके बयानों को अन्तिम सत्य मानकर आरोपी को सजा नहीं सुनाई जानी चाहिये।

सुप्रीम कोर्ट के इस प्रकार के विरोधाभाषी निर्णयों की एक लम्बी फेहरिश्त है। जिसके कारण क्या हैं, यह तो जाँच का विषय है, लेकिन इसके बारे में जो सफाई दी जाती है, वह यह है कि अलग-अलग जज के अलग-अलग विचारों के कारण ऐसे फैसले आते हैं! इसके विरोध में मेरा कहना है कि यदि कोई जज अपने विचारों के आधार पर फैसले करता है, तो वह जज की कुर्सी पर बैठने के काबिल ही नहीं है, क्योंकि इस देश में कानून का शासन है और कानून के अनुसार ही निर्णय लिये और किये जाते हैं। ऐसे जजों के अलग-अलग विचारों का क्या मतलब रह जाता है? लेकिन कोई न कोई वजह तो है ही, तब ही तो इस प्रकार के विरोधाभाषी निर्णय सामने आ रहे हैं और इन निर्णयों के कारण कितने निर्दोषों को सजा मिल जाती है और कितने दोषी छूट जाते हैं।

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बहु को पीटना क्रूरता नहीं है! इस निर्णय के विरोध में अनेक स्त्री संगठनों ने धरने-प्रदर्शन किये तो सुप्रीम कोर्ट अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करने को राजी हो गया। पुनर्विचार के बाद क्या निर्णय आयेगा, ये तो भविष्य के गर्भ में छिपा है, लेकिन कुछ बातें हैं, जिन पर इस बात की परवाह किये बिना बहस होनी चाहिये कि बहस के कारण न्यायिक अवमानना का खतरा उत्पन्न हो सकता है! क्योंकि डरे और सहमे हुए लोगों को कभी भी न्याय नहीं मिलता है।

यदि महिलाओं के संगठनों के विरोध के कारण सुप्रीम कोर्ट पुनर्विचार करने को राजी है, तो इसका प्रथम दृष्टि में यही आशय है कि फैसले में ऐसा कुछ अवश्य है, जिसे फिर से देखा जा सकता है और मैं तो कहता हँू कि हर मामले में ऐसी सम्भावना बनी रहती है। परन्तु ऐसा दबाव कौन बनाये जिससे कोर्ट को पुनर्विचार करने को विवश होना पडे! जिस पुरुष को पीडिता के आरोप को अन्तिम सत्य मानकर सजा सुनाई गयी उसके पक्ष में और जिस पुरुष को पीडिता के बयान को अन्तिम सत्य नहीं मानकर बरी कर दिया गया उसके विरोध में कौन खडा होगा, जिससे कि कोर्ट पुनर्विचार करने को विवश हो?

क्या अब ऐसा समय आ गया है कि कोर्ट के निर्णयों के विरोध में भी जनता और संगठनों को सडक पर उतर कर, जिन्दाबाद-मुर्दाबाद करना होगा। यदि सुप्रीम कोर्ट के हाल में सुनाये गये फैसलों को देखें तो ऐसा ही लगता है। हमारे देश में ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व में मारपीट को क्रूरता की श्रेणी में माना गया है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट कहता है कि बहु को पीटना क्रूरता नहीं है, ऐसे में यह सवाल उठाना स्वाभाविक है कि इन हालातों में आरोपी को पुलिस द्वारा पीटना क्रूरता कैसे हो सकती है? और यदि क्रूरता की यही परिभाषा है तो फिर मानव अधिकार आयोग का क्या औचित्य रह जाता है?

जब पीटना ही क्रूरता नहीं है तो गाली-गलोंच और अभद्रतापूर्ण व्यवहार तो क्रूरता या अपराध होना ही नहीं चाहिये? इन परिस्थितियों में मेरा मानना है कि सभी क्षेत्रों और सभी समाजों के सभी प्रबुद्ध, साहसी एवं संवेदनशील लोगों को आगे आकर इन सब मुद्दों पर न मात्र खुलकर अपनी राय प्रकट करनी होगी, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के इस प्रकार के निर्णयों के प्रकाश में हमें इस बात पर भी विचार करना होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जजों की चयन प्रक्रिया में कहीं कोई गुणवत्तात्मक कमी तो नहीं है? 14.04.2010
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-लेखक प्रेसपालिका (पाक्षिक समाचार-पत्र) के सम्पादक, होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि अनेक विषयों के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध १९९३ में स्थापित एवं १९९४ से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें ४१९६ रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के १७ राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. ०१४१-२२२२२२५ (सायं ७ से ८ बजे) मो. ०९८२८५-०२६६६।
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