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Thursday, February 13, 2014

जर्नादन द्विवेदी कांग्रेस में संघ के प्रतिनिधि

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
 
कॉंग्रेस के चोटी के नीति-निर्धारकों में जर्नादन द्विवेदी शामिल हैं। वे प्रभावशाली राष्ट्रीय महासचिव हैं। ऐसी ताकवर हैसियत रखने वाले जर्नादन द्विवेदी का सार्वजनिक रूप से यह कहना कि दलित-आदिवासियों को प्रदत्त जाति आधारित आरक्षण समाप्त करके, आर्थिक आधार पर आरक्षण लागू किया जाना चाहिये, अनेक लोगों को आश्‍चर्य में डाल सकता है। जिसके चलते अनेक लोगों ने इसके पक्ष-विपक्ष में अपने-अपने तर्कों के आधार पर अनेक आलेख और सम्पादकीय भी लिखे हैं। किन्तु दु:खद आश्‍चर्य तो यह है कि इस बारे में सच को कहने की कोई भी हिम्मत क्यों नहीं जुटाता?
 
आरक्षण विरोधियों का पहला तर्क होता है कि आरक्षण का जिन लोगों को लाभ मिल रहा है, वे लोग इसके सच्चे हकदार नहीं है, वास्तविक हकदारों को आरक्षण का लाभ ही नहीं मिल रहा है। इसमें ‘‘लाभ’’ शब्द गौर करने लायक है, क्योंकि यह ‘‘लाभ’’ शब्द ही भ्रान्तियों का असली कारण है। संविधान को जिन लोगों ने पढा है, वे जानते हैं कि दलित-आदिवासियों को दिया जा रहा आरक्षण उन्हें किसी भी प्रकार का ‘‘लाभ’’ पहुँचाने के लिये दिया ही नहीं गया है। ऐसे में किसे ‘‘लाभ’’ मिला है या किसे ‘‘लाभ’’ मिलना चाहिये, ये सवाल ही अपने आप में बेमानी और असंवैधानिक है, जबकि इसी पर मीडिया में सर्वाधिक चर्चा होती है। जिसका मूल कारण है-चर्चा करने वाले दुराग्रहों और पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं ही साथ उन्हें संवैधानिक आरक्षण अवधारणा का ज्ञान भी नहीं है। ऐसे लोग दलित-आदिवासियों के विरुद्ध लगातार विष वमन करते रहते हैं। जिन्हें ऊर्जा मिलती है-मनुवादी, संघवादी लोगों से; जिनका एकमेव लक्ष्य इस देश में फिर से मनुवाद लागू करना है।

समझने वाली बात ये है कि आरक्षण का संवैधानिक मकसद दलित और आदिवासी वर्गों को प्रत्येक सरकारी क्षेत्र में सशक्त प्रतिनिधित्व प्रदान करना है। जो तब ही सम्भव है, जबकि पीढी दर पीढी आरक्षित वर्ग के सशक्त लोग नीति-नियन्ता पदों पर पदस्थ हों। इसीलिये इन वर्गों को पदोन्नतियों में प्रदान किया जा रहा आरक्षण न मात्र संवैधानिक है, बल्कि न्यायसंगत भी है।

जहॉं तक जनार्दन द्विवेदी के बयान की बात है तो मैं बहुत पहले से इस बात को कहता और लिखता आया हूँ कि कांग्रेस पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परोक्ष रूप से अपना कब्जा जमा चुका है। इसी कड़ी में जनार्दन द्विवेदी एक बड़ा नाम है जो कांग्रेस में रहकर संघ-प्रतिनिधि के रूप में काम कर रहे हैं। कांग्रेस को शीघ्रता से ऐसे छद्म संघियों को ढूंढकर बाहर करना होगा, अन्यथा कांग्रेस इस देश से बाहर हो जायेगी। हालांकि अब बहुत देर हो चुकी है।

हम पिछले एक दशक से कांग्रेस को आगाह करते रहे हैं कि कांग्रेस में संघियों का प्रवेश हो चुका है, जिनके मार्फत सत्ता के तीनों स्तम्भों पर संघ का लगातार दबदबा बढ रहा है। एक बार नहीं, बल्कि अनेकों बार सुप्रीम कोर्ट द्वारा दलित-आदिवासी उत्थान विरोधी और संघ की विचारधारा के पोषक असंवैधानिक निर्णय सुनाये गये हैं। जिन्हें संविधान संशोधन के जरिये बार-बार निरस्त करना पड़ता रहा है। इसके उपरान्त भी यदि कांग्रेस हाई कमान की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा है और जनार्दन द्विवेदी जैसे लोगों के सहारे कांग्रेस सत्ता पर कायम रहना चाहती है, तो ये असम्भव है!

जहॉं तक आर्थिक आधार पर आरक्षण प्रदान करने की बात है तो दलित-आदिवासियों के सन्दर्भ में तो यह अवधारणा प्रारम्भ से ही गैर कानूनी, असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण है, क्योंकि जैसा कि ऊपर स्पष्ट किया गया है कि दलितों और आदिवासियों को प्रदत्त आरक्षण का संवैधानिक मकसद उन्हें किसी प्रकार ‘‘लाभ’’ पहुंचाना या उनकी उन्नति करना या उन्हें नौकरी देना मात्र नहीं है, बल्कि हर एक क्षेत्र में उनका सशक्त प्रतिनिधित्व कायम करना है। जिससे कि वे अपने वर्गों के साथ हजारों सालों से किये जाते रहे भेदभाव और अन्याय को कम से कम रोकने में तो सक्षम हो सकें।

इसके विपरीत आर्थिक रूप से विपन्न वर्ग के लोगों में कोई भावनात्मक लगाव नहीं होता है। उदाहरण के लिये गरीबी के आधार पर आरक्षरण प्राप्त करने वाले परिवार का व्यक्ति जैसे कि आईएएस बनेगा वह गरीब नहीं रहेगा और ऐसे में क्रीमी लेयर के आधार पर उसे गरीब वर्ग से बाहर कर दिया जायेगा, फिर वह अनारक्षित वर्ग में शामिल हो जायेगा। जो सेवा के दौरान गरीबों के प्रति सवर्ण अनारक्षितों की ही भांति व्यवहार करेगा। जिससे पिछड़े व दमित लोगों का कभी भी उत्थान नहीं होगा। अत: सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े दलित-आदिवासी वर्गों को हर हाल में जाति आधारित आरक्षण प्रदान किया जाना संविधान सम्मत है, जो तब तक कायम रहना चाहिये, जब तक कि इन वर्गों का आनुपातिक और सशक्त प्रतिनिधित्व प्रत्येक स्तर पर कायम नहीं हो जाता है। लगता नहीं इस सदी में ऐसा होने दिया जायेगा। क्योंकि न्यायपालिका के सहयोग से मनुवादी संघियों द्वारा लगातार दलित-आदिवासी प्रतिनिधित्व को हर एक क्षेत्र में हर दिन और लगातार कुचला जा रहा है।

ऐसे में जनार्दन द्विवेदी के असंवैधानिक बयान का अर्थ और तो कुछ भी नहीं है, लेकिन यह कांग्रेस को आगाह जरूर करता है कि वह अपने संगठन में घुस आये संघियों को तत्परता से बाहर करे, अन्यथा कांग्रेस को विनिष्ट होने से बचाना सम्भव नहीं होगा।

Thursday, September 26, 2013

भाजपा को सत्ता मिली तो दशकों तक कीमत चुकानी होगी!

भारतीय जनता पार्टी का हर एक कार्यकर्ता और राजनेता बार-बार इस बात को नकारता आया है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का भाजपा के राजनैतिक मामलों में किसी प्रकार का हस्तक्षेप रहता है। लेकिन पहले नितिन गडकरी की और अब नरेन्द्र मोदी की ताजपोशी को लेकर जिस प्रकार संघ ने खुलकर भाजपा को निर्देश दिये हैं, उससे ये बात निर्विवाद रूप से साफ हो गयी है कि संघ एक ऐसा संगठन है, जिसके पास किसी भी प्रकार की लोकतान्त्रिक ताकत नहीं है, फिर भी वह भाजपा को संचालित करता रहा है। यह प्रत्येक तटस्थ बुद्धिजीवी

Friday, May 10, 2013

दलित-आदिवासी और स्त्रियों का धर्म आधारित उत्पीड़न हमारी चिन्ता क्यों नहीं?


तत्काल समाधान हेतु इस देश में यदि आज सबसे बड़ी कोई समस्या है तो वो है, देश के पच्चीस फीसदी दलितों और आदिवासियों और अड़तालीस फीसदी महिला आबादी को वास्तव में सम्मान, संवैधानिक समानता, सुरक्षा और हर क्षेत्र में पारदर्शी न्याय प्रदान करना और यदि सबसे बड़ा कोई अपराध है तो वो है-दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों को धर्म के नाम पर हर दिन अपमानित, शोषित और उत्पीड़ित किया जाना। यही नहीं इस देश में आज की तारीख में यदि सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवासियों और स्त्रियों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न कर रहे हैं और जिन्हें धर्म और संस्द्भति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सहयोग प्रदान करते रहते हैं।

Wednesday, March 13, 2013

राजस्थान में तीसरे मोर्चे के गठन की असलियत

डॉ. किरोड़ी लाल मीणा ने उन फ्लॉप राजनेता पीए संगमा का दामन थामा है, जो स्वयं उन ईसाई आदिवासी जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हिन्दू धर्म को बदलकर भी अजजा कोटे का लाभ उठा रही हैं। ऐसे में डॉ. मीणा का आदिवासियों का राष्ट्रीय नेता बनने या राजस्थान के सभी आदिवासियों का नेता बनने और राजस्थान के सीएम बनने का सपना पहली ही सीढी पर टूटता नजर आ रहा है।

Thursday, November 1, 2012

मनुवादियों ने दलित जोड़ों को मंदिर से खदेड़ा!

यदि हम वास्तव में चाहते हैं कि देश में अमन-चैन बना रहे और समाज के सभी दबे-कुचले लोग तरक्की करें और सम्मान के साथ जीवन यापन करें तो हमें मनुवाद को तत्काल प्रतिबन्धित करने और मुनवादी कुकृत्यों को अंजाम देने वालों को देशद्रोही के समान दण्डनीय अपराध घोषित करने की सख्त जरूरत है| जिसके लिये संविधान के भाग तीन के अनुच्छेद 13 (1) एवं 13 (3) में सरकार को सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त हैं| यदि सरकार में राजनैतिक इच्छा-शक्ति हो तो इस प्रावधान के तहत मनुवादी दैत्य को नेस्तनाबूद किया जा सकता है| लेकिन ऐसा हो नहीं पा रहा है, जिसके पीछे हर पार्टी में मनुवादियों का वर्चस्व होना बड़ा कारण है|

Tuesday, November 15, 2011

क्या भारत का मतदाता भहरूपियों को नयी दिल्ली की गद्दी सौंपने को तैयार है?

इस समय देश की दिशा और दशा दोनों ही डगमगाने लगी हैं| सम्पूर्ण भारत में मंहगाई सुरसा की भांति विकराल रूप धारण करती जा रही है| जिसके प्रति केन्द्र सरकार तनिक भी चिन्तित नहीं दिखती है| परिणामस्वरूप जहॉं एक ओर गरीब मर रहा है| उसके लिये जीवनयापन भी मुश्किल हो गया है| किसान आत्महत्या कर रहे हैं| जबकि इसके विपरीत सम्पन्न और शासक वर्ग दिनोंदिन धनवान होकर विलासतपूर्ण जीवन जीने और उसका प्रदर्शन करने से भी नहीं चूक रहा है|


इन हालातों में जहॉं एक ओर युवा वर्ग निराशा और अवसाद से ग्रस्त होकर सृजन के बजाय विसृजन तथा आपराधिक कार्यों की ओर प्रवृत्त हो रहा है| जिसके चलते सड़क पर चलती औरतों के जैवर लूटे जा रहे हैं, चोरी-डकैतियॉं और एटीम मसीनों को चुराने तक की घटनाओं में भारत का भविष्य अर्थात् युवावर्ग लिप्त हो रहा है|

प्रतिपक्ष जिसका कार्य, सत्ताधारी दल की राजनैतिक असफलताओं, कमजोरियों और मनमानी नीतियों को उजागर करके देश और समाज के सामने लाना है, वह निचले दबके और अल्पसंख्यकों के प्रति पाले हुए स्थायी दुराग्रहों और धर्मान्धता की बीमारी से मुक्त नहीं हो पा रहा है| स्वयं प्रतिपक्षी पार्टी के लोग जो कभी ‘चाल, चरित्र और चेहरे’ की बात किया करते थे, खुद भी उसी प्रकार से सत्ताधारियों की भांति भ्रष्ट हैं और गिरगिट की भांति रंग बदल रहे हैं| जिस प्रकार से कांशीराम के अवसान के बाद मायावती ने ‘तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार’ के नारे को भूलकर ब्राह्मणों के साथ दिखावटी दोस्ती करके सत्ता पर काबिज हो चुकी हैं| यही नहीं माया ने अन्य सभी राजनैतिक दलों को अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने को भी मजबूर कर दिया है|

सत्ताधारियों और सत्ता से बेदखल लोगों का चरित्र कहॉं है, आम लोग समझ ही नहीं पाते हैं| जो पार्टी सिर्फ सोनिया तथा मनमोहन की पूँजीवादी नीतियों के इर्दगिर्द घूमती रही है, उस पार्टी को मिश्रित अर्थव्यवस्था के जन्मदाता जवाहर लाल नेहरू को अचानक अपने बैनरों पर छाप देना और इन्दिरा, लाल बहादुर, राजीव और नरसिम्हाराव को एक ओर कर देना अपने आप में अनेक भ्रम और भ्रान्तियों का शिकार होने का द्योतक है| इसका मतलब ये समझा जाये कि अब मनमोहन सिंह के दिन लद गये हैं? जबकि स्वयं यूपीए का कहना है कि दुनिया के तमाम देश आर्थिक संकट से त्रस्त हैं, लेकिन भारत में अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री होने के कारण ही भारत की अर्थव्यवस्था बच सकी है?

भारत की सबसे बड़ी दूसरी पार्टी भाजपा का रिमोट कंट्रोल संघ भी अब अपने आपको इस कदर नीचे गिरा चुका है कि जबरन अन्ना के पीछे लग रहा है, जबकि अन्ना मानने को ही तैयार ही नहीं है| यह बात अलग है कि अब तो सारा देश जान चुका है कि अन्ना भाजपा और संघ का ही संयुक्त उत्पाद है| इसके बावजूद अन्ना अभी भी संघ और भाजपा से दूरी बनाये रखने में क्या कोई ऐसी राजनीति खेल रहे हैं, जिसके परिणाम यूपीए को उसकी बेवकूफियों और हठधर्मिता का दुष्परिणाम भोगने को विवश कर देंगे?

अब तो कॉंग्रेस से दशकों से जुड़े कट्टर कॉंग्रेसी भी यह मानने लगा है कि कॉंग्रेस दिशाभ्रम की शिकार होने के साथ-साथ भाजपा-संघ-हिन्दुत्वादी ताकतों के चक्रव्यूह में इतनी बुरी तरह से फंसती जा रही है कि २०१४ के चुनाव में कॉंग्रेस की नैया पार लगना आसान नहीं होगा| वहीं दूसरी ओर कॉंग्रेस की राजनीतिक सूझबूझ के जानकारों का कहना है कि २०१४ आने तक तो देश का परिदृश्य ही बदल चुका होगा| उनका कहना है कि नीतीश कुमार भाजपा से पीछा छुड़ा चुके होंगे और आडवाणी, मोदी, स्वराज, जेटली, राजनाथ सिंह और गडकरी की प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षाओं से टकराकर भाजपा बिखरने के कगार पर पहुँच चुकी होगी| जबकि कुछ दूसरे जनाकारों का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो भाजपा के नेतृत्व की कमान पण्डित मुरली मनोहर जोशी को मिल सकती है, जो लम्बे समय से इन्तजार में हैं|

इन हालातों में भारत की दिशा और दशा दोनों ही पटरी से उतरी हुई लगती हैं, जिसके चलते न मात्र देश का शासकीय भविष्य भ्रष्ट ब्यूराक्रेट्स की मनमानी नीतियों का शिकार है, बल्कि अन्ना हजारे, बाबा रामदेव और श्रीश्री रविशंकर जैसे लोग भी नीति और अनीति को भूलकर इसी स्थिति का लाभ उठाकर तथा एकजुट होकर अपनी पूरी ताकत झोंक देने का रिस्क ले चुके हैं और हर हाल में इस देश में मुस्लिम, दमित, दलित, पिछड़ा, आदिवासी और महिला उत्थान के विराधी होने और साथ ही साथ हिन्दुत्वादी राष्ट्र की स्थापना करने की बातें करने का समय-समय पर नाटक करने वाले लोगों को भारत की सत्ता में दिलाने के हर संभव प्रयास कर रहे हैं| 

अब सबसे बड़ा सवाल यही है की क्या भारत का धर्मनिरपेक्ष, सामाजिक न्याय को समर्पित और सौहार्दपूर्ण संस्कारों में आस्था तथा विश्‍वास रखने वाला आम मतदाता, मंहगाई और भ्रष्टाचार से तंग होकर ऐसे भहरूपियों को नयी दिल्ली की गद्दी सौंपने को तैयार है? लगता तो नहीं, लेकिन यूपीए सरकार की वर्तमान आम आदमी विरोधी नीतियों से निजात पाने के लिये मतदाता गुस्से में कुछ भी गलती कर सकता है!

Sunday, May 1, 2011

‘भारत स्वाभिमान’ का कड़वा सच!

‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान
और मूल आर्यों की क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना
यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और मूल आर्यों की क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का अभियान मात्र है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ होना तय है| लेकिन फिर भी इन षड़यन्त्रकारियों के षड्यंतों के शिकार बहुसंख्यक भारतीयों को हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि इन षड़यन्त्रकारियों के पास अपार धन, गुण्डातन्त्र और बौद्धिक बल की ताकत है, जिसे आने वाले लोकसभा चुनावों में झोंक देने के लिये इन्होंने कमर कस ली है| यदि इस देश की 98 फीसदी आबादी आपने स्वाभिमान को जिन्दा रखना चाहती है, तो मूल आर्यों की क्रूरतम नीतियों की मानसिकता से ग्रस्त लोगों का अभी से उपचार करना शुरू कर दें| लोक सभा के चुनाव तक केवल मानसिकता शेष रहेगी!
डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’



बाबा रामदेव ने योग के नाम पर इस देश के लोगों के दिलों में स्थान बनाया| लोगों के स्वास्थ्य के लिये बाबा ने बहुत बड़ा काम किया| लोगों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाया| कुछ समय बाद "राजीव दीक्षित" नाम के एक विद्वान व्यक्ति को साथ में लेकर अपने मंच से और आस्था चैनल के माध्यम से तथ्यों तथा आंकड़ों के आधार पर घर-घर में जानकारी दी गयी कि देश के राजनेता न मात्र भ्रष्ट हैं, बल्कि ऐसी व्यवस्था को देश में लागू किया जा रहा है कि जिसके चलते देश को लूटकर विदेशी कम्पनियॉं भारत के धन को विदेशों में ले जा रही हैं|


जब श्री दीक्षित जी बाबा रामदेव के मंच से आँकड़ों सहित यह जानकारी देते तो लोगों का तालियों के रूप में अपार समर्थन मिलता था| लेकिन ये क्या जो बाबा रामदेव लाखों लोगों के हृदय रोग का सफलतापूर्वक उपचार करने का दावा करते रहते हैं, उन्हीं का अनुयाई, उन्हीं का एक मजबूत साथी पचास साल की आयु पूर्ण करने से पहले ही हृदयाघात के चलते असमय काल के गाल में समा गया| जिसका दाह संस्कार करने में साथ जाने वालों का आरोप है कि मृतक को हृदयाघात नहीं हुआ, बल्कि उसे कथित रूप से जहर दिया गया था, क्योंकि उसका शव नीला पड़ गया था!


कौन था यह इंसान? जो बाबा रामदेव का इतना करीबी होते हुए भी हृदयाघात का शिकार हो गया और जिसका शव नीला पड़ जाने पर भी, जिसका पोस्टमार्टम तक नहीं करवाया गया?

हिन्दू सन्तों का आरोप है कि
राजीव दीक्षित की मौत नहीं हुई,
बल्कि उसकी हत्या करवाई गयी|
जिसमें बाबा रामदेव सहित, उनके
कुछ बेहद करीबी लोगों पर सन्देह है!
वो दुर्भाग्यशाली व्यक्ति राजीव दीक्षित ही था| जो बाबा के अभियान के लिये रातदिन एक करके तथ्य और आँकड़े जुटा कर बाबा के लिये राजनैतिक भूमि तैयार कर रहा था, जिसे कथित रूप से इस बात का इनाम मिला कि वह बाबा के मंच से बाबा से अधिक पापूलर (लोकप्रिय) होता जा रहा था| बाबा से ज्यादा लोग राजीव दीक्षित को सुनना पसन्द करने लगे थे| राजीव दीक्षित के चले जाने के बाद अनेक कथित हिन्दू सन्तों का आरोप है कि राजीव दीक्षित की मौत नहीं हुई, बल्कि उसकी हत्या करवाई गयी| जिसमें बाबा रामदेव सहित, उनके कुछ बेहद करीबी लोगों पर सन्देह है!

इस प्रकार बाबा रामदेव का आन्दोलन योग से, स्वदेशी और राजीव दीक्षित के अवसान के रास्ते चलता हुआ ‘‘भारत स्वाभिमान’’ की यात्रा पर निकल पड़ा है|


देशभर में अनेकों लोगों द्वारा बाबा पर बार-बार आरोप लगाये जाते रहे हैं कि उनका असली या छुपा हुआ ऐजेण्डा हिन्दुत्वादी ताकतों और संघ सहित भाजपा को लाभ पहुँचाना है, लेकिन बाबा की ओर से इन बातों का बार-बार खण्डन किया जाता रहा है| यद्यपि सूचना अधिकार कानून के जरिये यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि देश के लोगों से राष्ट्र के उत्थान के नाम पर लिए गए चंदे में से बाबा के ट्रस्ट से भारतीय जनता पार्टी को चुनावी खर्चे के लिये लाखों रुपये तो चैक से ही दिये गये| बिना चैक नगद कितने दिये गये होंगे, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है! इस प्रकार बाबा का असली ‘‘संघी’’ चेहरा जनता के सामने आने लगा है|

‘‘भारत स्वाभिमान’’ के समर्थकों की ओर से जनता को बेशक बेवकूफ बनाया जाता हो कि बाबा का संघ या भाजपा या नरेन्द्र मोदी के मकसदों को पूरा करने से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन कथित राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के प्रखर समर्थक लेखक श्री सुरेश चिपलूनकर जी, जो अनेक मंचों पर संघ, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद, संस्कृति, रामदेव और भारत स्वाभिमान के बारे में अधिकारपूर्वक लम्बे समय से लिखते रहे हैं| जिनके बारे में कहा जाता है कि वे तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही अपनी बात कहना पसन्द करते हैं| यही नहीं, इनके लिखे का आर एस एस, विश्व हिन्दू परिषद् और भाजपा से जुड़े हुए तथा कथित राष्ट्रवाद, हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति के समर्थक लेखक, विचारक तथा टिप्पणीकार आँख बंद करके समर्थन भी करते रहे हैं| ऐसे विद्वान समझे जाने वाले संघ, नरेन्द्र मोदी, भाजपा और बाबा रामदेव के पक्के समर्थक लेखक श्री सुरेश चिपलूनकर रामदेव Vs अण्णा = “भगवा” Vs “गाँधीटोपी सेकुलरिज़्म”?? (भाग-2) शीर्षक से लिखे गए और प्रवक्ता डोट कॉम पर 27 अप्रेल, 2011 को प्रकाशित अपने एक लेख में साफ शब्दों में लिखते हैं कि-


देश में कांग्रेस के खिलाफ़ जोरदार माहौल
तैयार हो रहा था, जिसका नेतृत्व एक
भगवा वस्त्रधारी (बाबा रामेदव) कर रहा,
आगे चलकर इस अभियान में
नरेन्द्र मोदी और संघ का भी
जुड़ना अवश्यंभावी
‘‘......बाबा रामदेव देश भर में घूम-घूमकर कांग्रेस, सोनिया और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ माहौल तैयार कर रहे थे, सभाएं ले रहे थे, भारत स्वाभिमान नामक संगठन बनाकर, मजबूती से राजनैतिक अखाड़े में संविधान के तहत चुनाव लड़ने के लिये कमर कस रहे थे, मीडिया लगातार 2जी और कलमाडी की खबरें दिखा रहा था, देश में कांग्रेस के खिलाफ़ जोरदार माहौल तैयार हो रहा था, जिसका नेतृत्व एक भगवा वस्त्रधारी (बाबा रामेदव) कर रहा था, आगे चलकर इस अभियान में नरेन्द्र मोदी और संघ का भी जुड़ना अवश्यंभावी था| और अब पिछले 15-20 दिनों में माहौल ने कैसी पलटी खाई है नेतृत्व और मीडिया कवरेज अचानक एक गॉंधी टोपीधारी व्यक्ति (अन्ना हजारे) के पास चला गया है, उसे घेरे हुए जो टोली (भूषण, हेगड़े, केजड़ीवाल आदि) काम कर रही है, वह धुर हिन्दुत्व विरोधी एवं नरेन्द्र मोदी से घृणा करने वालों से भरी हुई है....’’

इसी लेख में अपनी मनसा को जाहिर करते हुए उक्त लेखक लिखते हैं कि-

गोविन्दाचार्य 
सुब्रह्मण्यम स्वामी
‘‘...........मुख्य बात तो यह है कि जनता को क्या चाहिये- 1) एक फ़र्जी और कठपुतली टाइप का जन-लोकपाल देश के अधिक हित में है, जिसके लिये अण्णा मण्डली काम कर रही है अथवा 2) कांग्रेस जैसी पार्टी को कम से कम 10-15 साल के लिये सत्ता से बेदखल कर देना, जिसके लिये नरेन्द्र मोदी, रामदेव, सुब्रह्मण्यम स्वामी, गोविन्दाचार्य जैसे लोग काम कर रहे हैं? कम से कम मैं तो दूसरा विकल्प चुनना ही पसन्द करूंगा....’’

इसी लेख के अंत में निष्कर्ष के रूप में अपने इरादों को जाहिर करते हुए उक्त लेखक श्री सुरेश चिपलूणकर जी लिखते हैं कि-

भारत पर शासन करने के लिए गठजोड़
भारत पर शासन करने के लिए गठजोड़
‘‘....हम जैसे अनसिविलाइज़्ड आम आदमी की सोसायटी का भी एक लक्ष्य है, देश में सनातन धर्म की विजय पताका पुनः फ़हराना, सेकुलर कीट-पतंगों एवं भारतीय संस्कृति के विरोधियों को परास्त करना रामदेव बाबा-नरेन्द्र मोदी सरीखे लोगों को उच्चतम स्तर पर ले जाना, और इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण लक्ष्य है, कांग्रेस जैसी पार्टी को नेस्तनाबूद करना|’’

श्री सुरेश चिपलूनकर जी द्वारा लिखे गए उपरोक्त विवरण से इस देश के लोगों को बाबा रामदेव के असल मकसद को समझने में किसी प्रकार का शक-सुबहा नहीं होना चाहिए|

‘‘भारत स्वाभिमान’’ के नाम पर बाबा रामदेव इस देश में गुजरात में धर्म विशेष के लोगों के सामूहिक नरसंहार के आरोपी नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हिन्दुत्व के नाम पर मनुस्मृति को लागू करवाना चाहते हैं|

मुठ्ठीभर आर्यों की मौलिक संस्कृति के अन्धभक्त दो प्रतिशत लोगों के आपराधिक षड़यन्त्रों को सनातन धर्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति के नाम पर 98 फीसदी लोगों पर थोपना चाहते हैं|

जबकि इनकी सनातन धर्म, हिन्दुत्व, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की परिभाषा वही है जो मनुस्मृति आदि ब्राह्मण ग्रंथों में लिखी गयी है| जिसके चलते आर्य संस्कृति मानव जाति के सिरमौर और स्वयं को भू-देव (इस पृथ्वी के साक्षात देवता) कहलाने वाले ब्राह्मण, अपनी पत्नी, बेटी और पत्नी तक को समानता और स्वतंत्रता का हक़ देना धर्म और संस्कृति के खिलाफ करार देते रहे हैं|

‘‘नियोग बलात्कार का लाईसेंस"
जिसके चलते विधवा विवाह को भी निन्दनीय करार देकर, अमानवीय और आपराधिक ‘‘सतिप्रथा’’ का खुला समर्थन करते रहे हैं और किन्हीं कारणों से ‘‘सति’’ नहीं हो सकने वाली स्त्रियों को सम्पूर्ण जीवन विधवा के रूप में गुजारते हुए ‘‘नियोग’’ नामक धार्मिक ढाल के रूप में अपनाये जाने वाले बलात्कार के लाईसेंस के जरिये ‘‘नियोग’’ के लिये सर्वोत्कृष्ट प्रथम पात्र ‘‘ब्राह्मणों’’ को आजीवन असंख्य विधवा स्त्रियों के साथ ‘‘नियोग’’ के बहाने बलात्कार करते रहने को भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म के अनुकूल और पवित्र मानते रहे हैं|

वेदव्यास को  विचित्रवीर्य की
दो पत्नियों के साथ ‘‘नियोग’’
के बहाने गर्भाधान (बलात्कार)
करने के लिये बुलाया गया|
जिसका अकाट्य प्रमाण है, महा भारत काल के सबसे कुरूप पुरुष और नाजायज माता-पिता की औलाद (जिसके माता-पिता, विवाहित पति-पत्नी नहीं, बल्कि आपस में कथित रूप से पिता-पुत्री थे) वेदव्यास को केवल ब्राह्मण ॠषी पाराशर का पुत्र होने के कारण विचित्रवीर्य की दो पत्नियों के साथ ‘‘नियोग’’ के बहाने गर्भाधान (बलात्कार) करने के लिये बुलाया गया| परिणामस्वरूप तथाथित एवं आर्यधर्म नीति के अनुसार ‘‘नियोग’’ हेतु सर्वोत्कृष्ट प्रथम पात्र ‘‘ब्राह्मण’’ वेदव्यास द्वारा किये गये संभोग (जो हकीकत में बलात्कार था) और उनके कथित उत्तम वीर्य से नपुंसक पाण्डू और अन्धे धृतराष्ट्र का जन्म हुआ|


इन सब बातों से यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और आर्यों की मूल क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का एक मात्र अभियान है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या साध्वी राजनेत्री उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ हो जायेगा|
क्रूर और अमानवीय आर्य संस्कृति

ऐसी क्रूर और अमानवीय आर्य संस्कृति के संवाहकों की स्त्री, दमित, दलित, आदिवासी और पिछड़ों के बारे में क्या सोच है, इसे सारा संसार जानता है! ये लोग स्त्री, दमित, दलित, आदिवासी और पिछड़ों को तो इंसान तक मानने को तैयार नहीं हैं!

लेकिन मुसलमानों से या ईसाईयों से हिन्दुओं को लड़ाने की जब-जब बात आती है तो इन्हें सबसे बलवान हिन्दू केवल और केवल दलित, आदिवासी और पिछड़ों में ही नज़र आते हैं! आखिर क्यों यह भी हर दलित, आदिवासी और पिछड़े हिन्दू के लिये विचारणीय है| यदि फिर भी समझ में नहीं आता है तो गुजरात में जाकर देखें| गुजरात में मुसलामनों के नरसंहार के आरोपियों में जितने हिन्दुओं पर मुकदमे चलाये जा रहे हैं या जितनों को सजा हुई है, उनकी हकीकत जानी जा सकती है| यहॉं तक कि मरने वाले हिन्दुओं में भी अधिकतर दलित, आदिवासी और पिछड़े ही थे|



उपरोक्त लेख में चाहे-अनचाहे प्रकट जानकारी से यह तो साफ़ हो ही गया है कि ‘‘भारत स्वाभिमान’’ के नाम से बाबा रामदेव के मार्फ़त नरेन्द्र मोदी, संघ और अनार्यों तथा गैर-हिन्दुओं के विरुद्ध षड़यंत्र रचने में माहिर लोगों द्वारा अध्यात्मवाद, राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की रक्षा के नाम पर चलाया जा रहा नाटकीय अभियान ‘‘भारत स्वाभिमान’’ हिन्दूअनार्यों को हिन्दुत्व की एकता और अस्मिता की रक्षा के मोहपाश में फंसाकर, हिन्दुअनार्यों और गैर हिन्दुओं को फिर से मूल आर्यों की क्रूरता के शिकंजे में फंसाने हेतु संचालित किया जा रहा है|

क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की जयन्ति
जिससे इस देश के हर अनार्य को ही नहीं, बल्कि आर्य स्त्रियों, आर्य आम गरीब और पिछड़े लोगों (गरीब, तंगहाली, शोषण, अत्याचार, भेदभाव, मिलावट, कालाबाजारी आदि के शिकार ब्राह्मण, बनिया और क्षत्रियों) को सजग तथा सतर्क रहने की बेहद जरूरत है| क्योंकि भारत स्वाभिमान के नाम पर जिस मानसिकता के लोगों द्वारा यह नाटकीय अभियान मुखौटे लगाकर चलाया जा रहा है, उनकी मानसिकता इतिहास में कैसी रही है? इसे जानने के लिये इतना सा जान लेना पर्याप्त होगा कि मूल आर्यों के अपने रक्षक के रूप में साथ आये, आर्य मूल के क्षत्रियों तक को इन्होंने नहीं छोड़ा और जिन आर्यों के द्वारा भारत भूमि को एक बार नहीं, बल्कि अनेकों बार क्षत्रिय विहीन कर दिया गया हो और क्षत्रियों के क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की पूजा करने में गौरव का अनुभव करते हों, क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की जयन्ति मनाते हों और क्रूरतम हत्यारे ‘‘परसराम’’ की जयन्ति को सरकार के मार्फत सार्वजनिक अवकाश घोषित करने के लिये लगातार प्रयास कर रहे हों, उन पर भी यदि कोई व्यक्ति विश्वास करता है तो उसको बचाने वाला इस संसार में कोई नहीं है?



लेकिन सुखद अनुभव करने वाली बात यह है कि इस देश के अनार्यों को ही नहीं, बल्कि आर्य स्त्रियों और आर्य आम लोगों (ब्राह्मण-बनिया को भी) तथा अनार्य क्षत्रियों को अब क्रूर मूल आर्य मानसिकता से ग्रस्त, घृणित-अमानवीय लोगों के मुखौटों के पीछे छिपी असली और षड़यन्त्रकारी आपराधिक चेहरे दिखने लगे हैं और अब बहुत कुछ समझ में भी आने लगा है|

जिसके चलते यह बात पुख्ता तौर पर प्रमाणित हो रही है कि बाबा रामदेव का अभियान, जिसे उन्होंने ‘‘भारत स्वाभिमान’’ का नाम दिया है, संघ स्वाभिमान और मूल आर्यों की क्रूरतम और घातक नीतियों की पुनर्स्थापना का अभियान मात्र है, जो अगले चुनाव में या तो भाजपा में विलीन हो जायेगा या उमा भारती की पार्टी की तरह से इसका भी सूपड़ा साफ होना तय है| लेकिन फिर भी इन षड़यन्त्रकारियों के षड्यंतों के शिकार बहुसंख्यक भारतीयों को हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है, क्योंकि इन षड़यन्त्रकारियों के पास अपार धन, गुण्डातन्त्र और बौद्धिक बल की ताकत है, जिसे आने वाले लोकसभा चुनावों में झोंक देने के लिये इन्होंने कमर कस ली है| यदि इस देश की 98 फीसदी आबादी आपने स्वाभिमान को जिन्दा रखना चाहती है, तो मूल आर्यों की क्रूरतम नीतियों की मानसिकता से ग्रस्त लोगों का अभी से उपचार करना शुरू कर दें| लोक सभा के चुनाव तक केवल मानसिकता शेष रहेगी!

Thursday, September 9, 2010

भाजपा को नहीं, भारत को बचाना है!

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'
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इस समय भाजपा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है। इसलिये अब हम भारतीयों को चाहिये कि धर्म का मुखौटा पहनकर देश को तोडने वाली भाजपा, संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि के नाटकीय बहकावे में नहीं आना है और मुसलमानों को इनके उकसावे में आकर अपना धैर्य नहीं खोना है। अन्यथा ये धर्मविरोधी संगठन 24 सितम्बर को इस देश के सौहार्द को बिगाडने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगे। विश्वास करें, इनके साथ केवल देश के 1 प्रतिशत लोग भी नहीं हैं। शेष लोगों को तो ये मूर्ख बनाकर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकरकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं! अत: हमें भाजपा को नहीं, बल्कि हर हाल में भारत को और भारतीयों को बचाना है।
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जब-जब भी और जहाँ-जहाँ पर भी भारतीय जनता पार्टी की सरकार सत्ता में रही हैं। उसके नेतृत्व ने देश और समाज को मूर्ख बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी है। केवल इतना ही नहीं, इनके गुर्गे (मन्त्री भी) जो संघ एवं विश्वहिन्दू परिषद से आदेश प्राप्त करते हैं, हिन्दुत्व के नाम पर हिन्दू समाज की पिछडी और छोटी जाति के लोगों को मुसमानों के सामने करके अपनी लडाई लडते रहते हैं, जबकि मोदी, तोगड़िया और आडवाणी जैसे तो वातानुकूलित कमरों में आराम फरमाते रहते हैं।

इस बात को तो देश-विदेश के सभी लोग जानते हैं कि गुजरात में हिन्दुओं के हाथों मुसलमानों का कत्लेआम करवाया गया, लेकिन इस बात को बहुत कम लोग जानते हैं कि जिन हिन्दुओं के हाथों मुसलमानों का कत्लेआम करवाया गया, वे कौन थे और उनकी वर्तमान दशा क्या है? गुजरात के दूर-दराज के क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी एवं पिछडी जाति के लोगों के घरों में स्वयं भगवा ब्रिगेड के लोगों द्वारा आग लगाई गयी थी। अनेकों हिन्दुओं को इस आग के हवाले कर दिया गया और बतलाया गया कि मुसलमानों ने हिन्दुओं को जला दिया है। जिससे आक्रोशित होकर इन भोले-भाले अशिक्षित हिन्दुओं ने अनेक निर्दोष मुसलमानों के घरों में आग लगा दी। अनेकों को मौत के घाट उतार दिया।

आज ये गरीब और बहकावे में आने वाले आदिवासी हिन्दू या तो जेल में बन्द हैं या जमानत मिलने के बाद कोर्ट में पेशियाँ दर पेशियाँ भुगतते फिर रहे हैं। इन्हें हिन्दुत्व के नाम पर मुसलमानों के विरुद्ध भडकाने वाले कहीं दूर-दूर तक नजर नहीं आते हैं।

हिन्दुत्व के नाम पर संघ शाखाओं में हाथियारों के संचालन का प्रशिक्षण प्रदान करके सरेआम आतंकवाद को बढावा दिया जा रहा है। तोगड़िया त्रिशूल और भाला बांट रहे हैं। संघ से जुडे अनेक लोग अनेक आतंकवादी घटनाओं में पकडे जा चुके हैं। जिन्हें बचाने के लिये संघ एवं भाजवा वाले इसे सोनिया सरकार की चाल बतला रहे हैं।

बस यात्रा के बहाने पाकिस्तान से दोस्ती का नाटक खेलने वाले पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी की अदूरदर्शिता एवं देश विरोधी नीति के चलते हजारों सैनिकों को कारगिल में मरवा दिया। हजारों सैनिकों को हमारी ही धरती पर मारगिराने वाले पाकिस्तानियों को वापस पाकिस्तान में सुरक्षित चले जाने की लिये वाजपेयी सरकार ने वाकायदा सेना को चुप रहने एवं पाकिस्तानियों पर आक्रमण नहीं करने का आदेश दिया था। इसके बाद लम्बे समय तक आर-पास की लडाई की बात का नाटक करके हिमालय की ऊँची बर्फीली की चोटियो पर हमारे सैनिकों को तैनात करके अनेक सैनिकों को बेमौत गल-गल कर मर जाने को विवश कर दिया।

इसके बाद भी भाजपा, संघ और विहिप द्वारा बेशर्मी से प्रचारित किया गया कि वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने कारगिल में पाकिस्तान पर विजय प्राप्त की। इसी प्रकार से हजारों करोड डालरों से भरे बक्सों के साथ कन्धार में दुर्दान्त आतंकियों को छोडकर आने वाले वाजपेयी सरकार के विदेश मन्त्री जसवन्त सिंह को जिन्ना का गुणगान करने पर पहले तो बाहर का रास्ता दिखा दिया, लेकिन जैसे ही पूर्व उपराष्ट्रपति भैरोंसिंह शैखावत का निधन हुआ तो राजपूत वोटों को लुभाने के लिये बिना शर्त वापस बुला लिया गया।

मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री हर साल पांच सितम्बर को शिक्षकों के पैर पखारते (धोते) हैं और इस बात का नाटक करते हैं कि भाजपा के राज में गुरुओं का सर्वाधिक सम्मान होता है। जबकि सच्चाई को जानना है तो गत शिक्षक दिवस से ठीक पूर्व वेतन नहीं मिलने के चलते शिक्षक की मौत के लिये जिम्मेदार मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री की असली तस्वीर को ब्लॉग लेखक श्री अजीत ठाकुर के निम्न समाचार से समझा जा सकता है।

"होशंगाबाद जिले की पिपरिया तहसील के ग्राम मटकुली में एक व्यक्ति की मौत हो गई। ये कोई साधारण मौत नहीं है, ये मौत करारा तमाचा है, हमारे शिक्षातंत्र पर और हमारी व्यवस्था की भयानकतम असंवेदनशीलता का नमूना, ये एक शिक्षक की मौत है। चार महीने से वेतन नहीं मिल पाने की वजह से बीमार सहायक अध्यापक हरिकिशन ठाकुर ने बेहतर इलाज के अभाव में दम तोड दिया। इनकी मौत के 6 दिन बाद ही इनका परिवार भूखे मरने की नौबत में है। ये उस देश में हुआ है, जहाँ गुरु को गोविन्द से बडा बताया गया है, जहाँ पर एक दिन अर्थात् 5 सितम्बर शिक्षक दिवस शिक्षको को समर्पित है। ये उस प्रदेश में हुआ जहाँ के माननीय मुख्यमंत्री जी (शिवराज सिंह चौहान) शिक्षक दिवस पर शिक्षको के पैर धोकर उनका सम्मान करते हैं। इस असंवेदनहीन व्यवस्था में हम कैसे किसी द्रोण या चाणक्य (के पैदा होने) की उम्मीद कर सकते हैं और जब द्रोण और चाणक्य नहीं होंगे तो अर्जुन और चन्द्रगुप्त की उम्मीद तो बेमानी है।"

केवल इतना ही नहीं देश के लोगों को इस बात को भी ठीक से समझ लेना चाहिये कि-

कश्मीर की वर्तमान दु:खद स्थिति के लिये भी प्राथमिक तौर पर ये ही कथित हिन्दुत्ववादी आतंकी ताकतें ही हर प्रकार से जिम्मेदार हैं।

तत्कालीन कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले के लिये भी इन्हीं के विचार जिम्मेदार थे।

इन ताकतों को इस बात से बखूबी पहचाना जा सकता है कि पहले तो इन्होने भारत में कश्मीर के विलय का ही विरोध किया था और तत्कालीन कश्मीर सरकार पर नेहरू के कूटनीतिक दबाव कारण विलय सम्भव हो भी गया तो इनको विलय का तरीका ही नहीं सुहाया और कश्मीर में साम्प्रदायिकता की नफरत का बीज बोने के लिये इनके नेताओं ने तरह-तरह के नाटक किये गये। जिनके कारण कश्मीर से हजारों पण्डित बेघर हो गये और इस पर भी तुर्रा ये कि ये अपने आपको राष्ट्रवादी कहते हैं। अखण्ड भारत की बात करते हैं।

देश को तोडने के लिये कुटिल चालें चलने में माहिर ये अनीश्वरवादी हिन्दुत्व के ठेकेदार, ईश्वर के नाम पर 1947 से भारत के भोले-भाले हिन्दुओं को लगातार बहकाने और उकसाने के अपराध में संलिप्त हैं।

भाजपा की पूर्व मुख्यमन्त्री वसुन्धरा राजे ने राजस्थान में शराब, शबाब और जमीन बेचकर भ्रष्टाचार को बढावा देने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी थी और राजस्थान को कई दशक पीछे धकेल दिया। हर राज्य में इनकी करनी और कथनी में धरती आसमान का अन्तर स्पष्ट नजर आता है। इनका एक मात्र कार्य है किसी भी प्रकार से समाज में अमन-शान्ति और भाईचारा बिगडा रहे, जिससे ये अपनी राजनीति की रोटियाँ सेकते रहें।

यह है असली चेहरा-भाजपा और संघ के संस्कृति और राष्ट्रवादी चरित्र का।

अब जबकि 24 सितम्बर को अयोध्या-बाबरी भूमि विवाद पर मालिकाना हक का निर्णय सुनाये जाने की तारीख घोषित हो चुकी है तो भाजपा, आरएसएस एवं विश्व हिन्दू परिषद तथा इनके अनुसांगिक संगठनों की ओर से हिन्दुत्व के नाम पर समाज को साम्प्रदायिकता की आग में धकेलने की पूरी तैयारी शुरू की जा चुकी है। मोबाईल पर मैसेज के जरिये लोगों को उद्वेलित करके भडाया जा रहा है और जैसे ही मौका मिलेगा, ये देश के माहौल को बिगाडने के लिये कुछ भी करने को तैयार बैठे हैं।

जबकि आम लोगों को इस बात का ज्ञान ही नहीं है कि भाजपा एवं इसके समर्थक जिस हिन्दुत्व को मानते हैं, उसमें ईश्वर को ही नकारा गया है। इनके आदर्श हैं सावरकर जो ईश्वर की सत्ता में कतई भी विश्वास नहीं करते, तब ही तो इनके लिये निरीह गाँधी का वध गर्व की बात है।

इस समय भाजपा अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रही है। इसलिये अब हम भारतीयों को चाहिये कि धर्म का मुखौटा पहनकर देश को तोडने वाली भाजपा, संघ, विश्व हिन्दू परिषद आदि के नाटकीय बहकावे में नहीं आना है और मुसलमानों को इनके उकसावे में आकर अपना धैर्य नहीं खोना है। अन्यथा ये धर्मविरोधी संगठन 24 सितम्बर को इस देश के सौहार्द को बिगाडने में कोई कोर कसर नहीं छोडेंगे। विश्वास करें, इनके साथ केवल देश के 1 प्रतिशत लोग भी नहीं हैं। शेष लोगों को तो ये मूर्ख बनाकर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकरकर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं! अत: हमें भाजपा को नहीं, बल्कि हर हाल में भारत को और भारतीयों को बचाना है।